फ़ेसबुक भारत में नफ़रत फैलाने के लिए भाजपा का हथियार बन चुकी है: कांग्रेस

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कांग्रेस नेता रोहन गुप्ता ने शुक्रवार को सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि फ़ेसबुक भारत में नफ़रत फैलाने के लिए बीजेपी का हथियार बन चुकी है.
उन्होंने कहा कि "पिछले दो सालों से रिपोर्ट आ रही हैं कि फ़ेसबुक पर जो कुछ सामग्री आ रही है, चाहें वो फ़ेक न्यूज़ या नफ़रत फैलाने वाली सामग्री, उसे नियंत्रित नहीं किया जा रहा है."
ये पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस पार्टी की ओर से इस मुद्दे पर बीजेपी और फ़ेसबुक को घेरा गया हो.
कांग्रेस का दावा है कि ये कोई संयोग नहीं है कि फ़ेसबुक अपने सबसे बड़े बाज़ार को लेकर जारी आंतरिक रिपोर्ट्स को नज़रअंदाज़ कर दे.
इससे पहले कई मौकों पर फ़ेसबुक से जुड़ी कई रिपोर्ट्स सामने आ चुकी हैं जिनमें उनकी ओर से नफ़रत भरी सामग्री को रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाने का ज़िक्र है.
आख़िर क्या है मामला?
साल 2018 से लेकर 2020 के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फ़ेसबुक के भारत में संचालन को लेकर तीन आंतरिक रिपोर्टें आ चुकी हैं.
इनमें- 'ध्रुवीकरण वाली सामग्री', 'फ़ेक और अप्रामाणिक' मैसेज से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों को 'बदनाम' करने वाले कंटेंट की लगातार बढ़ती संख्या की बात कही गई है.
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, निरीक्षण करने वाले कर्मचारियों के इन अलर्ट के बावजूद, साल 2019 में तत्कालीन उपाध्यक्ष क्रिस कॉक्स ने एक आंतरिक समीक्षा बैठक में इन मुद्दों को "अपने प्लेटफ़ॉर्म पर तुलनात्मक रूप से कम विस्तृत" समस्या बताया था.

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लोकसभा चुनाव से कुछ महीनों पहले जनवरी-फ़रवरी 2019 में दो रिपोर्टें पेश की गईं जिसमें बढ़ती 'हेट स्पीच' और 'परेशान करने वाली सामग्री' की बात की गई.
तीसरी रिपोर्ट , अगस्त 2020 के आखिर में आई, जिसमें कहा गया कि प्लेटफ़ॉर्म के एआई टूल 'स्थानीय भाषाओं की पहचान करने में नाकाम रहे और इसलिए, हेट स्पीच और समस्याग्रस्त कंटेट की पहचान नहीं की जा सकी.
इन सबके बावजूद कॉक्स की बैठक का ब्यौरा कहता है कि ''सर्वे के मुताबिक़ लोग हमारे प्लेटफॉर्म पर सामान्यतः सुरक्षित महसूस करते हैं, जानकारों ने हमें बताया है कि देश में हालात स्थिर हैं.''
दस्तावेज़ों के जरिए ये गंभीर बात सामने आई है जिसे फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी और व्हिसलब्लोअर फ्रांसेस होगेन के वकील ने संयुक्त राज्य प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) और अमेरिकी कांग्रेस के साथ साझा किए हैं.
अमेरिकी कांग्रेस को दिए गए इस दस्तावेज की समीक्षा वैश्विक समाचार संगठनों के एक संघ द्वारा की गई है, द इंडियन एक्सप्रेस इस समूह का हिस्सा है.
फ़ेसबुक की ये समीक्षा बैठक, भारत में लोकसभा चुनाव की तारीख़ों के एलान से एक महीने पहले हुई.
11 अप्रैल, 2019 को देश में चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीख़ों का एलान किया था.
"एडवर्सेरियल हार्मफुल नेटवर्क्स: इंडिया केस स्टडी" नाम से फ़ेसबुक की पहली आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया कि- पश्चिम बंगाल में फ़ेसबुक पर 40 फ़ीसदी तक व्यू पोर्ट व्यूज़ (वीपीवी) जिन पोस्ट को मिला, वे फ़ेक और अप्रमाणिक थे.
वीपीवी एक फ़ेसबुक मैट्रिक है जिससे यह मापा जाता कि सामग्री को वास्तव में कितने यूज़र्स ने देखा है.
कॉक्स ने मार्च 2019 में ही फ़ेसबुक छोड़ दिया था और फिर जून 2020 में बतौर चीफ़ प्रोडक्ट ऑफिसर कंपनी दोबारा जॉइन किया.
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'बजट कम करके हेट स्पीच कैसे रोकेगी फ़ेसबुक'
कांग्रेस पार्टी के सोशल मीडिया हेड रोहन गुप्ता ने इन्हीं रिपोर्टों का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब नफ़रत भरी सामग्री की पहचान करने के लिए जारी बजट में ही कटौती कर दी गयी तो फ़ेसबुक ऐसी सामग्री को कैसे रोकेगी.
उन्होंने कहा, "साल 2019 के चुनाव से पहले एक आंतरिक रिपोर्ट आई थी कि फ़ेसबुक में फ़ेकन्यूज़ और हेट न्यूज़ में चालीस फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी. मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन उनकी आंतरिक टीम ने इसे नज़रअंदाज़ किया. और जो चल रहा था, उसे चलने दिया. और कंटेंट आइडेंटिफिकेशन का जो 87 फ़ीसदी बजट था. वो सिर्फ अंग्रेज़ी के 9 फ़ीसदी कंटेंट के लिए इस्तेमाल हो रहा था. उसे भी अगस्त 2019 में उन्होंने 15 फ़ीसदी कम कर दिया."

