नरेंद्र मोदी ने गृह मंत्री अमित शाह को सहकारी मंत्री क्यों बनाया?

इमेज स्रोत, AMIT SHAH
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह को एक और नया मंत्रालय दिया गया है.
मोदी सरकार में एक नया सहकारिता मंत्रालय बनाया गया है और सात जुलाई को हुए कैबिनेट विस्तार में इसकी ज़िम्मेदारी अमित शाह को सौंपी गई.
अमित शाह लंबे समय तक अहमदाबाद ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रमुख रहे हैं लेकिन अब उनके लिए यह सेक्टर अलग मंत्रालय बन गया.
अमित शाह के प्रमुख रहते हुए ही नोटबंदी के दौरान यहाँ से सबसे ज़्यादा पुराने नोट जमा किए जाने की बात सामने आई थी. यह जानकारी एक आरटीआई के ज़रिए सामने आई थी.
मोदी सरकार इससे पहले भी कई नए मंत्रालय बना चुकी है. जैसे- जल शक्ति, गंगा सफ़ाई, कौशल विकास और आयुष मंत्रालय. कुछ मंत्रालयों और संस्थानों के नाम भी बदले गए. जैसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय शिक्षा मंत्रालय हो गया और योजना आयोग नीति आयोग.
बीजेपी सरकार ने इस तरह के कई बदलाव किए हैं. जैसे, प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली स्थित अपने आवास वाले इलाक़े का नाम रेसकोर्स रोड से लोक कल्याण मार्ग कर दिया था. इन सबका काम पर कितना असर हुआ और लोगों को कितना फ़ायदा हुआ ये बहस के विषय हैं.

इमेज स्रोत, AMIT SHAH
इससे पहले सहकारिता के काम कृषि मंत्रालय के तहत आते थे लेकिन अब अलग मंत्रालय का रूप दे दिया गया है. भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो ने अलग सहकारिता मंत्रालय को लेकर एक प्रेस रिलीज़ जारी की थी.
इसमें कहा गया है कि देश में सहकारिता आंदोलन को और मज़बूती देने के लिए अलग से नीति और प्रशासनिक ढांचा तैयार किए जाएंगे.
पीआईबी की प्रेस रिलीज़ के अनुसार, ''अलग सहकारिता मंत्रालय बनने से दूर-दराज़ के इलाक़ों में पहुँचने में मदद मिलेगी. हमारे देश में सहकारिता आधारित आर्थिक विकास बहुत प्रासंगिक है. इस मॉडल में हर व्यक्ति ज़िम्मेदारी और उत्साह के साथ काम करता है. यह मंत्रालय कारोबार को सुलभ बनाने को लेकर काम करेगा.''
सामग्री् उपलब्ध नहीं है
सोशल नेटवर्क पर और देखिएबाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.पोस्ट Facebook समाप्त
अलग मंत्रालय
अपने बजट भाषण में भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहकारिता को मज़बूत बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. शनिवार को अमित शाह ने कुछ सहकारी संस्थानों के प्रमुखों के साथ बैठक भी की है.
बैठक के बाद अमित शाह ने सोशल मीडिया पर तस्वीर जारी करते हुए लिखा है, ''आज NCUI (नेशनल कोऑपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया) के अध्यक्ष दिलीप संघानी, इफको के चेयरमैन बीएस नकई, प्रबंध निदेशक यूएस अवस्थी और NAFED के चेयरमैन डॉ. बिजेंद्र सिंह जी से भेंट की. मोदी जी के नेतृत्व में हम सहकारिता और सभी सहकारी संस्थाओं को और सशक्त बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं.''
सहकारिता संस्थानों का निर्माण ज़मीनी स्तर पर सामूहिक कोशिश के ज़रिए हुआ है जिनका कल्याणकारी लक्ष्य होता है. मिसाल के तौर पर कृषि क्षेत्र में सहकारी डेयरी, चीनी मिल और कपड़ा मिलों का निर्माण किसानों ने अपने साझे संसाधनों से उत्पादों की अच्छी क़ीमत हासिल करने के लक्ष्य से किया.

