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कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या, सदमे से उबर नहीं पा रहे परिजन
- Author, बिहार से सीटू तिवारी और यूपी से शहबाज़ अनवर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार से सीटू तिवारी, बीबीसी हिंदी के लिए
"अब क्या जाएंगे कश्मीर, क्या करेंगे वहां जाकर? यहां पर मज़दूरी करके खाएंगे, लेकिन कश्मीर नहीं जाएंगे."
33 साल के मंटू साह ने जब ये मुझसे कहा तो उनके सामने उनसे छोटे भाई अरविंद कुमार साह की लाश रखी थी. 30 साल के अरविंद कुमार साह की बीते 16 अक्टूबर को श्रीनगर में हुए आतंकी हमले में मौत हो गई थी.
बिहार के बांका ज़िले के बाराघाट प्रखंड के पड़घड़ी रहने वाले अरविंद श्रीनगर के ईदगाह इलाके में 17 साल से गोलगप्पे की दुकान लगाते थे. अरविंद के बड़े भाई मंटू साह भी पास ही के मोहल्ले में गोलगप्पे की दुकान लगाते थे.
'गोलगप्पे वाले को मार दिया'
घटना के दिन को याद करते हुए मंटू बताते हैं कि उनका ठेला अरविंद से महज़ दो किलोमीटर की दूरी पर रहा होगा. अचानक उन लोगों ने फ़ायरिंग की आवाज़ सुनी.
मंटू कहते हैं, "मैंने अरविंद को फ़ोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फिर एकदम से हल्ला हुआ, गोलगप्पे वाले को मार दिया. जिस पर मैंने उसे बार-बार फ़ोन किया. बाद में किसी कश्मीरी ने फ़ोन उठा कर कहा कि अरविंद की हालत गंभीर है और वो अस्पताल में है. मैं पहुंचा तो उसकी मौत हो चुकी थी."
"बाद में अगले दिन उसका शव हमें दिया गया जिसको पहले हम दिल्ली, फिर बिहार लाए. कश्मीर सरकार ने 50,000 किराए के लिए और 50,000 का चेक दिया है."
बिहार के पड़घड़ी में दहशत
अरविंद पड़घड़ी गांव के हैं. स्थानीय पत्रकार दीप रंजन बताते हैं, "इस गांव में तक़रीबन 250 घर हैं और हर घर से लोग जम्मू कश्मीर में कमाने के लिए गए हैं. ये लोग ज़्यादातर मिठाई कारीगर, चाट-गोलगप्पा बेचने का काम करते हैं."
अरविंद के पांच भाइयों के परिवार में से तीन कमाने के लिए जम्मू कश्मीर गए थे. सबसे पहले अरविंद के सबसे बड़े भाई बबलू साह कश्मीर गए और वहां पकौड़े की दुकान लगाई.
मंटू बताते हैं, "उनके पीछे-पीछे अरविंद गए और चार साल पहले मैं चला गया. बाद में बबलू साह लौट आए और छह माह पहले उनकी कोविड से मौत भी हो गई."
मंटू आगे कहते हैं, "हम लोग हर महीना 20-25,000 रुपए घर भेजते थे. गर्मियों में गोलगप्पे और सर्दियों में मटर का ठेला लगाते थे. लेकिन अब तो वहां नाम पूछ पूछ कर हत्या हो रही है. पूरे गांव में डर है. सब लोग जल्दी-जल्दी घर वापस लौटना चाहते हैं."
अंतिम दर्शन को तरसे
पड़घड़ी की ये दहशत बगल के भागलपुर ज़िले के जगदीशपुर प्रखंड के वादे सैदपुर तक पसरी है. यहां 18 साल के विक्रम अपने पिता वीरेन्द्र पासवान के श्राद्ध कर्म में लगे हैं. उनके पिता की भी चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी.
छह बच्चों के पिता वीरेन्द्र पासवान के परिवार की ग़रीबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि परिवार के पास उनकी लाश को पटना से अपने पैतृक गांव लाने तक के लिए रुपये तक नहीं थे.
