महात्मा गाँधी भारत में कैसा किसान और मज़दूर चाहते थे?

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    • Author, कुमार प्रशांत
    • पदनाम, गाँधीवादी विचारक

यह सवाल किससे पूछें कि महात्मा गांधी पहले किसान थे या मजदूर? उनसे पूछेंगे तो वे अपने सरल जवाब से आपको लाजवाब कर देंगे कि अरे, यह ऐसा सवाल हुआ कि जैसे आप पूछ रहे हैं कि मैं पहले सांस लेता हूँ कि छोड़ता हूँ!

क्या आपको इतना भी मालूम नहीं है कि जो किसान होता है, वह मजदूर न हो, यह संभव ही नहीं है! किसानी-खेती ऐसा उद्यम है जो किसान की मज़दूरी के बिना संभव ही नहीं है.

लेकिन गांधी जी के इस जवाब को किनारे रख कर हम उनका इतिहास देखें तो कहानी कुछ ऐसी बनती मिलती है.

दक्षिण अफ्रीका में धुंआधार बैरिस्टरी कर रहे भारतीय मोहनदास करमचंद गांधी ने जब जीवन और जीवनाधार दोनों बदला तो ज़मीन का एक बड़ा-सा टुकड़ा ख़रीद कर, पहले फीनिक्स में और फिर रूसी साहित्यकार-दार्शनिक टॉल्सटॉय के नाम पर बसाया अपना आश्रम टॉल्सटॉय फार्म !

यह आश्रम बसाने से पहले उनके हाथ लगी थी दार्शनिक रस्किन की किताब 'अन टू दिस लास्ट' कि जिसने उनके मन में यह विचार और विश्वास जगाया कि हमारी सभ्यता ने सुख-सुविधा का जो संसार रचा है, वह सुख-सुविधा यदि क़तार में खड़े सबसे अंतिम आदमी तक नहीं पहुँचती है, तो यह व्यवस्था घातक और शोषक बनती जाएगी.

इस अहसास ने उन्हें यह समझाया कि किसान का जीवन ही सच्चा जीवन होता है, जिसमें आप अपनी मेहनत से, अपनी ज़रूरतें पूरी करने लायक़ उत्पादन कर सकते हैं. तो यहाँ से किसान गांधी का जन्म होता है.

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जो धरती को जोते-बोये वही किसान-मज़दूर कहाए …

किसान गाँधी का जन्म मन के स्तर पर तो हो गया लेकिन वह साकार तब तक नहीं हो सकता था जब तक कि ऊबड़-खाबड़, पथरीली धरती को ठोक-पीट-काट-खोद कर समतल खेत में न बदला जाए;

जब तक किसानों के रहने के लिए घर-मकान न बांधे जाएं! इतना ही नहीं, किसान बैरिस्टर साहब को इसकी ज़रूरत भी लगी कि अपनी बात कहने-समझाने के लिए उनके पास उनका अपना अख़बार भी होना चाहिए.

अख़बार होना चाहिए मतलब प्रेस होना चाहिए. तो मतलब यह कि बैरिस्टर किसान महाशय को प्रेस चलाना भी आना चाहिए और मशीनों की सामान्य टूट-फूट ठीक करना भी आना चाहिए.

तो हम दक्षिण अफ्रीका के टॉल्सटॉय आश्रम में गाँधी को मज़दूरी-किसानी-मिस्त्रीगिरी करते पाते हैं, जो जमीन काटता-खोड़ता है, हल चलाता है और फसलों की बुआई-कटाई करता है.

और यह सब काम वह अकेले नहीं करता है. उसको मानने-चाहने वाले देशी-विदेशी लोगों की एक टोली ही है कि जो उसके साथ यहाँ क़दम-ताल करती मिलती है. इतना ही नहीं, 'इंडियन ओपीनियन' नाम का जो अख़बार निकालना वे शुरू करते हैं, उसके प्रमुख लेखन-संपादक-मुद्रक भी वे ही हैं.