इमेज स्रोत, Reuters
अभी भारत में दो लाख के क़रीब सहकारी डेयरी सोसाइटी और 330 सहकारी चीनी मिल हैं. नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सहकारी डेयरी ने 1.7 करोड़ सदस्यों से हर दिन 4.80 करोड़ लीटर दूध ख़रीदा और 3.7 करोड़ लीटर लिक्विड दूध हर दिन बेचा. इसी तरह देश के चीनी उत्पादन में सहकारी चीनी मिलों का हिस्सा 35 फ़ीसदी है.
बैंकिग और वित्तीय क्षेत्र में देश भर के ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में सहकारी संस्थान फैले हुए हैं. गाँव के स्तर पर प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटी हैं. ये सोसाइटी गाँव के ख़र्चों के अनुमान की मांग ज़िला सहकारी बैंकों को भेजती हैं.
ग्रामीणों को क़र्ज़ मुहैया कराने में इन सहकारी संस्थानों की अहम भूमिका होती है. इन सहकारी बैंकों में सामूहिक भागीदारी होने के कारण क़र्ज़ लेने में तोल-मोल का अधिकार किसानों के पास होता है जो कि दूसरे व्यावसायिक बैंकों में नहीं होता है. इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी मार्केटिंग सोसाइटी और शहरी इलाक़ों में सहकारी हाउसिंग सोसाइटी भी हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
इन संस्थानों की वित्तीय ताक़त
2019-20 की नाबार्ड की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल 95,238 प्राइमरी एग्रिकल्चर सोसाइटी (पीएसीएस), 363 डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक और 33 स्टेट कोऑपरेटिव बैंक हैं. स्टेट कोऑपरेटिव बैंक को निवेशकों से 6,104 करोड़ की राशि मिली और कुल 1,35,393 करोड़ रुपये जमा हुए.
वहीं ज़िला सहकारी बैंकों को निवेशकों से 21,447 करोड़ रुपये मिले और 3,78,248 करोड़ जमा हुए. ज़िला सहकारी बैंकों का मुख्य काम किसानों को छोटी अवधि का क़र्ज़ देना है और इसने 19-20 में 3,00,034 करोड़ क़र्ज़ वितरण किए. उसी तरह राज्य सहकारी बैंक कृषि उत्पादों से जुड़ी इंडस्ट्री को क़र्ज़ देते हैं. इनमें चीनी और कपड़ा मिल शामिल हैं. 2019-20 में राज्य सहकारी बैंकों ने 1,48,625 करोड़ रुपये क़र्ज़ दिए.
शहरी क्षेत्रों में सहकारी बैंक और सहकारी क्रेडिट सोसाइटी ने अपनी सेवा का दायरा बढ़ाया है. इस वजह से कई सेक्टर के लोगों को भी फ़ायदा मिला है. आरबीआई के डेटा के अनुसार देश में कुल 1,539 शहरी सहकारी बैंक हैं जिनकी साल 2019-20 में पूंजी 14,933.54 करोड़ रुपये थी.
कृषि की तरह सहकारिता भी समवर्ती सूची में है. इसका मतलब यह है कि सहकारी सेक्टर केंद्र और राज्य सरकार दोनों के अधिकार क्षेत्र में हैं. ज़्यादातर सहकारी सोसाइटी पर राज्य के क़ानून लागू होते हैं. इसमें एक सहकारी आयुक्त और रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी ऑफिस से मदद ली जाती है.
केंद्र ने 2002 में बहुराज्यीय सहकारी सोसाइटी क़ानून बनाया, जिसके तहत एक से ज़्यादा राज्यों में सहकारी सोसाइटी को काम करने की अनुमति मिली.
इनमें से ज़्यादातर बैंक, डेयरी और चीनी मिल जैसे कारोबार शामिल हैं. इनका दायरा एक से अधिक राज्यों में है. इन पर सेंट्रल रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज़ का नियंत्रण होता है लेकिन वास्तविक नियंत्रण स्टेट रजिस्ट्रार का होता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
मोदी सरकार की मंशा पर सवाल
ये भी कहा जा रहा है कि नया मंत्रालय बनने से महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक की तरह देश के बाक़ी राज्यों में भी सहकारिता आंदोलन को गति मिलेगी. सहकारी संस्थानों को पैसा केंद्र से मिलता है और राज्य सरकारें गारंटी देती हैं.
लेकिन यह सिस्टम कुछ राज्यों में ही ठीक से काम कर रहा है. पिछले कई सालों से सहकारी सेक्टर फंड की कमी से जूझ रहे हैं. कहा जा रहा है कि आने वाले सालों में अलग मंत्रालय के कारण सहकारी संस्थानों को नई ऊर्जा मिल सकती है.
महाराष्ट्र की राजनीति में सहकारी संस्थानों का दख़ल बहुत ही प्रभावी है. महाराष्ट्र में 100 से ज़्यादा विधायक किसी ने किसी तरह के सहकारी संस्थानों से जुड़े हैं. यहाँ तक कि महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार और वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनावों से ही राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में सहकारी संस्थानों की भूमिका बहुत ही अहम है.
नया मंत्रालय बनाने पर विपक्षी पार्टियाँ आलोचना कर रही हैं और उनका आरोप है कि बीजेपी का इरादा महाराष्ट्र और गुजरात के सहकारी संस्थानों पर नियंत्रण करना है. 19 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र शुरू हो रहा है और संसद में यह मुद्दा गर्मा सकता है.
विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार ने सहकारी आंदोलन को अपने नियंत्रण में करने के लिए नया मंत्रालय बनाने की चाल चली है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेनिथाला ने अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू से कहा है कि यह मोदी सरकार की सुनियोजित चाल है जिससे सहकारी संस्थानों को राज्यों के नियंत्रण से अपने नियंत्रण में लिया जा सके.

इमेज स्रोत, Getty Images
उन्होंने द हिन्दू से कहा, ''बीजेपी सहकारी आंदोलन पर पूरा नियंत्रण चाहती है, इसीलिए अलग मंत्रालय बनाकर अमित शाह को मंत्री बनाया है. सहकारी राज्य का विषय है और यह संविधान की सातवीं अनुसूची का हिस्सा है. बिना संसद में कोई विधेयक लाए ये मंत्रालय कैसे बना सकते हैं?''
महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में सहकारी संस्थानों की सत्ता तक पहुँचाने में अहम भूमिका मानी जाती है. इनमें से कई पैसे वाले सहकारी संस्थानों पर विपक्षी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, सीपीआईएम और कांग्रेस का नियंत्रण है.
सीपीआई के महासचिव डी राजा ने कहा है कि सरकार ने अलग मंत्रालय बनाने की वजह नहीं बताई है और अमित शाह की नियुक्ति से कई सवाल खड़े होते हैं. डी राजा का कहना है कि यह राज्य के विषय में अतिक्रमण है और वे मॉनसून सत्र में इस विषय को उठाएंगे. सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार की नज़र सहकारी बैंकों की नक़दी पर है.
कॉपी-रजनीश कुमार
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














