मुस्लिम बुज़ुर्ग का वायरल वीडियो मामला : ट्विटर और पत्रकारों पर एफ़आईआर, पुलिस ने किस आधार पर की कार्रवाई?

अब्दुल समद सैफ़ी - 16 जून की तस्वीर
इमेज कैप्शन, अब्दुल समद सैफ़ी - 16 जून की तस्वीर
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद में एक बुजुर्ग की पिटाई के वीडियो को ट्विटर पर पोस्ट करने के मामले में ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने ट्विटर, पत्रकारों और कांग्रेस के कुछ नेताओं पर मुक़दमा दर्ज किया है.

ये वीडियो इन पत्रकारों के अलावा और भी कई समाचार माध्यमों और बड़ी संख्या में दूसरे लोगों ने भी ट्विटर पर पोस्ट किया था. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सिर्फ़ कुछ चुनिंदा लोगों पर ही मुक़दमा क्यों दर्ज किया गया.

ग़ाज़ियाबाद पुलिस का कहना है कि मुक़दमा दर्ज करते समय ये ध्यान रखा गया है कि किसके ट्वीट का कितना असर हुआ है. वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी का कहना है कि पुलिस ने मुक़दमा दर्ज करते समय पोस्ट करने वाले लोगों की मंशा भी देखी है.

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मुक़दमे में ट्विटर, ट्विटर कम्यूनिकेसंश इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक पत्रकार मोहम्मद ज़ुबैर, पत्रकार राना अय्यूब, समाचार वेब पोर्टल द वायर, पत्रकार सबा नक़वी, कांग्रेस नेताओं मस्कूर उस्मानी, सलमान निज़ामी और डॉ. शमा मोहम्मद को अभियुक्त बनाया गया है.

एफ़आईआर की कॉपी

क्या कहती है एफ़आईआर?

पुलिस ने ये एफ़आईआर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 153, 153ए, 295ए, 505, 120बी और 34 के तहत की है. ये मुकद़मा एक पुलिसकर्मी की शिकायत पर दर्ज किया गया है.

एफ़आईआर में कहा गया है, "इन लोगों ने घटना की सत्यता को जाँचे बिना घटना को सांप्रदायिक रंग दे दिया और लोक शांति को अस्त-व्यस्त करने और धार्मिक समूहों के बीच विभाजन के उद्देश्य से वीडियो प्रचारित-प्रसारित किया गया."

पुलिस को शक है कि "ये वीडियो आपराधिक षडयंत्र के तहत वायरल किया गया है और इसका मकसद उत्तर प्रदेश में दंगा भड़काना हो सकता है".

कब-कब क्या हुआ.

पहले ही प्रकाशित हो गई थी न्यूज़ रिपोर्ट

इन पत्रकारों के ट्वीट करने से पहले ही कई मीडिया संस्थानों ने इस घटना के संबंध में रिपोर्टें प्रकाशित की थीं. इन रिपोर्टों में पीड़ित की तरफ से दिए गए बयान को शामिल किया गया था.

"इंडियन एक्सप्रेस" की वेबसाइट पर 16 जून को प्रकाशित रिपोर्ट के शीर्षक में कहा गया था, "बुजुर्ग का कहना है उन्हें बंधक बनाकर पीटा गया और जय श्रीराम के नारे लगवाए गए."

इस रिपोर्ट के साथ बुज़ुर्ग को पीटे जाने की तस्वीर भी प्रकाशित की गई थी. वहीं एनडीटीवी की वेबसाइट पर भी इसी तरह की ख़बर 14 जून को प्रकाशित हुई थी जिसमें पीड़ित बुज़ुर्ग के हवाले से कहा गया था कि उनसे जय श्रीराम और वंदे मातरम के नारे लगवाए गए और उन्हें बुरी तरह पीटा गया.

और कई समाचार माध्यमों में भी ये रिपोर्ट इसी तरह प्रकाशित हुई थी. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर इन चुनिंदा पत्रकारों पर ही एफ़आईआर क्यों दर्ज की गई.

इस सवाल के जवाब में गाज़ियाबाद के पुलिस अधीक्षक ग्रामीण इराज राजा ने बीबीसी से कहा, "किसे कितने लोग फॉलो करते हैं और ट्वीट का प्रभाव कितना है ये भी देखा गया है. हमारे सामने जो ट्वीट्स आए उन्हें ही एफ़आईआर का आधार बनाया गया."

