12वीं की बोर्ड परीक्षाएं रद्द लेकिन कैसे मिलेगा कॉलेज में एडमिशन

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बारहवीं के बोर्ड की टेंशन, नतीजों का बेसब्री से इंतज़ार, फिर कॉलेज में एडमिशन के लिए भागदौड़ और ऊंची-ऊंची कटऑफ़ लिस्ट, हर साल दिखने वाला ये माहौल इस बार कुछ अलग होगा.
इस बार ना तो बोर्ड की परीक्षाएं हैं और ना ही उस तरह की भागदौड़. क्योंकि अब बारहवीं के बोर्ड की परीक्षाएं रद्द हो चुकी हैं.
कोरोना वायरस से बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए सीबीएसई ने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं रद्द करने की घोषणा कर दी है. इसके बाद आईसीएसई और सीआईएससीई भी बोर्ड परीक्षाएं रद्द कर चुके हैं.
पीएम नरेंद्र मोदी ने 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं रद्द होने की घोषणा के बाद अधिकारियों को परीक्षा परिणाम तैयार करने को लेकर निर्देश दिए हैं.
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बताया गया है कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की एक कमेटी अब इससे संबंधित मापदंड तैयार करेगी.
फिलहाल 12वीं की परीक्षाओं को लेकर बनी हुई कशमकश ज़रूर ख़त्म हो गई है लेकिन इसके साथ ही उच्च शिक्षा में प्रवेश की शंकाएं पैदा हो गई हैं.
कैसे होता है एडमिशन

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अभी तक उच्च शिक्षा में विभिन्न कोर्सेज़ में दो तरह से प्रवेश मिलता है. एक कटऑफ़ के आधार पर यानि बारहवीं के अंकों के आधार पर कटऑफ़ लिस्ट तैयार होती है और उसके अनुसार एडमिशन मिलता है.
दूसरा पेशेवर कोर्सेज़ में प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर. इसमें बारहवीं के नंबरों की वेटेज हो भी सकती है और नहीं भी, लेकिन प्रवेश परीक्षा में मिले अंकों के आधार पर कोर्स में एडमिशन मिलता है. जैसे जेईई, नीट परीक्षा, बीबीए, पत्रकारिता और लैंग्वेज कोर्स आदि.
जानकार मानते हैं कि 12वीं की परीक्षाओं को रद्द करना 10वीं की परीक्षाओं को रद्द करने से अलग है. 10वीं के बाद स्कूल में ही एडमिशन होता है लेकिन 12वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए चयन होता है.
ऐसे में ये देखना भी ज़रूरी हो जाता है कि परीक्षाएं रद्द होने का उच्च शिक्षा में प्रवेश पर क्या असर पड़ेगा.
मूल्यांकन का तरीका

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इस संबंध में सीबीएसई के पूर्व चेयरमैन अशोक गांगुली कहते हैं कि मौजूदा स्थितियों में सबसे ज़्यादा ज़रूरी है मूल्यांकन का सही तरीक़ा निकालना. ये ना सिर्फ़ परीक्षा में अंक देने को लेकर है बल्कि कॉलेज में एडमिशन के संदर्भ में भी है.
अशोक गांगुली बताते हैं, "केवल प्रीबोर्ड के आधार पर परीक्षा के नतीजे घोषित करेंगे तो वो सही मूल्यांकन नहीं होगा. इसमें कई रास्तों और संयोजनों पर काम करना पड़ेगा. इंटरनल असेस्मेंट के एक से ज़्यादा आधार हो सकते हैं जैसे-
- स्टूडेंट्स के ग्यारहवीं कक्षा के जो नतीजे आए हैं उसके कुछ प्रतिशत नंबर लिए जा सकते हैं.
- 12वीं क्लास में कुछ प्रीबोर्ड परीक्षाएं दी गई हैं उससे कुछ प्रतिशत ले सकते हैं.
- तीसरा ये कि बच्चों ने जो छमाई परीक्षाएं यूनिट टेस्ट दिया होगा, उन्हें आधार बिंदू बनाया जा सकता है. इंटरनल असेस्मेंट के लिए चार-पांच टूल्स का इस्तेमाल करना पड़ेगा.
मौजूदा समय में नतीजे घोषित करना ही एकमात्र मक़सद नहीं है बल्कि प्रमाणिक, विश्वसनीय और सही मूल्यांकन भी ज़रूरी है ताकि बच्चों के साथ न्याय हो सके.
बारहवीं कक्षा में कई बच्चे प्रीबोर्ड, टेस्ट या प्रोजेक्ट पर बहुत अधिक ध्यान नहीं देते. वो अंतिम परीक्षा की तैयारी करते हैं. ऐसे में वो भी अंकों में पिछड़ सकते हैं.
इसीलिए जानकार किसी एक बिंदु को आधार बनाने की बजाए कई बिंदुओं पर ज़ोर देते हैं.
कॉलेज एडमिशन पर प्रभाव

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लेकिन, परीक्षा के नतीजे आने के बाद विश्वविद्यालयों में एडमिशन के पड़ाव पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं.
अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को भी विचार करना है कि उनके यहां प्रवेश के क्या मापदंड अपनाए जाएं क्योंकि संभव है कि पारंपरिक मापदंड इस बार उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाएं.
इसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी अपना रुख़ ज़ाहिर किया है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति पीसी जोशी ने मीडिया से बातचीत में कहा है कि इस असाधारण स्थिति को देखते हुए बिना गुणवत्ता से समझौता किए प्रवेश प्रक्रिया को अनुकूल बनाया जाएगा.
उन्होंने कॉमन एंट्रेंस टेस्ट को भी एक अच्छा विकल्प बताया.

