नवजोत सिंह सिद्धू की राजनीति से क्या पंजाब के हिन्दू वोटर कांग्रेस को दे सकते हैं झटका- प्रेस रिव्यू

सिद्धू

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पंजाब कांग्रेस में नवजोत सिंह सिद्धू बनाम कैप्टन अमरिंदर सिंह के टकराव का एक नतीज़ा तो यह हुआ कि मुख्यमंत्री बदलना पड़ा.

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुरुवार को कांग्रेस छोड़ने की भी घोषणा कर दी है. दूसरी तरफ़ सिद्धू भी पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफ़ा दे चुके हैं.

सिद्धू ने अपने इस्तीफ़े में कहा है कि वो पंजाब के हक़ के मुद्दे से कोई समझौता नहीं करेंगे.

अगर हाल के दिनों की सिद्धू की राजनीति देखी जाए तो वे सिखों से जुड़े मुद्दों को एजेंडा बनाने की कोशिश करते रहे. सिद्धू की कोशिश है कि वो शिरोमणि अकाली दल के वोट बैंक में सेंध लगा सकें.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू में आज एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें बताया गया है कि सिद्धू जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, उससे पंजाब में हिन्दू वोटर कांग्रेस का साथ छोड़ सकते हैं.

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''अप्रैल, 2019 में पंजाब कैबिनेट से इस्तीफ़े के बाद जब सिद्धू ने राजनीतिक गतिविधियाँ शुरू कीं तो सबसे पहले फ़रीदकोट में बरगारी गाँव के पास बुर्ज जवाहर सिंह वाला गुरुद्वारा गए.''

''यह गाँव 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब के पन्नों से छेड़छाड़ के मामले में हुए विवाद और हिंसा के बाद काफ़ी सुर्खियों में रहा था. इस घटना को लेकर सिख सड़क पर प्रदर्शन कर रहे थे और दो सिखों की जान भी गई थी.''

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''सिद्धू ने जान-बूझ कर उस मुद्दे को उठाया और इस मामले में न्याय दिलाने की बात की. सिद्धू इस राजनीति के ज़रिए बादल परिवार और राज्य की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार, दोनों को एक साथ निशाने पर ले रहे थे. सिद्धू बताने की कोशिश कर रहे थे कि वे ख़ुद और कांग्रेस सिखों की पक्षधर है.''

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द हिन्दू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि सिद्धू सिख वोटों को लामबंद करने की कोशिश करते दिखे और अपनी छवि सिख परस्त बनाने का प्रयास किया. वो बरगारी में गुरु ग्रंथ साहिब वाली घटना को बार-बार इसीलिए उठा रहे थे. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बरगारी मुद्दे पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर देने के कारण हिन्दू वोट छिटक सकता है और सिद्धू को इसका अंदाज़ा नहीं है. पंजाब में 'पंथिक' सिख वोटर पारंपरिक रूप से शिरोमणि अकाली दल के साथ जुड़े रहे हैं जबकि हिन्दू वोटर कांग्रेस के साथ रहे हैं.''

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''कांग्रेस का जनसमर्थन सिखों और हिन्दुओं दोनों में है. लेकिन 'पंथिक' मुद्दों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देना समस्या पैदा कर सकता है क्योंकि यह खेल अकाली दल का रहा है.

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कांग्रेस इन मुद्दों पर पंजाब की राजनीति में सवार नहीं हो सकती है. अकाली दल पहले से ही इस मामले में बैकफुट पर है. कांग्रेस को चाहिए कि वो ज़मीन पर काम करे न कि भावुक मुद्दों के सहारे राजनीति करे.''

अख़बार से पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार ने कहा है कि सिद्धू की यह कोशिश बैकफ़ायर कर सकती है क्योंकि हिन्दू वोटर छिटक सकते हैं. पंजाब स्थित लेखक और राजनीतिक विश्लेषक देसराज काली ने अख़बार से कहा है कि बरगारी को लेकर सिद्धू की सक्रियता सही नहीं है.