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चुनिंदा लोगों को निशाना बना रही है पुलिस?

वहीं ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "ज़ुबैर के ट्वीट करने से पहले वह वीडियो टाइम्स नाऊ पर भी प्रसारित हुआ था लेकिन पुलिस ने चैनल पर एफ़आईआर नहीं की जिससे पता चलता है कि चुनिंदा लोगों को ही निशाना बनाया गया है."

पुलिस ने ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर पर भी एफ़आईआर की है. एफ़आईआर में सबसे पहले ज़ुबैर का ही नाम है.

ज़ुबैर ने अपने ट्वीट में बुज़ुर्ग की पिटाई का वीडियो शेयर करते हुए घटना के बारे में जानकारी दी थी हालांकि बाद में उन्होंने ये ट्वीट डिलीट कर दिया था और लिखा था, "मैंने जो वीडियो पोस्ट किए थे, डिलीट कर दिए हैं. पीड़ित ने जो जय श्रीराम का नारा ज़बरदस्ती लगवाने का दावा किया था, उसकी पुलिस अधिकारियों और इस मामले पर रिपोर्ट कर रहे पत्रकारों से मेरी बातचीत के आधार पर इस समय पुष्टि नहीं हो सकी है."

वहीं ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े मोहम्मद ज़ुबैर पर टिप्पणी करते हुए शलभ मणि कहते हैं, "जिन लोगों पर एफ़आईआर दर्ज हुई है उनमें एक तथाकथित फैक्टचैकर भी हैं. कम-से-कम फ़ैक्ट चैकर से तो ये उम्मीद की जाती है कि वो जो भी पोस्ट कर रहा है जांच-परख करके कर रहा होगा."

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इस पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रतीक सिन्हा कहते हैं, "इस मामले में ज़ुबैर ने पुलिस से बात की थी और उनका भी पक्ष प्रकाशित किया था. ज़ुबैर के ट्वीट में कहीं भी हिंदू या मुसलमान शब्द का ज़िक्र नहीं है. जो पीड़ित ने कहा है वही उन्होंने पोस्ट किया था, पुलिस का पक्ष मिलते ही उसे भी पोस्ट किया गया था, हमारा सवाल है कि ये कैसे अपराध है. पुलिस ने किसी और संस्थान को निशाना नहीं बनाया है, उन्होंने छह मुसलमान नाम खोजे और उन पर एफ़आईआर कर दी."

प्रतीक सवाल करते हैं, "क्या पीड़ित के आरोप प्रकाशित करना अपराध हो गया है, ये कब से अपराध हो गया है? पुलिस ये चाहती है कि ऐसा माहौल बन जाए कि सिर्फ़ अधिकारिक पक्ष ही प्रकाशित हो. ये सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं आम लोगों को भी डराने की कोशिश है. अगर ये वाकई में कोई मुद्दा होता तो फिर टाइम्स नाऊ या दूसरे मीडिया संस्थानों पर एफ़आईआर होती, न कि हम पर."

इस मामले में समाचार वेबसाइट द वायर पर भी एफ़आईआर दर्ज की गई है. द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने बीबीसी से कहा, "एक अपराध हुआ है, उसके पीड़ित के बयान को अगर हम प्रकाशित या प्रसारित कर रहे हैं तो ये कब से अपराध हो गया है? किसी भी परिस्थिति में दो पक्ष होते हैं, एक पक्ष अपराधी होता है और एक पीड़ित. इस मामले में पुलिस ने अपराधी पक्ष की बातों को सही ठहराया है और पीड़ित की बातों के बेबुनियाद कहा है. पुलिस का मानना है कि पीड़ित के पक्ष को अगर प्रकाशित किया जाता है तो ये अपराध है."

सिद्धार्थ कहते हैं, "ये हमें डराने की कोशिश है लेकिन हम इससे डरने वाले नहीं है, इस एफ़आईआर से डरने का मतलब ये होगा कि हम द वायर को बंद कर दें और घर बैठ जाएं, ऐसा तो नहीं होगा."

ग़ाज़ियाबाद पुलिस ने सिद्धार्थ को पूछताछ के लिए बुलाया है. सिद्धार्थ कहते हैं, "पुलिस से हमें ईमेल मिला है जिसमें कहा गया है हम सात दिनों के अंदर लोनी थाने में आकर बयान दर्ज कराएं. अभी हम ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पुलिस क्या चाह रही है. पुलिस के सामने पेश होना है या नहीं, ये निर्णय अभी हमने नहीं लिया है."