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पीसी जोशी ने कहा, "योग्यता जांचने का कोई तरीक़ा होगा. ये असाधारण परिस्थितियां हैं. सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ कॉमन एंट्रेंस टेस्ट एक अच्छा तरीक़ा हो सकता है जो पूरे भारत के मैरिट पर आधारित होता है. हम नई स्थितियों के साथ अनुकूल बनने की कोशिश करेंगे और देखेंगे कि क्या तरीक़ा निकलता है. हम 12वीं के अंकों को लेकर बोर्ड के नतीजे का भी इंतज़ार करेंगे."
फिलहाल ये उलझन हर जगह है कि प्रवेश अंकों पर आधारित हो या उसके लिए कोई और तरीक़ा भी अपनाया जाए.
मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज के प्रिंसिपल राजेंद्र शिंदे कहते हैं कि 'अभी पूरी अनिश्चितता की स्थिति है. पता नहीं है कि सरकार नतीजों के लिए क्या फॉर्मूला निकालेगी. सेंट ज़ेवियर में एडमिशन की बात करें तो यहां सरकारी सहायता प्राप्त कोर्सेज के लिए कटऑफ़ निकाली जाती है और बिना सहायता प्राप्त पेशेवर कोर्सेज के लिए प्रवेश परीक्षा होती है.'
राजेंद्र शिंदे बताते हैं, "अब तक हम प्रवेश परीक्षा को 60 प्रतिशत वेटेज और अंकों को 40 प्रतिशत वेटेज देते हैं. लेकिन अब हम प्रवेश परीक्षा का वेटेज बढ़ा सकते हैं."
अशोक गांगुली का मानना है कि यहां भी एक से ज़्यादा टूल्स को आधार बनाना होगा. वह कहते हैं कि इस बार बच्चों को छांटने की बजाए चयन का तरीक़ा अपनाएं. ऐसा ना होने पर मेधावी बच्चों को कठिनाई हो सकती है.
नंबरों में गड़बड़ी

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चुनौतियां सिर्फ़ नतीजे देने के तरीक़े को लेकर नहीं है बल्कि इसमें होने वाली गड़बड़ियों को रोकने की भी है.
अशोक गांगुली कहते हैं कि विभिन्न बोर्डों को सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा ना हो कि बच्चों के नंबरों में बहुत ज़्यादा उछाल आ जाए. ये मूल्यांकन स्कूल में किया जाएगा तो नंबरों में बढ़ोतरी हो सकती है. हमें इसके लिए ऐसे मापदंड लाने होंगे जिससे इसे रोका जा सके.
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अशोक गांगुली इससे बचने के तरीक़े भी बताते हैं-
- पिछले साल की क्लास में विभिन्न विषयों में जो औसत नंबर रहे हों उसे एक आधार बिंदू बनाया जाए. इसके आधार पर 2, 3 या 5 अंक प्लस या माइनस किये जा सकते हैं.
- स्टूडेंट्स ने दो साल पहले जो दसवीं की परीक्षाएं दी थीं उनके अंकों को आधार बनाया जा सकता है. इसमें ऊपरी सीमा तय की जा सकती है.
राजेंद्र शिंदे भी इसे लेकर चिंता जताते हैं. वह कहते हैं कि सरकार को नतीजों के लिए सख़्त और स्पष्ट दिशानिर्देश देने होंगे वरना अच्छे नतीजों के लिए स्कूल ये तरीक़ा अपना सकते हैं.
विदेशों में शिक्षा पर असर

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भारत में पढ़ने वाले बच्चे केवल देश में ही उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं करते. कई बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में भी एडमिशन लेना चाहते हैं. ऐसे में 12वीं की परीक्षाओं में हुए बदलाव का उस पर क्या असर होगा.
अशोक गांगुली का कहना है कि इससे कोई परेशानी नहीं आएगी. जुलाई की शुरुआत तक नतीजे आ सकते हैं और बच्चे विदेशों में आवेदन दे सकते हैं. वहां इन नतीजों की स्वीकार्यता होगी.
आगे का रास्ता
इन मुश्किलों और चुनौतियों के बीच जानकार इसे एक मौका भी मानते हैं.
अशोक गांगुली का कहना है कि 'ये अभिशाप में मिला वरदान है. इससे जो कटऑफ़ की गला काट प्रतियोगिता होती थी वो कम हो जाएगी. हो सकता है कि कटऑफ़ अब 100 अंकों तक ना पहुंचे. लेकिन, हमें आगे का रास्ता भी तैयार करना होगा.'
वह कहते हैं कि 'कई दूसरे देशों की शिक्षा व्यवस्था की तरह हमें भी आगामी सत्र में कम से कम 10वीं और 12वीं में रचनात्मक आकलन तत्काल लाना पड़ेगा ताकि इस प्रकार की महामारी की स्थिति उत्पन्न होने पर हम बिना परीक्षा कराए भी बच्चों को सही मूल्यांकन के आधार पर परीक्षा फल दे सकें.'
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