कश्मीर के ताज़ा हालात पर क्या कह और कर रहे हैं बाहरी मज़दूर और नेता?

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार के बांका ज़िले के रहने वाले 50 वर्ष के मणि पासवान श्रीनगर के नौगाम रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आने का इंतज़ार कर रहे थे. वो अपने राज्य बिहार वापस जाना चाहते थे.

पासवान बीते 20 वर्षों से कश्मीर में काम करने आते थे. वो श्रीनगर के सौरा में चना-मटर बेचते रहे हैं.

पासवान के मुताबिक़ कश्मीर में वह दिनभर काम करने के बाद रोज़ाना क़रीब 200-300 रुपए कमा लेते हैं. अपने ख़र्च के लिए थोड़ा सा पैसा बचाकर वो बाक़ी पैसा बिहार अपने घर भेज देते हैं, ताकि वहां का ख़र्चा चल सके.

जब मैंने उनसे पूछा कि कश्मीर में हालात ख़राब होने के बावजूद वो हर साल कश्मीर काम करने क्यों आते हैं, तो उनका कहना था, "परदेस में काम करना अच्छा लगता है, इसलिए कश्मीर आते हैं."

लेकिन पिछले कुछ दिनों से कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों पर हुए हमले के बाद पासवान काफ़ी डर गए हैं और बिहार वापस जा रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहते हैं, "मज़दूरों को यहाँ कश्मीर में मारा जा रहा है. इसलिए हम वापस अपने घर लौट रहे हैं. बीते 20 सालों में यहां ऐसा कभी नहीं हुआ. अब तो हमें भी डर लग रहा है. डर के कारण ही हम भाग रहे हैं, वर्ना और कोई बात नहीं थी. कल रात को हम दुकान पर सामान ख़रीदने निकले थे, तभी हमने दो मज़दूरों को मारे जाने की ख़बर सुनी. तब से हम सहमे हुए हैं."

जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें क्या लगता है मज़दूरों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, तो उनका कहना था, "हमें नहीं मालूम कि क्यों मारा जा रहा है? हम तो बस डर गए हैं."

लेकिन क्या सरकार उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाएगी, यह पूछे जाने पर उनका कहना था, "हमको कुछ भरोसा नहीं है. हमसे कोई कुछ बोला भी नहीं कि सुरक्षा देगा, नहीं देगा. हमको क्या पता इस बारे में."

रेहड़ी लगाने वाले सहारनपुर केराजवीर

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले राजवीर बीते नौ वर्षों से कश्मीर आ रहे हैं. यहाँ अपना काम-धंधा करके थोड़ी बहुत कमाई कर लेते हैं. राजवीर श्रीनगर के अलग-अलग इलाक़ों में रेहड़ी लगाते हैं और इसी कमाई से अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं.

राजवीर के अनुसार, वो महीने में क़रीब छह-सात हज़ार रुपए बचा लेते हैं, जिसे वो अपने घर ख़र्च के लिए भेजते हैं. वह कहते हैं कि अगर उनके अपने राज्य उत्तर प्रदेश में काम होता, तो वह कश्मीर काम करने क्यों आते?

लेकिन अब उन्हें भी पहली बार कश्मीर में रहते हुए डर लग रहा है और वह कश्मीर छोड़कर अपने घर वापस जा रहे हैं.

राजवीर भी नौगाम रेलवे स्टेशन पर अपने साथियों के साथ ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे.

वो कहते हैं, "आजकल यहाँ रेहड़ी वालों को मारा जा रहा है. गोलगप्पे बेचने वालों को निशाना बनाया जा रहा है. क्या फ़ायदा यहां रहने का? क्या पता हमारा भी नंबर लग जाए और हम भी मारे जाएं.''

राजवीर कहते हैं, ''जब हमने मज़दूरों को मारने की ख़बर सुनी तो उसी समय फ़ैसला किया कि हम अब कश्मीर में नहीं रहेंगे. कश्मीर में पहले भी हालात ख़राब थे, लेकिन मज़दूरों को नहीं मारा गया था. उस समय (90 के दशक में) भी हमें डर नहीं लगता था. लेकिन अब डर लग रहा है."

