रेप पीड़िता को 26वें हफ़्ते में गर्भपात की अनुमति देना कितना सुरक्षित?

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Thinkstock

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर
    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक बलात्कार पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि भ्रूण की जिंदगी एक मां की जिंदगी से बढ़कर नहीं हो सकती.

दरअसल ये मामला एक 16 साल की बलात्कार पीड़िता लड़की का था और उसने कोर्ट से गर्भपात की इजाज़त मांगी थी.

ये लड़की 26 हफ़्ते की गर्भवती है. इस लड़की की तरफ़ से उनके माता-पिता ने याचिका डालकर मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (संशोधित) क़ानून के तहत गर्भपात की अनुमति माँगी थी.

क्या कहना था कोर्ट का?

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, JONAS GRATZER/GettyImages

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

इस मामले कि सुनवाई करते हुए जस्टिस बी विजयसेन रेड्डी का कहना था, ''भ्रूण की जिंदगी या जो अभी पैदा होना है उसको याचिकाकर्ता की ज़िदगी से ऊपर रखकर नहीं देखा जा सकता. गरिमा, आत्म-सम्मान और स्वस्थ ज़िंदगी ( मानसिक और शारीरिक दोनों) जैसे पहलू संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत दिए गए जीने और निजी आज़ादी के अधिकार के तहत आते हैं. इसी अधिकार के तहत एक महिला का यह अधिकार भी शामिल है कि वो गर्भवती बनी रहे या गर्भपात करवा ले ख़ासकर उस मामले में जब वो बलात्कार या यौन शोषण के कारण गर्भवती हो गई हो या फिर उस मामले में जब वो गर्भवती तो हो गई लेकिन वो इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो. हां इतना ज़रूर है कि उन्हें उन पाबंदियों का पालन करना होगा जो क़ानून के तहत लगाई जा सकती हैं.''

मेडिकल बोर्ड ने क्या कहा?

इस मामले में मेडिकल बोर्ड 26वें हफ़्ते में गर्भपात को लेकर सहमति तो दे चुका है लेकिन उसके साथ होने वाली स्वास्थ्य परेशानियों का भी उल्लेख करता है.

इस लड़की की मेडिकल जांच के बाद मेडिकल बोर्ड का मानना था कि 16 साल की ये लड़की गर्भपात कराने के लिए फिट है लेकिन उसके बाद कुछ दिक्कतें आ सकती हैं जैसे गर्भपात के बाद ब्लीडिंग और उसे ब्लड ट्रांसफ्यूशन(ख़ून की कमी के कारण, ख़ून चढ़ाना) की भी ज़रूरत पड़ सकती है.

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

साथ ही बोर्ड कहता है कि इस प्रक्रिया से लड़की के शरीर में रिएक्शन या प्रभाव अभी या फिर बाद में भी हो सकता है. साथ ही गर्भापात में लंबा समय लगेगा जिससे सेप्सिस हो सकता है और सर्जरी या ऑपरेशन करके भी डिलीवरी करानी पड़ सकती है.

शारीरिक और मानसिक प्रभाव

डॉक्टर बलात्कार पीड़िता के मामले में कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं लेकिन ये भी मानते हैं कि 26वें हफ़्ते में होने वाला गर्भपात इस लड़की की शारीरिक ही नहीं मानसिक स्थिति पर भी असर डाल सकता है और उसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं.

गाज़ियाबाद के मैक्स अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ हेमांगी नेगी मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (संशोधित) बिल 2020 की बात करते हुए कहती हैं कि इसमें गर्भपात की अवधि विशेष कारणों की वजह से 20 हफ़्ते से 24 हफ़्ते की गई है जिसमें ये तेलंगाना रेप मामला भी शामिल हो जाता है.

लेकिन डॉक्टर मानते हैं कि इस 16 साल की बलात्कार पीड़िता के साथ होने वाले गर्भपात में भी दिक्कतें आ सकती हैं.

दिल्ली स्थित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ और फैमिली प्लेनिंग की प्रमुख डॉ यामिनी सरवाल इसे गर्भपात की बजाए प्रीमैच्योर यानी समय से पहले डिलीवरी कराने का मामला बताती हैं.

बीबीसी से बातचीत में वे कहती हैं, ''अगर ये प्राकृतिक तरीके से होता है तो कोई ख़तरा नहीं होगा. लेकिन दर्द बढ़ाने के लिए दवाएं दी सकती हैं जिसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं साथ ही अगर सी-सेक्शन या ऑपरेशन के ज़रिए होता है तो ख़तरे बढ़ सकते हैं.''

