सीबीआई और ईडी प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने के मोदी सरकार के फ़ैसले पर क्यों हो रहा है विवाद?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात इसी साल 25 अगस्त की है. सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना ने कहा था, सीबीआई और ईडी जैसे एजेंसियों को अभियुक्तों पर 'तलवार लटकाकर' नहीं रखनी चाहिए और समयबद्ध तरीके से जांच करनी चाहिए.
सुनवाई कुछ सांसदों और विधायकों पर सीबीआई और ईडी के दशकों से लंबित पड़े मामले से जुड़ा था.
लेकिन ये पहला मौका नहीं था जब सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों पर कोर्ट ने इस तरह की 'सख़्त' टिप्पणी की थी.
साल 2013 में सीबीआई को 'पिंज़ड़े में बंद तोता' कहा गया था जो अपने मालिक की बोली बोलता है. वो मामला कोयला ब्लॉक आबंटन घोटाले की सुनवाई का था. केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी.
यानी सरकार कोई भी हो, जाँच एजेंसियों की जाँच और तौर-तरीके हमेशा से सवालों के घेरे में रहे हैं.
अब इन दोनों एजेंसियों से जुड़ा एक नया विवाद चर्चा में है.
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नए अध्यादेश के मायने
ये विवाद है सीबीआई और ईडी के निदेशकों के कार्यकाल को लेकर. केंद्र सरकार रविवार को इस बारे में दो नए अध्यादेश लेकर आई है.
इसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशकों का कार्यकाल दो साल के अनिवार्य कार्यकाल के बाद अब तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है.
यानी निदेशकों का कार्यकाल होगा 2+1+1+1 के फॉर्मूले पर. 2 साल का 'फिक्स्ड' कार्यकाल, जो एक-एक साल के अंतराल के बाद, समीक्षा और गठित समितियों की मंजूरी के बाद तीन साल तक के लिए बढ़ाया जा सकता है.
केंद्र सरकार ने इसके लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग (संशोधन) अध्यादेश और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (संशोधन) अध्यादेश, 2021 जारी किया है.
यहाँ ग़ौर करने वाली बात है कि ईडी निदेशक की नियुक्ति के लिए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी), सतर्कता आयुक्तों के अलावा राजस्व विभाग, कार्मिक विभाग और गृह मंत्रालय के सचिवों की एक समिति होती है.
वहीं सीबीआई निदेशक की नियुक्ति का निर्णय प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और देश के मुख्य न्यायाधीश मिलकर लेते हैं.

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कोर्ट ने निदेशकों की नियुक्ति पर पहले क्या कहा है?
हाल ही में ईडी के प्रमुख एसके मिश्र को 2020 में सेवा विस्तार मिला था. तब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था.
उस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रिटायर होने के ठीक पहले अधिकारियों के कार्यकाल केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में ही बढ़ाए जाने चाहिए, वो भी छोटी अवधि के लिए.
1984 बैच के आईआरएस अधिकारी मिश्र, 17 नवंबर को रिटायर होने वाले हैं. सरकार के इस नए फरमान को उनके रिटायरमेंट से जोड़ कर भी देखा जा रहा है.
हालांकि ये देखना बाक़ी है कि नया अध्यादेश आने के बाद ईडी प्रमुख के पद पर उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता है या नहीं.
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नए अध्यादेश पर प्रतिक्रिया
केंद्र सरकार के इस कदम पर विवाद शुरू हो गया है.
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने इस मुद्दे पर इंडियन एक्सप्रेस अखबार से बात करते हुए कहा, " संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने ही वाला है. उससे ठीक पहले जल्दबाजी में अध्यादेश लाने के पीछे सरकार की मंशा क्या है? ये सरकार के तानाशाही रवैये की एक और मिसाल है."
सीबीआई के निदेशक के नियुक्ति में अधीर रंजन भी चयन प्रक्रिया का हिस्सा हैं.
वहीं सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वक़ील प्रशांत भूषण ने सरकार के फैसले को सीबीआई और ईडी की आज़ादी को ख़त्म करने की दिशा में एक और कदम बताया है.
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अध्यादेश पर विवाद क्यों?
अध्यादेश पर विवाद, उसकी टाइमिंग, कार्यकाल को बढ़ाने की ज़रूरत और उसे बढ़ाने के तरीके को लेकर हो रहा है.
सीबीआई, ईडी के निदेशकों के लिए 2 साल के अनिवार्य कार्यकाल की व्यवस्था इस वजह से की गई थी ताकि इस पद पर अधिकारी स्वतंत्र, निष्पक्ष और बिना डरे अपना कानूनी कर्तव्य निभा पाएं.
इसके पीछे एक मंशा ये भी थी कि दो साल के कार्यकाल में इस पद पर अधिकारी को निरंतरता मिलेगी और सरकारें अपनी सुविधानुसार उन्हें पद से हटा नहीं पाएँगी.
सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर एनके सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ये अध्यादेश अकस्मात आया है. इसके लिए कोई माँग भी कभी नहीं उठी. इसलिए फैसले की मंशा को लेकर सवाल खड़े होते हैं.
"सरकार को दो साल का कार्यकाल कम लग रहा था, तो इसे वो तीन साल भी कर सकती थी, ताकि 'फिक्स्ड टर्म' रखने के पीछे जो दलील थी वो पूरी भी हो जाती. लेकिन टुकड़ों में पाँच साल का कार्यकाल करने की बात मुझे समझ नहीं आ रही."
