राज कुंद्रा मामला: पोर्न पर क्या मौजूदा क़ानून से लग पाएगी रोक?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राज कुंद्रा की गिरफ़्तारी के बाद एक बार फिर ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या मौजूदा क़ानून इतने सख़्त हैं कि ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई हो पाएगी. जानकार भी पुराने क़ानून में संशोधन की वकालत कर रहे हैं.
अश्लील फ़िल्में बनाने के आरोप में व्यवसायी और अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के पति राज कुंद्रा की गिरफ़्तारी के बाद भारत में अश्लीलता या अश्लील सामग्री के सवाल पर मौजूदा क़ानूनी प्रावधानों को लेकर चर्चा हो रही है.
ये सवाल भी किए जा रहे हैं कि क्या मौजूदा क़ानूनी प्रावधानों के ज़रिए इस पर रोक लग पाएगी? ये भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या मौजूदा क़ानूनी प्रावधान इतने सख़्त हैं कि इनके ज़रिए इस काम में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई संभव हो पाएगी?
राज कुंद्रा को जिस मामले में गिरफ़्तार किया गया है, उस संबंध में मुंबई पुलिस ने इसी साल फरवरी में ही प्राथमिकी दर्ज की थी. ये पूरा मामला तब शुरू हुआ, जब एक मॉडल ने एक वीडियो जारी किया, जो काफ़ी वायरल हो गया.
इस वीडियो के आने के कुछ ही दिनों के अंदर मुंबई पुलिस ने उमेश कामथ नाम के एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया, जिसका ज़िक्र उस मॉडल ने अपन बयान में किया था. मॉडल का आरोप था कि उन्हें वीडयो कॉन्फ़्रेंस के दौरान अभियुक्तों ने "निर्वस्त्र होकर ऑडिशन'' देने को कहा था.
मुंबई पुलिस का कहना है कि इसी मामले में एक अन्य महिला कलाकार ने भी शिकायत दर्ज की है, जिसके आधार पर कुल नौ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. गिरफ़्तार लोगों में उमेश कामथ भी शामिल है.
पुलिस ने कहा है कि अभियुक्त, संघर्ष कर रहीं महला कलाकारों को वेब सिरीज़ या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर बन रहीं फ़िल्मों में काम दिलाने का आश्वासन देते थे. पुलिस कहती है कि जिस दिन शूटिंग शुरू होती थी, उस दिन इन महिला कलाकारों को ज़बरन अश्लील दृश्य फ़िल्माने के लिए मजबूर किया जाता था.
शूटिंग पूरी हो जाने पर इन्हें कुछ ख़ास मोबाइल ऐप पर अपलोड भी किया जाता था और इसका प्रचार सोशल मीडिया के माध्यम से किया जाता था.

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राज कुंद्रा पर आरोप
कुंद्रा पर इस तरह की फ़िल्मों के निर्माण करने के साथ साथ ब्रिटेन स्थित एक निर्माता कंपनी के ऐप के ज़रिए इन्हें अपलोड करने का भी आरोप है. भारत के क़ानून के हिसाब से अश्लील सामग्री का निर्माण, वितरण या प्रसार एक आपराधिक कृत्य है.
इसलिए कुंद्रा और दुसरे अभियुक्तों के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293 के अलावा धारा 420 और आईटी एक्ट की धारा 67 और 67 ए के तहत मामला दर्ज किया गया है. इसके अलावा महिलाओं को अभद्रता से पेश करने के आरोप में अलग से धाराएँ भी लगाई गई हैं.
वर्ष 2013 में भी दिल्ली पुलिस ने 'क्रिकेट मैच फ़िक्सिंग' के आरोपों को लेकर राज कुंद्रा से पूछताछ की थी. वर्ष 2015 में उन्होंने 'बेस्ट डील टीवी' नामक एक 'होम शॉपिंग चैनल' के प्रमोटर का काम संभाला. फिर उन्होंने एक लाइव स्ट्रीमिंग मीडिया ऐप 'जल्दी लाइव स्ट्रीम ऐप' लॉन्च किया था.