सरकार की तरफ़ से सुरक्षा मुहैया कराने के आश्वासन पर राजवीर कहते हैं, "अगर हम सुरक्षित होते तो मज़दूरों को मारा नहीं जाता. हर दिन मज़दूरों को अब यहाँ मारा जा रहा है. इन हालात में कोई यहाँ क्यों रहे?"

सीतामढ़ी के मुश्ताक़

मोहम्मद मुश्ताक़ बिहार के सीतमढ़ी ज़िल़े के रहने वाले हैं और आजकल श्रीनगर के नरबल इलाक़े में अपने साथियों के साथ रहते हैं.

मुश्ताक़ की कहानी ज़रा अलग है. वो पासवान और राजवीर की तरह कश्मीर छोड़कर जाना नहीं चाहते, बल्कि कश्मीर में रहकर अपना काम जारी रखना चाहते हैं.

उनका कहना है कि वह बीते बीस वर्षों से कश्मीर आ रहे हैं और यहाँ अलग-अलग तरह के काम करके अपनी रोज़ी- रोटी कमाते हैं. अपने सात साथियों के साथ मुश्ताक़ नरबल इलाक़े में किराया के एक कमरे में रहते हैं. कश्मीर में मुश्ताक़ किसी भी क़िस्म की मज़दूरी करते हैं. आजकल वह निर्माण के काम में लगे हैं.

वह कहते हैं कि बिहार में जब ज़्यादा गर्मी पड़ती है, तो वो कश्मीर काम करने आ जाते हैं.

मुश्ताक़ मज़दूरी करके हर महीने 10 से 15 हज़ार तक कमा लेते हैं. अपने निजी ख़र्चे के लिए दो हज़ार रखते हैं. बाक़ी पैसे घरवालों को भेज देते हैं.

कश्मीर में मज़दूरों की हत्या की ख़बर सुनकर भी वो डरे नहीं हैं.

मुश्ताक़ कहते हैं, "हमें डर नहीं है. हम अच्छे से रह रहे हैं. कश्मीर छोड़ने का हम सोच भी नहीं रहे हैं. हमें किसी ने डराया या धमकाया नहीं. मैं तो बस ये कहता हूँ कि न किसी हिन्दू को मारा जाए, न मुसलमान को. किसी का भी ख़ून बहाना अच्छा नहीं. मज़दूर आदमी किसी का क्या बिगाड़ता है? अपना काम करता है, और कमाता-खाता है."

उन्हें पूरा विश्वास है कि सरकार उन्हें और उन जैसे बाक़ी मज़दूरों की सुरक्षा के लिए पुख़्ता इंतज़ाम करेगी.

मुश्ताक़ चाहे जो भी कहें लेकिन श्रीनगर के इलावा कश्मीर के दूसरे इलाक़ों से भी कई सारे प्रवासी मज़दूर कश्मीर छोड़कर भाग रहे हैं. बीते कुछ दिनों में कश्मीर में अलग-अलग जगहों पर रह रहे पाँच मज़दूरों की चरमपंथियों ने हत्या कर दी.

इसके अलावा कुछ आम लोगों को भी चरमपंथियों ने निशाना बनाया है. बीते दिनों कश्मीरी पंडित और कश्मीरी सिख की भी हत्या कर दी गई.

कश्मीर पुलिस का दावा है कि इस तरह के हमलों में शामिल चरमपंथियों की पुलिस तलाश कर रही है और कई चरमपंथियों को मार दिया गया है. पुलिस ने सुरक्षा को और मज़बूत करने का दावा किया है. सड़कों पर लोगों की और गाड़ियों की तलाशी बढ़ गई है.

इसके अलावा सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया है और 40 शिक्षकों को दो गैर-मुस्लिम शिक्षकों की हत्या के मामले में पूछताछ के लिए बुलाया गया है.

हाल की घटनाओं के बाद पुलिस ने अलग-अलग मुठभेड़ों में अब तक 13 चरमपंथियों को मारने का दावा किया है. कश्मीर ज़ोन के आईजी विजय कुमार ने दो दिन पहले कहा था कि 'हर एक "सॉफ़्ट टारगेट" को सुरक्षा नहीं दी जा सकती है.

