कोरोना: डॉक्टर केके अग्रवाल की मौत और उससे उठते सवाल, वैक्सीन की दो डोज़ के बाद मौत क्यों?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पद्मश्री से सम्मानित भारत के जाने-माने हृ्दय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर केके अग्रवाल का सोमवार को निधन हो गया. उनका दिल्ली के एम्स अस्पाताल में कोविड-19 का इलाज चल रहा था.
लेकिन सोमवार देर रात वो कोरोना से जंग हार गए. उन्होंने वैक्सीन की दोनों डोज़ ले ली थी. दूसरी डोज़ लिए हुए उन्हें 15 दिन से ज़्यादा हो गए थे.
इसके बाद भी डॉक्टर केके अग्रवाल के साथ ऐसा हुआ, ये अपने-आप चौंकाने वाला मामला है.
ग़ौरतलब है कि भारत में अभी दो ही टीकों को सरकार से मंजूरी मिली है कोविशील्ड (एस्ट्राज़ेनेका का भारतीय नाम) और कोवैक्सीन. स्पुतनिक-वी जल्द ही उपलब्ध होगी.

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टीका ही एकमात्र उपाय
चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले यह ज़रूर याद रखना चाहिए कि वैज्ञानिकों के मुताबिक़ वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीनेशन ही प्रभावी तरीका है. इस रिपोर्ट का मक़सद वैक्सीन के प्रति संदेह पैदा करना बिल्कुल नहीं है. इसका मक़सद केवल आपको आगाह करना है कि वैक्सीन लगने के बाद सभी एहतियातों का पालन करें.
कोरोना की वैक्सीन को लेकर अब तक जो तथ्य भारत सरकार और वैक्सीन निर्माताओं की तरफ़ से रखे गए हैं, उससे यही पता चलता है कि वैक्सीन की दो डोज़ लगने के 15 दिन बाद अगर आपको कोरोना संक्रमण होता भी है तो अस्पताल जाने, आईसीयू और वेंटिलेर तक पहुँचने की नौबत नहीं आएगी.
पिछले महीने तक भारत सरकार की तरफ़ से कहा जा रहा था कि वैक्सीन ही मौत से बचाव का उपाय है.
एस्ट्राजेनेका की वेबसाइट पर साफ़ शब्दों में दावा किया गया है कि "वैक्सीन के फेज़-3 ट्रायल के नतीज़ो में पाया गया है कि वैक्सीन आपको कोविड-19 के गंभीर संक्रमण, अस्पताल जाने और मौत से 100 फ़ीसद सुरक्षा प्रदान करती है."
इस वजह से वैक्सीन के बाद जिनको कोरोना संक्रमण हो भी रहा था, उन्होंने भी वैक्सीन लगाने की वकालत की थी.

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टीके के बाद मौत
वैक्सीन के दो डोज़ लगने के बाद कोरोना से हारने वालों में डॉक्टर केके अग्रवाल अकेले नहीं हैं.
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के आँकड़ों के मुताबिक़ कोरोना की दूसरी लहर में 269 डॉक्टर अपनी जान गंवा चुके हैं, हालांकि उन्होंने इसको स्पष्ट नहीं किया है कि इनमें से कितने डॉक्टर्स ऐसे हैं, जो वैक्सीन की दोनों डोज़ ले चुके थे.
यहाँ ये भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत सरकार ने 16 जनवरी 2021 से कोरोना के ख़िलाफ़ टीकाकरण अभियान की शुरुआत की थी. पहले चरण में स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को प्राथमिकता के आधार पर वैक्सीन लगाई गई थी.
इस आधार पर माना जा सकता है कि अधिकतर स्वास्थयकर्मियों को अब तक दोनों टीके लग चुके हैं.