अनूपशहर कस्बे में अब्दुल समद सैफ़ी का घर

'सरकार को बदनाम करने के इरादे से किए गए थे ट्वीट'

शलभ मणि त्रिपाठी का कहना है कि यूपी सरकार और पुलिस पत्रकारों और मीडिया संस्थानों का पूरा सम्मान करती है और उनके दायित्व को भी समझती है लेकिन जिन्हें आप पत्रकार कह रहे हैं, वो पत्रकार नहीं तथाकथित पत्रकार हैं जिनका एकमात्र एजेंडा सरकार को बदनाम करना है. ये ट्वीट भी सरकार को बदनाम करने के इरादे से किए गए थे.

शलभ मणि त्रिपाठी कहते हैं, "बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने दंगे और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने का प्रयास किया है. कई बार आपसे लिखने में ग़लती होती है लेकिन आपकी मंशा ग़लत नहीं होती. सबसे अधिक मायने मंशा के ही हैं, पुलिस को लगा होगा कि इन लोगों की मंशा दंगा भड़काने की थी इसलिए ही इन पर मुक़दमे दर्ज हुए हैं. पुलिस क़ानूनी कार्रवाई कर रही है."

अगर समाचार प्रकाशित करने से माहौल ख़राब होने की आशंका थी तो फिर चुनिंदा लोगों पर ही एफ़आईआर क्यों की गई जबकि यही समाचार बड़े मीडिया समूहों ने भी ऐसी ही भाषा के साथ प्रकाशित किया था. इस सवाल पर शलभ मणि कहते हैं, "पत्रकार और समाचार माध्यमों का पूरा सम्मान है, जो तथाकथित पत्रकार हैं, या जो फ़र्ज़ी पत्रकार हैं या जो माहौल ख़राब करने के मकसद से लिख रहे हैं उनके और मीडिया माध्यमों के साथ समान बर्ताव नहीं हो सकता है."

त्रिपाठी कहते हैं, "समाचार या न्यूज़ चैनलों की भावना दंगा फैलने की नहीं रही होगी. लेकिन कुछ लोग ऐसे है जो सिर्फ दंगा भड़काना चाहते हैं, बीबीसी भले ही उन्हें पत्रकार कह रही है लेकिन उनमें से अधिकतर को पत्रकार बिरादरी ही पत्रकार नहीं मानती है."

वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जिन लोगों पर मुक़दमा दर्ज किया गया है उनके ट्वीट से दंगा भड़कने की संभावना थी. मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार कहते हैं, "पुलिस एजेंसी ने कार्रवाई की है, उन्होंने तय किया होगा कि किनके ट्वीट से दंगा भड़कने की गुंजाइश है. ट्विटर पर दो तरह के लोग हैं, एक ऐसे हैं जिनके पांच फॉलोवर भी नहीं हैं और दूसरे ऐसे हैं जिनके लाखों फॉलोवर हैं. जिनके अधिक फॉलोवर हैं उनकी रीच ज्यादा है. यदि कोई वेरीफ़ाइड अकाउंट का यूज़र है और उसके ढेर सारे फॉलोवर हैं और अगर वो कुछ ग़लत पोस्ट कर रहा है तो ज़ाहिर तौर पर उसका असर ज़्यादा होगा."

शलभ कहते हैं, "बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन पर ट्विटर के यूज़र भरोसा नहीं करते हैं, वो कुछ भी पोस्ट करे उससे फर्क नहीं पड़ता. लेकिन बहुत से यूज़र ऐसे हैं जिनके पोस्ट करने से इंपेक्ट होता है. एफ़आईआर करते हुए ये भी ध्यान रखा गया होगा कि किसने किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया है."

वहीं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय अग्रवाल कहते हैं कि यदि एक जैसी भाषा या शब्दों का इस्तेमाल किया गया है तो ये कैसे तय किया जाएगा कि किसकी मंशा सही है और किसकी गलत. अजय अग्रवाल कहते हैं, 'कंटेंट एफ़आईआर का आधार हो सकता है लेकिन सिर्फ मंशा नहीं.'