बीबीसी ने आईजी विजय कुमार से इन घटनाओं के हवाले से कुछ सवालों के जवाब माँगे, लेकिन अभी तक उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं मिल सका.

जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने सख़्त लहजे में कहा कि आम नागरिकों के ख़ून के एक-एक क़तरे का बदला लिया जाएगा.

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मारे गए बिहार के दो मज़दूरों के परिजनों को एक-एक लाख की रक़म देने की घोषणा की है.

राजनीतिक दल क्या कहते हैं?

कश्मीर की सभी पार्टियों ने आम लोगों और प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाने की एक स्वर में निंदा की है.

पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह ने इन हमलों की निंदा की और सरकार पर भी निशाना साधा.

उमर ने कहा कि अलग-अलग समुदायों के लोगों के बीच फ़ासलों को बढ़ाने के लिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों से अपील करते हुए कहा, "हम आतंकवाद को इस बात का फ़ैसला करने की इजाज़त नहीं दे सकते कि कौन यहां रहेगा और कौन नहीं. बहुसंख्यक (मुसलमान) समाज के हम सभी लोगों की यह सामूहिक ज़िम्मेदारी है कि हम उन लोगों के पास जाएं और उन्हें विश्वास (सुरक्षा का) दिलाएं जो आज अपनी जान को ख़तरा महसूस कर रहे हैं."

उन्होंने सरकार पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा की प्राथमिक ज़िम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होती है और किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दलों को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.

उन्होंने आम लोगों से भी अपील करते हुए कहा, "जो लोग भी डर के कारण घाटी छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं, उन्हें मैं तहेदिल से कहना चाहता हूं कि मेहरबानी करके आप ऐसा न करें. हम आपको बाहर निकालकर इन आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वालों को उनके नापाक इरादों में कामयाब नहीं होने दे सकते. हममें से ज़्यादातर लोग नहीं चाहते हैं कि आप यहां से जाएं."

पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती ने भी इन चरमपंथी घटनाओं की जमकर आलोचना की और सरकार पर भी निशाना साधा.

महबूबा मुफ़्ती ने इन हत्याओं के बाद कई ट्वीट किए.

एक कश्मीरी पंडित की हत्या के बाद उन्होंने सरकार पर हमला करते हुए कहा, "जम्मू-कश्मीर प्रशासन को पहले से जानकारी थी कि अल्पसंख्यकों पर हमला हो सकता है. बावजूद इसके उन्होंने इसको नज़रअंदाज़ किया. इसके बदले प्रशासन केंद्रीय मंत्रियों की सुरक्षा में लगा था, जिन्हें सिर्फ़ इसलिए कश्मीर बुलाया गया था कि वो बीजेपी के इस दावे को और बढ़-चढ़कर पेश करें कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य हो गए हैं."

एक ट्वीट में महबूबा मुफ़्ती ने पुलिस के ज़रिए कथित तौर पर क़रीब 700 लोगों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया.

उनका कहना था, "700 नागरिकों को गिरफ़्तार किए जाने की ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं करना इस बात को दर्शाता है कि प्रशासन की मंशा ख़ुद को तमाम आरोपों से पाक-साफ़ बताना और दूसरों पर इल्ज़ाम लगाना है. भारत सरकार की दंडात्मक नीतियों के कारण सामूहिक सज़ा और पूरी आबादी का अपमान, यहां समस्याओं को सुलझाने का एकमात्र फ़ॉर्मूला बन गया है."

वहीं सीपीएम के स्टेट सेक्रेटरी और पूर्व विधायक यूसुफ़ तारिगामी ने मज़दूरों की हत्या की निंदा करते हुए कहा, "इस तरह की घटनाएं हम सबके लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं. ये सब कुछ कश्मीर के हित में नहीं है. कोई भी ग्रुप जो किसी भी राजनीतिक सोच के साथ जुड़ा हो, इस बात की इजाज़त नहीं देता कि किसी ऐसे इंसान का क़त्ल किया जाए़ जो निहत्था हो, जिसके पास अपने बचाव के लिए कोई हथियार नहीं. ये लोग कश्मीर में मज़दूरी करके अपना पेट पालने आते हैं."