उन्हें हम लिखते-कागज काटते- कंपोजिंग करते और अख़बार छापने की मशीनें चलाते भी पाते हैं. और यहीं जन्म होता है, युद्ध लड़ने की उस अनोखी शैली का जिसे वे सत्याग्रह का नाम देते हैं और यहीं वे पहली बार गिरफ्तार भी किए जाते हैं. पहली जेल यात्रा भी करते हैं और यहीं पहली बार वे अदालत के शपथ-पत्र पर अपना पेशा लिखते हैं- मैं एक किसान हूँ!

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अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं, "सात दिन के भीतर 20 एकड़ जमीन ली, जिसमें पानी का एक छोटा-सा नाला था. नारंगी और आम के कुछ पेड़ थे. पास ही 80 एकड़ का एक दूसरा प्लॉट था. उसमें विशेषकर फलों वाले पेड़ और एक छोटा-सा झोंपड़ा था. थोड़े दिन बाद उसे भी ख़रीद लिया… पारसी सेठ रुस्तमजी की मदद से इमारती काम शुरू हुआ.''

''75 फुट ऊंची और 50 फुट चौड़ी इमारत एक महीने में तैयार हो गई. मिस्त्रियों और बढ़ई के साथ हम यहीं रहने लगे… 'इंडियन ओपीनियन' प्रकाशित होने के दिन की पहली रात तो ऐसी बीती कि वह कभी भुलाए नहीं भूलती.''

''फर्मा मशीन पर कस दिया गया था लेकिन इंजन चलने से इनकार करने लगा. वेस्ट निराश, डबडबाई आँखों से मेरे पास आए…. मैंने कहा: आँसू बहाने का कोई कारण नहीं है. हाथ से चलने वाले उस सिलिंडर का क्या हुआ? वेस्ट बोले : उसे चलाने के लिए हमारे पास आदमी नहीं हैं. मैंने कहा: यह मेरा काम है! … मैं खड़ा हुआ, दूसरे सब बारी-बारी से खड़े हुए और हमारा रुका काम निकलने लगा."

नियति जैसे उनका हाथ पकड़ कर चल रही थी. 1915 में वे दक्षिण अफ्रीका छोड़ कर भारत लौटते हैं. अब उनके साथ 'अन टू दिस लास्ट' ही नहीं, 'हिंद-स्वराज्य' भी है; और उनके सामने वह हिंद है, जिसके स्वराज्य की बात वे करते हैं.

लेकिन यह 'हिंद' उनके लिए लगभग अजनबी है, क्योंकि बैरिस्टरी की पढ़ाई से ले कर बैरिस्टरी की कमाई तक का लंबा जीवन उन्होंने विदेशों में बिताया है. सत्याग्रह जैसा सनकी विचार भी उन्हें जकड़े हुए हैं. गुरु गोखले को लगता है कि शिष्य का भूत उतारने के लिए कोई जड़ी-बूटी जरूरी है.

वे कहते हैं, ''एक साल आँखें खुली और मुँह बंद रखो और इस देश को जानो-पहचानो और फिर तय करना कि क्या और कैसे करना है.''

तो 1916 का पूरा साल हम गाँधी को एक भारतीय किसान-मज़दूर की वेश-भूषा में, उनकी ही तरह रेलगाड़ी के तीसरे दर्ज में बैठकर सारा देश घूमते-देखते-जानते पाते हैं. वे भारत के खेतों-खलिहानों में जाते हैं, उन उत्सवों-त्योहारों-मेलों-तीर्थों में भटकते हैं, जहाँ देश का मज़दूर-किसान अपने स्वाभाविक विश्वासों-आस्थाओं के साथ घूमता-जीता है. यह पूरे एक साल की साधना का वह काल है, जिसका परिणाम 1917 में हमें बिहार के चंपारण में दिखाई देता है.