डॉ हेमांगी नेगी
इमेज कैप्शन, डॉ हेमांगी नेगी

इन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ हेमांगी नेगी बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, ''इस नाबालिग लड़की का मिनी लेबर होगा यानि उसे पेन(दर्द) दिया जाएगा और नॉर्मल डिलीवर करवाई जाएगी और अगर वो नहीं हो पाएगा तो सी-सेक्शन किया जाएगा क्योंकि भ्रूण छह महीने का है.''

ख़ून की कमी

मेडिकल बोर्ड ने भी इस मामले में कहा है कि इस लड़की टर्मिनेशन के दौरान और बाद में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती हैं जिसमें ख़ून की कमी, इन्फेक्शन, यूट्रस रपचर का भी ख़तरा होगा.

क्लाउड नाइन अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ शालिनी अग्रवाल कहती हैं कि क़ानून के मुताबिक 26वें हफ़्ते में गर्भपात को मंजूरी नहीं दी गई है लेकिन एक विशेष मामले में कोर्ट ने अनुमति दी है ऐसे में देरी से हुई ऐसी डिलीवरी में परेशानियां हो सकती हैं.

वे बीबीसी से बातचीत में बताती हैं,'' गर्भपात के दौरान ख़ून ज्यादा बह सकता है और लड़की को ख़ून की कमी भी हो सकती है. कमी को पूरा करने के लिए ख़ून चढ़ाना एक रास्ता होता है. वैसे जब भी ख़ून चढ़ाया जाता है तो पूरी जांच भी होती है लेकिन रिएक्शन का ख़तरा बना रहता है, शरीर पर असर पड़ता है वहीं आगे जाकर कंसीव करने में भी दिक्कत आ सकती है.''

डॉक्टर ये भी मानते हैं कि लड़की केवल 16 साल की है और एक बच्ची ही है. साथ में उसका शरीर भी नॉर्मल या सी-सेक्शन डिलीवरी के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में शारीरिक प्रभाव के साथ-साथ जो मनौवैज्ञानिक प्रभाव होगा वो भी बहुत ज्यादा हो सकता है.

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

डॉ हेमांगी नेगी कहती हैं कि अगर ऊपर दिए गए मामले ना हो लेकिन एक महिला का ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे और उसका असर किडनी पर पड़ने लगे, झटके लगने लगते हैं और उससे स्वास्थ्य पर और दुष्प्रभाव पड़ रहा हो तो हम 20 हफ़्ते के बाद भी गर्भपात का फैसला ले लेते हैं.

मगर, यदि ये ऐसा मामला है जहाँ कि गर्भनिरोधक ने काम नहीं किया हो, तो ऐसे मामलों में 20 हफ़्ते बाद गर्भपात नहीं किया जाता और क़ानून इसकी इजाज़त नहीं देता.

साथ ही वे कहती हैं कि कई बार कपल्स बच्चे का लिंग निर्धारण जांच कराने के बाद गर्भपात कराने की कोशिश करते हैं लेकिन क़ानून में साफ़ लिखा गया है कि किन-किन परिस्थितियों में गर्भपात कराया जा सकता है.

क्या कहता है क़ानून

सांकेतिक तस्वीर

इमेज स्रोत, Thinkstock

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

भारत के स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के अनुसार भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी (संशोधित) बिल 2020 बिल को राज्यसभा में 16 मार्च 2021 को पास किया गया है.

इस बिल के मुताबिक़ गर्भपात की अवधि 20 हफ़्ते से बढ़ाकर 24 हफ़्ते की गई है.

इसमें बिल में कहा गया है कि ये अवधि विशेष तरह की महिलाओं के लिए बढ़ाई गई है, जिन्हें एमटीपी नियमों में संशोधन के ज़रिए परिभाषित किया जाएगा और इनमें दुष्कर्म पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन संपर्क की पीड़ित और अन्य असुरक्षित महिलाएँ (विकलांग महिलाएँ, नाबालिग) भी शामिल होंगी.

इससे पहले भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट , 1971 था, जिसमें संशोधन किए गए हैं.

इस एक्ट में ये प्रावधान था कि अगर किसी महिला का 12 हफ़्ते का गर्भ है, तो वो एक डॉक्टर की सलाह पर गर्भपात करवा सकती है. वहीं 12-20 हफ़्ते में दो डॉक्टरों की सलाह अनिवार्य थी और 20-24 हफ़्ते में गर्भपात की महिला को अनुमति नहीं थी.

लेकिन इस संशोधित बिल में 12 और 12-20 हफ़्ते में एक डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी बताया गया है.

इसके अलावा अगर भ्रूण 20-24 हफ़्ते का है, तो इसमें कुछ श्रेणी की महिलाओं को दो डॉक्टरों की सलाह लेनी होगी और अगर भ्रूण 24 हफ़्ते से ज़्यादा समय का है, तो मेडिकल सलाह के बाद ही इजाज़त दी जाएगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)