वे कहते हैं, ''सिद्धू को पता होना चाहिए कि बरगारी के अलावा बहुत से ठोस मुद्दे हैं. पंजाब के लोग बेरोज़गारी, ड्रग्स, आर्थिक बदहाली, किसानों और मज़दूरों के साथ आत्महत्या की समस्या से जूझ रहे हैं जबकि सिद्धू ने सिर्फ़ एक एजेंडे पर इस्तीफ़ा दिया है.''

सतनाम सिंह

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जाने-माने सिख हाकिम सतनाम सिंह को आईएस-के ने मारा?

अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तानी शहर पेशावर में गुरुवार को जाने-माने सिख हाकिम या यूनानी मेडिसीन प्रैक्टिशनर को इस्लामिक स्टेट-ख़ोरासान ने मारने का दावा किया है. 45 साल के सरदार सतनाम सिंह अपने क्लीनिक में थे, तभी अज्ञात लोग उनके केबिन में ज़बर्दस्ती घुस गए और गोली मार दी.

पुलिस के अनुसार, उन्हें चार गोलियां मारी गईं और मौक़े पर ही उनकी मौत हो गई. हत्यारे गोली मारकर फ़रार हो गए. हिन्दुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान ने सोशल मीडिया पर संदेश पोस्ट कर इस हत्या की ज़िम्मेदारी लेने का दावा किया है.

इस्लामिक स्टेट ख़ोरासान का ठिकाना अफ़ग़ानिस्तान में है और उसने तालिबान के आने के बाद से कई अफ़ग़ान शहरों में हमला किया है. 26 अगस्त को काबुल एयरपोर्ट पर हमले की ज़िम्मेदारी भी इसी ने ली थी. इसमें कम से कम 170 अफ़ग़ान और 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी.

सतनाम सिंह सिख समुदाय के जाने-माने व्यक्ति थे. पेशावर के चारसद्दा रोड पर उनकी फ़ार्मेसी थी. पेशावर ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा प्रांत की राजधानी है. पिछले 20 सालों से वे इसी शहर में रह रहे थे.

क़रीब 15 हज़ार सिख पेशावर में रहते हैं. ज़्यादातर सिख छोटे-मोटे व्यापार या फ़ार्मेसी का काम करते हैं. हाल के वर्षों में पेशावर में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं. 2016 में तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के सांसद सोरेन सिंह की हत्या कर दी गई थी. 2018 में सिख समुदाय के नेता चरनजीत सिंह की हत्या कर दी गई थी. इसके अलावा टीवी एंकर रविंदर सिंह की हत्या पिछले साल कर दी गई थी.

रेप

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यौन हमले की शिकार अधिकारी को कराना पड़ा टू फ़िंगर टेस्ट

हिन्दी अख़बार दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर एक ख़बर प्रकाशित की है- यौन हमले की शिकार अधिकारी को कराना पड़ा टू फ़िंगर टेस्ट.

इस ख़बर के अनुसार, वायुसेना प्रशासनिक कॉलेज में यौन हमले की शिकार बनी 28 वर्षीय महिला वायुसेना अधिकारी ने वायुसेना के अधिकारियों के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाए हैं.

इनमें प्रतिबंधित टू फ़िंगर टेस्ट करने और अभियुक्त फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट के ख़िलाफ़ शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डालने का मामला है.

अख़बार के अनुसार, कॉलेज कमांडेट समेत वायुसेना अधिकारियों द्वारा 10 सिंतबर को हुई इस घटना पर 20 सितंबर तक कोई कार्रवाई नहीं करने पर महिला अधिकारी ने महिला पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई.

इसी एफ़आईआर में ये आरोप लगाए गए हैं. महिला अधिकारी का यह आरोप भी है कि रेप की पुष्टि के लिए वायुसेना अस्पताल में टू फ़िंगर टेस्ट किया गया.

टू फ़िंगर टेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले ही बैन लगा दिया था. इस मामले में पुलिस ने अभियुक्त फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट को 25 सितंबर को गिरफ़्तार कर लिया था.

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