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चंपारण में हम गांधी को निलहे किसानों के आंदोलन को आज़ादी के आंदोलन से जोड़ते पाते हैं…

यहां गांधी एक किसान बन कर, देश के पहले राजनैतिक किसान आंदोलन का संचालन करते मिलते हैं. नील की खेती की शोषणकारी प्रथा से मुक्ति के लिए तो यह आंदोलन है ही लेकिन यह इस अर्थ में एक नया चरित्र पा जाता है कि गांधी इसे आज़ादी की लड़ाई से भी जोड़ देते हैं.

किसान देश की आज़ादी का सिपाही बनेगा, यह इससे पहले तो किसी ने सोचा नहीं था; किसानों ने कभी चाहा नहीं था.

लेकिन हम पाते हैं कि चंपारण के बाद कांग्रेस के मंच पर किसानों की जैसी उपस्थिति होती है, वह कांग्रेस की भाषा व भूषा दोनों ही बदल देती है.

कांग्रेस भारत के अंग्रेजीदां आभिजात्य लोगों के हाथ से निकल कर, भारत के ग्रामीण समाज से जुड़ जाती है. इस एक कीमियागिरी ने कांग्रेस की जड़ें भारत की धरती में इतनी गहरी रोपनी शुरू कर दीं कि आज भी कांग्रेसियों और विपक्ष की पूरी कोशिश के बाद भी वे जड़ें पूरी उखड़ी नहीं हैं.

फिर गांधी 29 सितंबर 1919 के 'नवजीवन' में लिखते हैं, "अधिकारियों की स्थिति सचमुच दयनीय है. इन्होंने किसानों को सदा अधिकारियों की दृष्टि से अर्थात लगान वसूल करने वाली नज़रों से ही देखा है. जो अधिकारी अधिक-से-अधिक रक़म उगाह सकता है, उसकी पदोन्नति होती है… जबकि असल बात यह है कि हिंदुस्तान के किसान कंगाल हैं और इनमें से अधिकांश को एक जून ही खाने को मिलता है.''

''और ये किसान हैं कौन? हज़ारों बीघे का मालिक भी किसान है, जिसके पास एक बीघा है वह भी किसान है; जिसके पास एक बीघा भी नहीं है, लेकिन वह दूसरों की ज़मीन जोतता है और पेट के लिए थोड़ा अन्न पाता है, वह भी किसान है. और चंपारण में मैंने ऐसे किसान को भी देखा है जो साहब लोगों की और हम लोगों की सिर्फ़ ग़ुलामी ही करता है और जन्म भर उनका उस ग़ुलामी से छुटकारा नहीं होता है. तो इतने किस्म के किसान हैं कि किसानों की सही-सही संख्या हम कभी जान ही नहीं सकते हैं.''

"किसानों की दशा सुधरने के बजाए दिन-प्रति-दिन बिगड़ती ही जाती है, ऐसा मेरा अनुभव है. उनके चेहरों पर आशा की कोई किरण नहीं है. उनके शरीर जैसे होने चाहिए वैसे मज़बूत नहीं हैं.''

''उनके लड़के पस्तहिम्मत नज़र आते हैं. बड़े-बड़े पाटीदारों के क़र्ज़ के भार से वे कुचले हुए हैं. मद्रास के गाँवों में जाते हुए मेरी कंपकंपी छूटती है. जैसा गहरा अनुभव मेरा खेडा और चंपारण के किसानों का है, वैसा मद्रास का नहीं है फिर भी यहाँ के गाँव जो मैंने देखे हैं, उससे मुझे किसानों के ग़रीबी का अंदाज़ा हो पाता है.''

लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी के साथ मोहनदस करमचंद गांधी

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नाले को साफ करने से नदियां साफ नहीं होंगी, नदियां साफ करोगे तो नाले भी साफ हो जाएंगे …

"हिंदुस्तान के लिए सबसे महत्व का प्रश्न है कि किसानों की समस्या का किस तरह समाधान हो. इस पर हमें प्रतिक्षण विचार करना चाहिए क्योंकि हिंदुस्तान अपने शहरों में नहीं, अपने गाँवों में बसता है.