एक-एक साल के एक्सटेंशन को एनके सिंह 'फिक्स्ड टर्म' की नीति के ख़िलाफ़ मानते हैं. उनका कहना है कि हर साल जब एक साल का एक्सटेंशन मिलेगा तो उनके काम से सरकार खुश नहीं होगी तो आगे एक साल का कार्यकाल विस्तार नहीं मिलेगा.
यानी इन एजेंसियों के निदेशक का कार्यकाल बढ़ाना है या नहीं बढ़ाना अब सरकार के हाथ में होगा. इस वजह से इन एजेंसियों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर आँच आ सकती है.
लेकिन एनआईए के स्पेशल डीजी रहे नवनीत वासन का मत है कि पाँच साल के लिए सीबीआई और ईडी के निदेशक का कार्यकाल करना सही कदम है. ये पहले ही कर देना चाहिए था.
नीदरलैंड से बीबीसी से फोन पर बात करते हुए उन्होंने कहा, "दो साल बहुत कम वक़्त होता है, किसी भी निदेशक के लिए जो एजेंसी में बड़े और कड़े सुधार लाना चाहता है."
लेकिन वो साथ में ये भी जोड़ते हैं कि ये पाँच साल का कार्यकाल एक साथ दिया जाना चाहिए ना कि एक-एक साल की समीक्षा के बाद. साथ ही साथ वो कहते हैं कि चयन प्रक्रिया और भी मज़बूत और ठोस होने की ज़रूरत है जैसे कि एफबीआई के निदेशक पद के लिए अमेरिका में होता है.
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अनिवार्य कार्यकाल की व्यवस्था क्यों की गई थी ?
सीबीआई के निदेशक के दो साल के फिक्स्ड यानी अनिवार्य कार्यकाल की व्यवस्था विनीत नारायण बनाम भारत सरकार के फैसले के बाद की गई थी, जिसे जैन हवाला केस नाम से भी जाना जाता है.
नया अध्यादेश, निश्चित तौर पर एक राजनीतिक फैसला है. ऐसा भारत के गृह सचिव रहे जीके पिल्लई मानते हैं.
जीके पिल्लई ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "दो साल के फिक्स्ड कार्यकाल के पीछे इन पदों को निष्पक्ष और स्वतंत्र रखने का तर्क दिया गया था. लेकिन वो तर्क तो सरकार ने पहले ही कमज़ोर कर दिया जब दो साल से पहले पद से निदेशकों को हटाया. तभी स्पष्ट हो गया था कि इन पदों के कार्यकाल सरकार की इच्छा पर निर्भर है. "
जीके पिल्लई का इशारा सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की तरफ़ था, जिन्हें इस सरकार ने विवादों के बाद दो साल का कार्यकाल ख़त्म होने से पहले ही हटा दिया था.
वो कहते हैं,"अब ये नया अध्यादेश एजेंसियों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कमज़ोर करने की दिशा में एक और कदम है. इस अध्यादेश में कहा गया है कि अब दो साल के कार्यकाल के बाद हर एक साल के अंत में सरकार एक्सटेंशन इस पर विचार करेगी."
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कुछ जानकार इस नए अध्यादेश को निदेशक बनने की तैयारी में बैठे नीचे के अधिकारियों के लिए भी झटका मान रहे हैं. ऐसे जानकारों में पूर्व आईपीएस और पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त यशोवर्धन आज़ाद भी शामिल हैं.
यशोवर्धन आज़ाद कहते हैं, "ये अध्यादेश दुर्भाग्यपूर्ण है. नीचे के पदाधिकारी जो भविष्य में निदेशक बनने की लाइन में होंगे, उनका उत्साह भी कम होगा.
"जो अध्यादेश आया है, उसमें 5 साल तक के विस्तार की बात है. तकनीकी तौर पर ये सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन तो नहीं है लेकिन हर साल फैसले की समीक्षा करना पद की गरिमा के साथ नहीं जाता. ऐसा लगता है कि निदेशक का पद 'दिहाड़ी मजदूर वाली' चीज़ हो गई.
"संसद तो 29 तारीख से बैठ ही रही थी. इतनी महत्वपूर्ण बात थी, तो सरकार थोड़ा इंतजार कर लेती. वैसे भी सदन में उनके पास बहुमत तो था ही. सरकार अमेरिका का ही सिस्टम क्यों नहीं ले आती. जब सरकार सत्ता में आए अपने साथ पाँच साल के लिए इन पदों पर अधिकारी लेकर आए."

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कोर्ट में फैसले को चुनौती
लेकिन अध्यादेश की टाइमिंग को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उस पर संविधान के जानकार सुभाष कश्यप इत्तेफ़ाक नहीं रखते.
सुभाष कश्यप का कहना है, " सरकार के किसी भी फैसले को चुनौती कोर्ट में दी जा सकती है. लेकिन किसी भी मामले पर, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा है उस पर राष्ट्रपति की सहमति से अध्यादेश लाना सरकार का अधिकार है. इसमें 10 दिन बाद संसद बैठ रही हो या 2 महीने बाद बैठ रही हो, इस तरह का कोई नियम नहीं है."
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने ये भी कहा है कि उन्हें लगता है सिविल सोसाइटी इस फैसले को कोर्ट में चुनौती ज़रूर देगी.
पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई को भी लगता है कि मामला कोर्ट में ज़रूर जाएगा.
सुभाष कश्यप कहते हैं किसी भी अध्यादेश को लाने से पहले सरकार भी अपना होमवर्क करती है.
जानकारों की राय में सरकार कोर्ट में ये अपने पक्ष में ये दलील दे सकती है कि ये केवल 'कार्यकाल विस्तार' का मामला है, जिसके लिए गठित कमेटियों की मंज़ूरी की ज़रूरत होगी.
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