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क़ानूनी प्रावधान
भारतीय दंड संहिता यानी 'आईपीसी' की धारा 292 के अनुसार हर उस चीज़ को चाहे वो कोई पर्चा हो, कलात्मक प्रस्तुति हो, आकृति या पुस्तक हो, जो 'कामुक' पाए जाते हैं, उन्हें अश्लील माना जाएगा. इसमें आगे व्याख्या करते हुए ये भी कहा गया है कि इनमे से कोई भी चीज़ "कामुक रुचि के लिए अपील" करती हो, तो उसे भी अश्लीलता की श्रेणी में रखा जाएगा.
कानून कहता है कि अगर इसका प्रभाव उन व्यक्तियों को भ्रष्ट करता है, जो ऐसी सामग्री को पढ़ने, देखने या सुनने की संभावना रखते हैं, तो ये अश्लीलता की श्रेणी में ही आएगा.
क़ानून में ये भी परिभाषित किया गया है कि अश्लील सामग्री की बिक्री, संचालन, आयात-निर्यात और विज्ञापन के साथ-साथ इसके माध्यम से लाभ कमाना भी अपराध है.
इसी से संबंधित आईपीसी की धारा 293 और 294 के अनुसार 20 वर्ष से कम आयु के लोगों में ऐसी सामग्री की बिक्री या प्रसार और "सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील कृत्यों और गीतों" को भी दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है.
राज कुंद्रा के मामले में भी ऐसा ही किया गया, क्योंकि आरोप है कि अश्लील सामग्री को ऐप पर अपलोड किया गया था.
क़ानून प्रावधान और उससे संबंधित आईपीसी में मौजूद धाराओं से स्पष्ट है कि भारत में अश्लील सामग्री देखने को किसी अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है. अपराध सिर्फ़ उसके निर्माण और प्रसार या वितरण को माना गया है.

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नाबालिग़ बच्चे और महिलाओं की बात अगर आती है, तो फिर इसमें दूसरी धाराएँ भी जोड़ी जाती हैं. ऐसा राज कुंद्रा के मामले में भी किया गया है, जिसमें स्त्रियों के अश्लील चित्रण (प्रतिषेध) अधिनियम की धारा 3, 4, 6 और 7 को लगाया गया है.
पुलिस का कहना है कि अपराध महिला कलाकार के बयान केर आधार पर दर्ज किया गया है, जिनमें आरोप है कि उन्हें डराकर अश्लील फ़िल्मों में काम करने को मजबूर किया गया था.
क़ानून के हलकों में इन्ही प्रावधानों को लेकर चर्चा हो रही है. क़ानून के जानकार मानते हैं कि नए ज़माने के अपराध को पुराने ज़माने के क़ानून के ज़रिए नहीं रोका जा सकता है. उनका कहना है कि इस क़ानून को और भी स्पष्ट किया जाने की ज़रूरत है, जिसमें अपराध, सज़ा, अभियुक्त की भूमिका और क्षेत्राधिकार की व्याख्या स्पष्ट रूप से होनी चाहिए.
जाने माने वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि 1860 में बने इस क़ानून को लेकर अदालतों में रोचक बहसें होती रहीं हैं और अलग-अलग अदालतों ने इसको लेकर समय-समय पर टिप्पणी भी की है.
उनका कहना है कि राज कुंद्रा के मामले में भी जिस ऐप पर अश्लील सामग्री अपलोड करने की बात कही जा रही है, वो ब्रिटेन से संचालित है. इसलिए उस ऐप पर कार्रवाई भारत की पुलिस और संबंधित जाँच अधिकारी के क्षेत्राधिकार से बहार का मामला हो जाता है.

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वो कहते हैं, "इतना पुराना क़ानून है. 1860 के बाद दुनिया कहाँ से कहाँ आ गई है. लेकिन अश्लीलता से निपटने के लिए आज भी सरकारी अमले को जुगाड़ के क़ानूनों से ही काम चलाना पड़ रहा है."
उनका कहना है कि सिर्फ़ अश्लीलता को रोकने के क़ानून से हल नहीं निकल पा रहा है. इसलिए भारतीय दंड संहिता के दूसरे प्रावधानों या धाराओं के अलावा आईटी एक्ट के भी प्रावधानों का सहारा लेना पड़ रहा है.
इसी साल भारत सरकार ने आईटी एक्ट के दिशानिर्देश भी जारी किए हैं, लेकिन जानकार कहते हैं कि इसके बावजूद अब भी ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर अश्लील सामग्री दिखाए जाने को लेकर कोई ठोस नीति स्पष्ट रूप से नहीं नज़र नहीं आ रही है.
एक अन्य वकील रोहिन दुबे कहते हैं कि जो क़ानून मौजूद हैं, उनमें फ़िल्मों या इंटरनेट का उल्लेख नहीं है. उनका कहना है कि आईटी एक्ट भी उतना धारदार नहीं है. जिसकी ख़ामियों का लाभ उठाते हुए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म या इंटरनेट पर मौजूद ऐप धड़ल्ले से अश्लील सामग्री परोस रहे हैं और महिलाओं या बच्चों को शोषण का शिकार बनना पड़ रहा है.
क़ानून के जानकार कहते हैं कि अश्लीलता जिस तरह फैल रही है, समय आ गया है कि इसको लेकर अलग से क़ानून बनाया जाए, जिसमें इसके लिए इस्तेमाल किये जाने वाले नए ज़माने के साधनों का भी स्पष्ट उल्लेख हो.
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