हिंदुस्तान के अच्छे शहर गिनने बैठें तो वे सौ के अंदर होंगे लेकिन गाँवों की कोई गिनती ही नहीं है. इसलिए हम शहरों को ख़ुशहाल बनाने के जो उपाय करते हैं, उनका हिंदुस्तान पर बहुत कम असर होता है.

गड्ढों-डबरों की सफ़ाई करने से नदी तो साफ़ नहीं होती है न! लेकिन नदियों की सफ़ई हो तो गड्ढों का मैल अपने-से-आप साफ़ होने लगता है. गाँवों के जीवन में सुधार और विकास हो तो बाक़ी भारत काफ़ी हद तक सुधर जाएगा."

चंपारण से गांधी निकलते हैं तो सीधा पहुँचते हैं अहमदाबाद, जहाँ मिल मालिकों और मज़दूरों में सीधी टक्कर की स्थिति बनी हुई है.

हम ध्यान में रखें कि भारत आते ही हम गाँधी को किसानों का नेतृत्व करते पाते हैं, और फिर मज़दूर-मालिकों के बीच ट्रेड यूनियन नेता की भूमिका अदा करते पाते हैं. और मिलें भी कपड़ों की हैं जो भारत के मैनचेस्टर अहमदाबाद में हैं और जिन पर औद्योगिक क्रांति का महल खड़ा किया गया है; और मालिक भी कैसे हैं कि जो गांधी को जानते भी हैं, उनकी कई बार मदद भी कर चुके हैं.

लेकिन आज वे गाँधी दो भिन्न खेमों में खड़े हैं. यहाँ जो रास्ता गांधी ने निकाला वह ट्रेड यूनियन को एक नई हैसियत भी देता है और एक नया रास्ता भी बताता है. वे कहते हैं कि मालिक-मज़दूर की हमारी समझ ही उल्टी है. यहाँ तो दोनों ही मालिक हैं: एक पूंजी का मालिक है, दूसरा श्रम का मालिक है, और दोनों की हैसियत बराबर है.

इसलिए एक-दूसरे को डराने-धमकाने, एक-दूसरे को ठगने, एक-दूसरे से चोरी करने जैसे उपाय काम नहीं देंगे. मज़दूरों को संभव आय और मालिकों को संभव कमाई का विचार करना होगा.

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आठ दिसंबर 1920 के 'नवजीवन' में वे लिखते हैं, "हिंदुस्तान के मज़दूरों के सम्मुख दो रास्ते हैं: जिसकी लाठी उसकी भैंस का पश्चिमी सिद्धांत वह स्वीकार कर लें या फिर पूर्व का सिद्धांत स्वीकार करें कि जहाँ धर्म है,वहीं जय है; कि निर्बल और सबल दोनों को न्याय प्राप्त करने का समान अधिकार है.

"मज़दूरों को सोचना चाहिए कि हिंसा द्वारा वेतन में वृद्धि करवाना संभव भी हो तो क्या उन्हें वह करवानी चाहिए? हिंसा से अधिकार प्राप्त करने का रास्ता आसान तो लगता है लेकिन अंतत: वह दुरूह सिद्ध होता है. जो तलवार चलाते हैं, अक्सर वे तलवार से ही मरते हैं. तैराकों की मृत्यु बहुधा पानी में ही होती है.''

"यूरोप की ओर देखो. वहाँ कोई भी सुखी दिखाई नहीं देता है. किसी को संतोष नहीं है. मज़दूरों का मालिकों पर और मालिकों का मज़दूरों पर विश्वास नहीं है. दोनों में एक तरह की शक्ति तो है लेकिन वह तो भैसों में भी होती है. वे मरते दम तक लड़ते ही तो रहते हैं.''