विक्रम बीबीसी से कहते हैं, "हमें तो अपने पिता की लाश भी देखने को नहीं मिली. पैसे ही नहीं थे कि उन्हें पटना से यहां लाते. कश्मीर की सरकार पटना तक लाने को तैयार थी, लेकिन पटना से यहां तक लाने में भी पैसे लगते. इसलिए कश्मीर में ही चाचा ने दाह संस्कार कर दिया और हम लोग यहां श्राद्ध कर्म कर रहे हैं."
वीरेन्द्र पहले कोलकाता में काम करते थे. वो परिवार में अकेले कमाने वाले थे और घर चलाना मुश्किल हो रहा था. इसलिए वो श्रीनगर चले गए थे.
18 साल के विक्रम बताते हैं, "पिताजी महीने में नौ से 10 हज़ार रुपये भेज देते थे. लॉकडाउन में काम धंधा ठप्प हो गया था, लेकिन इतने पैसे ही नहीं थे उनके पास कि वो वापस घर आएं. अब वो 10 अक्टूबर को आने वाले थे. लेकिन हमारी क़िस्मत ऐसी है कि उनका शव भी नहीं आया."
'20 हज़ार की मदद'
वहीं वीरेन्द्र की पत्नी पुतुल देवी बताती हैं कि अब तक उन्हें 20 हज़ार रुपए सरकार से मिले है. उनकी मांग है कि परिवार के एक सदस्य को नौकरी, मुआवज़ा और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था सरकार करे.
वीरेन्द्र पासवान और अरविंद साह की हत्या के बाद जम्मू कश्मीर के अनंतनाग के वानापोह में दो बिहारी मज़दूरों राजा ऋषिदेव और योगेन्द्र ऋषिदेव की हत्या हुई. इसके अलावा चुनचुन ऋषिदेव घायल हैं.
ये तीनों ही अररिया ज़िले के है. राजा ऋषिदेव अररिया के रानीगंज के बौंसी गांव के हैं. 19 साल के राजा ऋषिदेव के चाचा विद्यानंद ऋषिदेव ने बताया, "चार महीने पहले ही वो अनंतनाग गया था. वहां वो निर्माण मज़दूर था. बगल के ही गांव का ठेकेदार उसे लेकर गया था और अब तक उसने घर में दो हज़ार रुपये ही भेजे थे."
विपक्ष के सवाल
राजा की मां की मृत्यु पहले ही हो चुकी है जबकि पिता की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है. ऐसे में उसकी 15 साल की बहन की देखभाल कौन करेगा, राजा के परिजनों के लिए ये सबसे बड़ा सवाल है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इन सभी हत्याओं पर चिंता जताई है. उन्होंने जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा को भी इस संदर्भ में फ़ोन किया है और प्रत्येक परिवार को मुख्यमंत्री राहत कोष से मृतक के आश्रितों को दो-दो लाख रुपये देने की घोषणा की गई है.
वहीं राजद सांसद मनोज झा ने राज्य और केन्द्र सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा है, "जम्मू कश्मीर में जो भी परेशान लोग हैं उन्हें सरकार बिहार लाए और हर महीने उनके भरण-पोषण के लिए 10 हज़ार रुपए दे."
वहीं नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी सरकार पर तंज कसते हुए कहा, "सर्पदंश जैसे मामलों पर सरकार चार लाख रुपये मुआवजा देती है, लेकिन सरकार की नाकामी के चलते पलायन कर रहे बिहार के श्रमवीरों को 2 लाख!"
बीते पांच अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक जम्मू कश्मीर में चार बिहारी मज़दूरों की मौत हो चुकी है और एक मज़दूर चुनचुन ऋषिदेव घायल हैं. बिहारियों पर लगातार हो रहे इस हमले के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर लोग ग़ुस्से का इज़हार कर रहे हैं.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पटना के निदेशक पुष्पेन्द्र कहते हैं, "दो बातें हैं. पहला तो ये कि अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद सरकार का जो शांति का दावा है वो खोखला साबित हो रहा है. दूसरा, आतंकियों के लिए सबसे आसान तरीका ये है कि वो सबसे कमज़ोर आदमी को निशाना बनाएं."