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इसके बाद दिसंबर 2019 में फ़ेक न्यूज़ और हेट स्पीच की सामग्री 80 फ़ीसदी तक बढ़ गयी. ये बहुत ही गंभीर मामला है साथियों. फ़ेसबुक ने अपने आपको भाजपा का हथियार बनने दिया है."
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू के बारे में फ़ेक न्यूज़ मौजूद है.
गुप्ता बताते हैं, "हम लोग रिपोर्ट कर रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. क्योंकि फ़ेसबुक ने उत्तर भारत में जहां सबसे ज़्यादा हिंदी भाषी लोग रहते हैं, वहां उन्होंने सिर्फ़ 9 फ़ीसदी बजट इस्तेमाल किया. ऐसे में आप हेट स्पीच को कैसे पकड़ेंगे. ऐसे में दो साल में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही हैं, उसके आधार पर ये कहा जा सकता है कि फ़ेसबुक ने ख़ुद को भाजपा के लिए हथियार के रूप में प्रयोग होने दिया है."
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स्वतंत्र जांच की मांग
रोहन गुप्ता ने प्रेस वार्ता में बताया है कि फ़ेसबुक के ख़ुद के ही रिपोर्ट्स को नज़रअंदाज किए जाने को एक संयोग नहीं माना जा सकता.
उन्होंने कहा कि ये कोई संयोग नहीं है, बल्कि बीजेपी का प्रयोग है.
वे कहते हैं, "फ़ेसबुक के तीन कर्मचारियों ने बताया है कि हमने आंतरिक रिपोर्ट में ये मुद्दा उठाया था कि नफ़रत भरी सामग्री बढ़ रही है. फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. भारत फ़ेसबुक का सबसे बड़ा बाज़ार है, यहां उसके 37 करोड़ उपभोक्ता हैं. और इतनी बड़ी चीज को नज़रअंदाज करना कोई संयोग नहीं है. बल्कि ये बीजेपी का प्रयोग है. देश की अर्थतंत्र से लेकर लोकतंत्र और हर चीज़ में ये बीजेपी का ये प्रयोग है.
हम फ़ेसबुक से मांग करते हैं कि इस मसले की स्वतंत्र जांच हो. दो सालों में जो कुछ भी हुआ है, आपके जो कर्मचारियों ने आंतरिक रिपोर्ट जारी की हैं. बताएं कि इन रिपोर्टों को अमल में क्यों नहीं लाया गया. आपने नफ़रत भरी सामग्री के बजट को कम क्यों किया. आपके कर्मचारी ने व्हिसल ब्लो किया, उसे आपने नज़रअंदाज़ क्यों किया. और आज दो साल के बाद भी फ़ेसबुक की तरफ़ से इसकी ठीक तरह से जांच नहीं की गयी. न ही इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को चिह्नित किया गया."
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