पाँचसितारा होटल नहीं, मज़दूरों के लिए पाँच सितारा व्यवस्था होनी चाहिए …

"सामान्यत: कहा जा सकता है कि मालिक-मज़दूर झगड़े में मालिकों का अन्याय ज्यादा होता है. लेकिन मैं समझ भी पाता हूँ और देखता भी हूँ कि जिस दिन मज़दूरों को अपने बल का पूरा भान हो जाएगा, वे मालिकों से भी अधिक अन्याय कर सकेंगे. फिर मज़दूर मज़दूर नहीं रहेंगे, मालिक बन जाएंगे… मुझे लगता है कि मज़दूरों के बारे में हमें इस आधार पर सोचना चाहिए :

1. काम के घंटे इतने ही होने चाहिए जिससे मज़दूर लोगों के पास आराम का समय बचा रहे.

2. वे शिक्षा प्राप्त कर सकें, ऐसी व्यवस्था और साधन उपलब्ध होने चाहिए.

3. उनके बच्चों को आवश्यक दूध, कपड़ा और पर्याप्त शिक्षा के साधन प्राप्त होने चाहिए.

4. उनके रहने के लिए स्वच्छ घर होने चाहिए.

5. ऐसी आर्थिक व्यवस्था बननी चाहिए कि बूढ़े होने तक वे उतना बचा सकें, जिससे बुढ़ापे में उनका निर्वाह हो सके.

"आज इनमें से कुछ भी नहीं है. मालिक सिर्फ़ मज़दूरी देखते हैं, मज़दूर की स्थिति नहीं देखते हैं; मज़दूर ऐसी युक्तियां रचने में लगे रहते हैं कि कम-से-कम काम कर के, अधिक-से-अधिक वेतन कैसे बनाया जाए. ऐसे में बचता एक ही राजमार्ग है- दोनों के बीच कौटुंबिक सौहार्द कैसे पैदा हो?

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गाँधी का किसान खेत में अनाज और मन में देश प्रेम पैदा करने वाला इंसान है; गांधी का मालिक पूंजी के बल पर इतराने वाला धनकुबेर नहीं, पूंजी को संचित कर समाज की श्रीवृद्धि करने वाला इंसान है; गांधी का मज़दूर संगठन के ज़ोर पर मनमानी मांग रखने वाली संस्कारहीन भीड़ नहीं बल्कि श्रम और पूंजी के बीच पुल बनाने वाला कारीगर है.

गाँधी का मज़दूर संघ मालिक और मज़दूर के बीच की खाई को इस तरह पाटने वाला कारक है कि आपको दोनों के बीच की खाई दिखाई ही न दे. यह उनका आदर्श चिंतन नहीं, उनका सोचा सबसे रचनात्मक विकल्प था, खेती-किसानी के मामले में जिसकी जाँच हमने अब तक की नहीं है.

यह उस सामाजिक-आर्थिक क्रांति की उनकी ठोस संकल्पना है, जिसके बिना हम भी इस या उस पक्ष के साथ खड़े हो कर नारे तो लगाते हैं, रास्ता नहीं निकाल पाते.

किसानों को उपज का वाजिब दाम मिले, न्यूनतमम समर्थन मूल्य का सहारा ज़रूर मिले लेकिन और न्यूनतम मज़दूरी का क़ानून भी हो और उसका सह्रदयता से पालन भी हो तब खेती-किसानी एक सांस्कृतिक परंपरा बन जाएगी, मात्र अर्थ उपार्जन की गतिविधि नहीं रह जाएगी.

खेती-किसानी के बीच से राज्य को दूर रखने और किसान-मज़दूर की सहकारिता विकसित करने की ज़रूरत है. हमारी परंपरा में खेतिहर-परिवार हुआ करता था जिसमें खेती से जुड़े सभी घटकों की हिस्सेदारी हुआ करती थी, गो-वंश की भी हिस्सेदारी सुनिश्चित थी. गाँधी जिस ग्रामस्वराज्य की कल्पना करते हैं उसमें ऐसी ही सामाजिक संरचना बनेगी.

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