लेकिन बीजेपी की सोच इन सबसे अलग है. राज्य बीजेपी के अनुसार कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे हैं और चरमपंथियों को यह बात रास नहीं आ रही.

कश्मीर में बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से भाई-चारा रहा है उसको ख़त्म करने के लिए भी ये सब कुछ किया जा रहा है.

अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं, अब चूँकि चरमपंथ यहाँ आख़िरी साँसें गिन रहा है, लेकिन वह दिखाना चाहते हैं कि हम अभी ज़िंदा हैं. ये कुछ दो-चार फ़ीसद लोग हैं, जो तालिबान और पाकिस्तानी सोच के हैं, वही ऐसा कर रहे हैं."

ठाकुर ने यह भी कहा कि हर एक व्यक्ति को सुरक्षा नहीं दी सकता.

कश्मीर में प्रवासी मज़दूर

कश्मीर चैंबर एंड कॉमर्स के अध्यक्ष आशिक़ हुसैन के मुताबिक़ क़रीब 40 हज़ार प्रवासी मज़दूर कश्मीर में काम करने के लिए आते हैं. हालांकि कई लोगों का कहना है कि कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की संख्या लाख से भी ज़्यादा है.

हुसैन के अनुसार, कश्मीर की अर्थव्यवस्था में इन प्रवासी मज़दूरों का भी बड़ा योगदान है. भारत के अलग-अलग राज्यों से हर साल मार्च के महीने से कश्मीर में प्रवासी मज़दूर आना शुरू हो जाते हैं और छह-सात महीने काम करने के बाद अक्टूबर तक वापस चले जाते हैं.

वैसे तो कश्मीर के हर इलाक़े में प्रवासी मज़ूदर काम करते हुए दिखते हैं, लेकिन दक्षिण कश्मीर में प्रवासी मज़दूरो की संख्या ज़्यादा होती है.

विश्लेषक क्या कहते हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें भी समझ नहीं आ रहा कि आम लोगों और प्रवासी मज़दूरों को क्यों मारा जा रहा है?

चट्टान अख़बार के संपादक ताहिर मोहिउद्दीन कहते हैं, "मज़दूरों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, ये बात समझ से बाहर है. सरकार कहती है कि इनको चरमपंथी मार रहे हैं, लेकिन वो लोग (चरमपंथी) इस तरह के हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं ले रहे. लेकिन, जहां तक आम कश्मीरियों की बात है, वो इन घटनाओं पर बहुत दुखी हैं.''

वो कहते हैं, ''आम कश्मीरी ये महसूस करता है कि इस तरह की घटनाओं से कश्मीर बदनाम हो रहा है. अगर चरमपंथी ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें इसकी ज़िम्मेदारी क़ुबूल करनी चाहिए. अगर चरमपंथी ऐसे हमले कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि ये मज़दूर ऐसा कोई काम कर रहे हैं कि चरमपंथी इन्हें मारने का बहाना पेश कर सकें."

ताहिर मोहिउद्दीन कहते हैं कि अगर ये मज़दूर यहाँ से निकल गए तो यहाँ बड़ा संकट पैदा हो सकता है. उसका सारा नुक़सान यहाँ की अर्थव्यवस्था और यहाँ के लोगों को उठाना पड़ेगा.

जम्मू स्थित वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अरुण जोशी कहते हैं कि आम लोगों की इन हत्याओं से उन लोगों को फ़ायद हो सकता है, जो बातचीत के ख़िलाफ़ हैं, जो दिल्ली और श्रीनगर के बीच बातचीत नहीं होने देना चाहते.

इन हत्याओं में किस संगठन का हाथ हो सकता है, इस सवाल पर जोशी ने का कहना था, "ये तो सुरक्षा से जुड़े लोग ही बता सकते हैं."

केंद्र सरकार ने कश्मीर में हालात सामान्य होने और शांति लौटने की बात कही थी, लेकिन क्या ताज़ा घटनाओं के बाद कहा जा सकता है कि सरकार के दावे खोखले साबित हो रहे हैं, इस पर जोशी कहते हैं, "मैं इस बात को नहीं मानता. अगर तीस वर्षों से हालात ख़राब हैं, तो हम ये उम्मीद नहीं कर सकते कि दो वर्षों में सब ठीक होगा."

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