"किसी भी जगह का सबसे कमज़ोर आदमी प्रवासी मज़दूर होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप किसी स्थानीय आदमी की हत्या करेंगे तो वो स्थानीय ख़बर बनकर रह जाएगी. लेकिन अगर आप किसी दूसरे राज्य के व्यक्ति को मारेंगे तो उसका असर दूर तक होगा."
शहबाज़ अनवर, सहारनपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
जम्मू कश्मीर में चरमपंथियों की गोली का शिकार बने सहारनपुर के सग़ीर अहमद का शव सोमवार तड़के घर पहुंचा और सुबह क़रीब नौ बजे उनको दफ़न कर दिया गया. पिता की मौत पर बेटे जहांगीर काफ़ी रो रहे हैं.
वो कहते हैं, "अब्बू पैसा कमाने के लिए गए थे और वहां से कफ़न में लिपट कर आए. घर में अब मैं ही बचा हूं. हमारी मां का इंतक़ाल छह महीने पहले ही कोरोना से हो गया था. हम तो अभी उसी ग़म से नहीं उबर पाए थे."
शकील अहमद को चरमपंथियों ने शनिवार को गोली मारी. इस बात की सूचना शनिवार रात क़रीब 8 बजे घर वालों को दी गई.
सहारनपुर के थाना कुतुबशेर के वॉर्ड सराय हिसामुद्दीन पार्षद मंसूर बदर कहते हैं, "सग़ीर अहमद कारपेंटर थे. वह दस्तकारी भी किया करते थे. पुलवामा में एजाज़ अहमद के यहां काम करते थे. उन्होंने ही सग़ीर अहमद की गोली लगने से मौत की सूचना दी."
बड़ा परिवार आमदनी कम
सग़ीर अहमद के परिवार में चार बेटियां और एक बेटा हैं. तीन बेटियों और बेटे की शादी हो चुकी है जबकि सबसे छोटी बेटी अभी अविवाहित है. सग़ीर अहमद तीन भाई थे और उनके बेटे जहांगीर राजस्थान में मज़दूरी करते हैं.
वो बताते हैं, "हमारे मामू के यहां अगले महीने शादी थी. अब्बू कह रहे थे कि जब थोड़े पैसों का इंतेज़ाम हो जाएगा तो वह नवंबर में ही घर आएंगे. यहां काम की परेशानी रहती थी इसलिए ही वह काम की तलाश में पुलवामा पहुंचे थे जहां उन्हें काम मिल गया था. वह इतने सादे इंसान थे कि उनके पास मोबाइल तक नहीं था."
सग़ीर अहमद का परिवार पैसे की तंगी के बुरे दौर से गुज़र रहा है. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके शव को लेने जाने के लिए परिवार के सदस्यों के पास किराए तक के लिए पैसे नहीं थे.
सग़ीर के रिश्ते के भाई नईम अहमद कहते हैं, "सग़ीर अहमद का शव लेने उनके छोटे भाई और दामाद शनिवार रात को ही रवाना हो गए थे. घर में इतने भी पैसे नहीं थे कि उनको किराए के लिए दिए जा सकें. ऐसे में मोहल्ले के लोगों ने चंदा इकट्ठा कर उन्हें ट्रेन से सफ़र के लिए पैसे दिए. सग़ीर अहमद के शव को पुलवामा प्रशासन ने एंबुलेंस के माध्यम से घर पर भेजा."
सग़ीर अहमद की मौत पर उनके परिवार के लोग बुरी तरह बिलख रहे हैं. रिश्ते के भाई नईम कहते हैं, "देखिए जान लेने वाले चाहे किसी भी मज़हब के हों उनको सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए. हमलों में कभी कोई मज़दूर मरता है तो कभी कोई दूसरा व्यक्ति. हां, हम बस योगी सरकार से इतना और चाहते हैं कि सग़ीर अहमद की ग़रीबी को देखते हुए एक करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की जाए."
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