माखन लाल बिंद्रूः वो कश्मीरी पंडित जो चरमपंथियों के ख़ौफ़ के बावजूद घाटी में डटे रहे

    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

श्रीनगर में मंगलवार को जाने-माने फ़ार्मासिस्ट माखन लाल बिंद्रू समेत पाँच लोगों की हत्या से कश्मीर घाटी के उन लगभग 1,000 कश्मीरी पंडित परिवारों को फिर से फ़िक्र में डाल दिया है जिन्होंने 90 के दशक में चरमपंथी घटनाओं में उभार के बावजूद कश्मीर को नहीं छोड़ने का फ़ैसला किया था जबकि उनके ही समुदाय के बहुत सारे लोग अपना घर-कारोबार छोड़ बाहर जाने लगे थे.

68 वर्षीय माखन लाल बिंद्रू श्रीगनर में पिछले चालीस सालों से दवाएँ बेचते थे और वहाँ लोग उन्हें घर-घर में पहचानते थे.

मंगलवार शाम कुछ अज्ञात हमलावरों ने श्रीनगर के इक़बाल पार्क इलाक़े में उनकी ही फ़ार्मेसी "बिंद्रू हेल्थ ज़ोन" पर उनकी गोली मार कर हत्या कर दी.

सामाजिक कार्यकर्ता सतीश महलदार बताते हैं कि एमएल बिंद्रू ने 1970 में खुदरा फार्मेसी का व्यवसाय शुरू किया था. वो कहते हैं, "आम लोगों के बीच में उन्होंने इतना विश्वास अर्जित कर लिया था कि उनकी दुकान पर भीड़ लगी होती थी और उनकी पत्नी को काम में हाथ बंटाना पड़ता था."

उनके बारे में लोगों को भरोसा था कि उनकी फ़ार्मेसी पर नक़ली दवाएं नहीं बिकतीं.

लंबे समय से उनके ग्राहक रहे गुलाम रसूल कहते हैं, "लोगों को लगता था कि वो कभी बिना मान्यता वाली ब्रांड की दवाएं नहीं बेचेंगे."

कश्मीर की सेवा के लिए बेटे को दिल्ली से बुलाया

बिंद्रू ने करण नगर की एक छोटी सी दुकान से शुरू कर इसका दूसरे इलाकों में विस्तार किया और अंत में एक पॉलीक्लिनिक बनाई जहां उनके बेटे जाने माने एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. सिद्धार्थ अपनी फ़िज़ियोथेरेपिस्ट पत्नी के साथ प्रैक्टिस किया करते थे.

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि डॉ. सिद्धार्थ दिल्ली के एक अच्छे अस्पताल में काम कर रहे थे जब उनके पिता ने उन्हें कश्मीर वापस आकर यहां के लोगों की सेवा करने को कहा.

महलदार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक ज्ञापन सौंपने के बाद बीबीसी को बताया, "यह एक दुखद घटना है. बिंद्रू अपने बेटे और बहू को दिल्ली से वापस ले आए और उन्हें यहां क्लीनिक खोलने के लिए बोले. मुझे नहीं पता कि उन्हें क्यों मारा गया. लेकिन इस तरह की हत्याओं से कश्मीर या कश्मीरियों का कोई भला नहीं होता है."

उन्होंने कहा, "मैंने भारत सरकार से कहा है कि इसकी जवाबदेही तय हो. अगर उन्हें लगता है कि यह इंटेलिजेंस की विफलता है तो उन्हें ज़िम्मेदारी तय करनी चाहिए और इसके लिए जवाबदेह लोगों को सज़ा भी मिलनी चाहिए."

चाचा की भी हत्या हुई लेकिन कश्मीर नहीं छोड़ा

बिंद्रू उन क़रीब पांच हज़ार कश्मीरी पंडितों में से हैं जिन्होंने अन्य पंडित परिवारों से उलट घाटी से पलायन नहीं करने का फ़ैसला लिया था.

पुलिस के मुताबिक 1990 के दशक में चरमपंथियों ने पुराने श्रीनगर में बिंद्रू के चाचा की उनकी दुकान के बाहर हत्या कर दी थी, इसके बावजूद उन्होंने यहीं रहने का फ़ैसला लिया था.

बिंद्रू की फिजियोथेरेपिस्ट बेटी श्रद्धा बिंद्रू की शादी कुछ वर्षों पहले हुई थी. इस घटना से स्तब्ध लग रहीं श्रद्धा ने अपने पिता के अंतिम संस्कार से कुछ देर पहले कहा, "एमएल बिंद्रू मरे नहीं हैं. उनका जज्बा जीवित रहेगा. जिन्होंने उन्हें गोली मारी है, वो आएं और सामने सामने हमसे तर्क करें. मैंने क़ुरान (इस्लाम की पवित्र पुस्तक) पढ़ी है जो ये कहता है कि आत्माएं मरती नहीं हैं. मैंने हत्यारों को बहस करने की चुनौती दी है और मुझे यकीन है कि इस तरह की हत्याओं से उन्हें कोई मुक़ाम हासिल नहीं होगा."

बिंद्रू के साथ दो और हत्याएं की गईं

संजय टिक्कू भी 1990 के दौरान कश्मीर से विस्थापित नहीं हुए थे, वे अभी ग़ैर-विस्थापित पंडितों की संस्था के प्रमुख हैं.

टिक्कू कहते हैं, "1990 से पहले कश्मीर में केवल पंडित ही फार्मेसी चलाया करते थे और बिंद्रू सबसे सक्रिय, उत्साही और सफल लोगों में से थे. बिंद्रू ने ग़रीब, ज़रूरतमंदों की मदद करके अपना विश्वास बनाया है. वे ज़रूरतमंदों को मामूली कीमतों पर जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध करवाते थे."

बिंद्रू उन तीन नागरिकों में से एक थे जिन्हें मंगलवार की देर शाम गोली मारी गई थी. श्रीनगर में ही एक ग़ैर-स्थानीय व्यापारी को भी बिंद्रू की हत्या के बाद गोली मार दी गई थी. जबकि तीसरी हत्या कश्मीर से 60 किलोमीटर दूर बांदीपोरा में हुई जहां एक टैक्सी ड्राइवर को मारा गया. इससे पहले, बीते हफ़्ते की शुरुआत में दो और लोगों की हत्या की गई थी.

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक इस साल समूचे कश्मीर में विभिन्न जगहों पर क़रीब 30 लोग मारे गए हैं.

साल की शुरुआत में कश्मीर पंडित राकेश की दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले में हत्या कर दी गई थी, वे पंचायत प्रमुख चुने गए थे. 2020 में एक और कश्मीरी पंडित की त्राल में हत्या की गई थी, जो स्थानीय निकाय में प्रतिनिधि थे.

लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों ने इन हत्याओं की निंदा की है. उन्होंने एमएल बिंद्रू की हत्या को एक निंदनीय करतूत बताया है.

पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि, "निश्चित तौर पर ये हत्याएं जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति के झूठे दावे का जवाब हैं."

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