अजय अग्रवाल कहते हैं, 'यदि पुलिस को लगता है कि किसी सामग्री से दंगा भड़कने या माहौल ख़राब होने की अशंका है तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है. ये कार्रवाई समाचार माध्यमों पर भी की जा सकती है. पुलिस ने इस मामले में कुछ समाचार माध्यमों पर एफ़आईआर की और कुछ पर नहीं की है. यानी पुलिस ने स्वयं ये तय किया है कि वो किस पर कार्रवाई करेगी. हो सकता है कि पुलिस कुछ समाचार माध्यमों या मीडिया संस्थानों को नाराज़ न करना चाहती हो.'

अंतरराष्ट्रीय पत्रकार सीजे वर्लेमैन ने अपने ट्वीट में वीडियो पोस्ट करते हुए इसे हिंदुत्व के गुंडों का हमला बताया था. लेकिन उनका नाम एफ़आईआर में नहीं है.

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उनके इस ट्वीट को ट्विटर ने अब भारत में प्रतिबंधित कर दिया है. मुक़दमा दर्ज होने के बाद ट्विटर ने इस घटना से जुड़े 50 से अधिक ट्वीट को भारत में प्रतिबंधित किया है. ट्विटर का कहना है कि ऐसा क़ानून का पालन करने के लिए किया गया है.

क्या ये पत्रकारिता पर हमला है?

प्रतीक सिन्हा और सिद्धार्थ वरदराजन इस एफ़आईआर को पत्रकारिता पर हमले की तरह देख रहे हैं.

प्रतीक कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ के मीडिया एडवाइज़र शलभ मणि त्रिपाठी ने ज़ुबैर को खुले तौर पर धमकी दी है कि पुलिस उन्हें खोज रही है. वो कौन होते हैं हमारे सहयोगी को धमकी देने वाले, क्या वो पुलिस हैं? ज़ुबैर के ख़िलाफ ट्रेंड चलाए गए, बड़े-बड़े नेताओं ने ज़ुबैर को निशाना बनाया, ये सब डराने के लिए ही किया जा रहा है."

प्रतीक कहते हैं, "ऑल्ट न्यूज़ फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करने में अहम काम कर रही है. इस मामले को ऑल्ट न्यूज़ और जुब़ैर को निशाना बनाया जा रहा है ताकि हमारे काम को प्रभावित किया जा सके. इससे हमारा काम प्रभावित तो होगा ही क्योंकि हमें अपने संसाधन अब क़ानूनी कार्रवाई में लगाने पड़ेंगे. हालांकि हम हर क़ानूनी सावधानी बरतते हुए अपना काम करते रहेंगे."

प्रतीक कहते हैं, "इस तरह की एफ़आईआर से पत्रकारिता प्रभावित होगी. ये उन पत्रकारों को चुप कराने की कोशिश है जो आज भी सवाल पूछ रहे हैं, उन्हें ही निशाना बनाया जा रहा है जो सरकार के सामने तथ्य रखने की हिम्मत कर रहे हैं."

वहीं सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं, "ये एक बेबुनियाद एफ़आईआर है, जिसका मकसद सिर्फ़ उत्पीड़न करना है, जाहिर है कि जिस मीडिया से सरकार को ज़्यादा परेशानी है, उन्हीं लोगों को निशाना बनाया गया है."

परवेश गुर्जर का घेर, जहां अब्दुल समज सैफी के साथ मारपीट का वीडियो बनाया गया.

क्या था मामला

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद के लोनी इलाके में एक 72 वर्षीय मुसलमान बुज़ुर्ग पर हमला हुआ था. बुज़ुर्ग की दाढ़ी काट दी गई थी और इसका वीडियो भी वायरल हुआ था. बुज़ुर्ग ने आरोप लगाया था कि अज्ञात युवकों ने उन्हें अग़वा करके हमला किया, उनकी दाढ़ी काट दी और जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए मजबूर किया.

हालांकि पुलिस जांच में पता चला था कि बुज़ुर्ग और हमलावर युवक एक दूसरे को पहले से जानते थे और उन पर हमला निजी कारणों से हुआ था. पुलिस ने इस मामले में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया है.

पुलिस का कहना है, "हमले के पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं था और ना ही बुज़ुर्ग से जय श्रीराम के नारे लगवाए गए थे. हमला करने वालों में मुसलमान युवक भी शामिल थे."

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