भारत सरकार का पक्ष
इसी वजह से डॉक्टर केके अग्रवाल की मौत के बाद सवाल खड़े हो रहे हैं कि वैक्सीन के दोनों डोज़ के बाद भी क्या मौत का ख़तरा है?
अब तक ऐसी कितने मौतें भारत में हुई हैं? यही सवाल मंगलवार को प्रेस कॉन्फ़्रेस में पूछा गया.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने इस पर जवाब देते हुए कहा, "वैक्सीन लेने के बाद कोरोना से संक्रमित होने का ख़तरा बहुत ही कम हो जाता है. वैक्सीन एफ़िकेसी के डेटा भी कहते हैं कि कुछ ही प्रतिशत लोगों में संक्रमण होने का ख़तरा वैक्सीन लगने के बाद भी होता है. आँकड़े बताते हैं कि भारत में ऐसा बहुत ही कम लोगों के साथ हुआ है. आईसीएमआर ने इससे पहले इस तरह के इंफेक्शन का डेटा साझा किया है."
नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल ने इसके जवाब में कहा कि अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में विस्तृत डेटा साझा करेंगें.
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बीबीसी ने आईसीएमआर के उस आँकड़े को भी ढूंढा जिसका जिक्र लव अग्रवाल कर रहे थे. 21 अप्रैल 2021 को आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैक्सीन लगने के बाद होने वाले संक्रमण के मामलों पर आँकड़े पेश किए थे.
दरअसल, वैक्सीनेशन के बाद भी अगर आपको कोरोना संक्रमण हो जाए, तो इसे 'ब्रेकथ्रू इंफेक्शन' कहा जाता है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बलराम भार्गव ने आँकड़ों के आधार पर बताया, "प्रति 10 हज़ार वैक्सीनेशन में ऐसे 2-3 मामले देखने को मिले हैं जिन्हें वैक्सीन लगने के बाद भी संक्रमण हो गया. ऐसे मामले कोवैक्सीन लेने वालों में कोविशिल्ड के मुक़ाबले थोड़े ज़्यादा मिले हैं. लेकिन कुल मिलाकर पूरे वैक्सीनेशन प्रक्रिया में ये बहुत ही कम हैं और इससे चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है."
इन आँकड़ों में पहले और दूसरे डोज़ बाद के संक्रमण के मामले दोनों शामिल हैं. ये भी बताया गया कि स्वास्थ्य कर्मी और फ्रंटलाइन वर्कर्स में ऐसे संक्रमण का ख़तरा औरों के मुक़ाबले ज़्यादा है. लेकिन इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दोनों वैक्सीन डोज़ लेने के बाद भारत में कितने लोगों की मौत हुई इस बारे में नहीं बताया गया.
ब्रेकथ्रू इंफेक्शन पर एक छोटा सा सर्वे भारत के फोर्टिस अस्पताल ने भी किया. उनके यहाँ 113 स्टाफ़ जिन्होंने वैक्सीन की दो डोज़ ले ली थी, उनमें से 15 स्टाफ को वैक्सीन लगने के बाद भी कोरोना संक्रमण हुआ. इनमें से केवल एक को अस्पताल में भर्ती कराने की ज़रूरत पड़ी.

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अमेरिका में ब्रेकथ्रू इंफेक्शन के मामले
ब्रेकथ्रू इंफेक्शन के मामले केवल भारत में ही नहीं मिल रहे हैं. 26 अप्रैल 2021 तक अमेरिका में 95 लाख लोगों का टीकाकरण हो चुका था. सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक़ इनमें से 9,045 लोगों में 'ब्रेकथ्रू इंफेक्शन' हुआ.
835 लोग यानी करीब 9 फ़ीसद लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. इनमें से 132 यानी 1 प्रतिशत की हालत गंभीर थी और उनकी मौत हो गई. अस्पताल में भर्ती होने वाले एक-तिहाई लोगों में कोरोना के कोई लक्षण नहीं देखे गए.
बाक़ी जिन 15 प्रतिशत लोगों की मौत हुई उनमें मौत का कारण कोविड या उससे जुड़ा कोई कारण नहीं था, यानी उनकी मौत का कारण कुछ और ही था.

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एफ़िकेसी बनाम इफ़ेक्टिवनेस
दिल्ली के एम्स के डॉक्टर संजय राय कहते हैं, "अमेरिका ही नहीं दुनिया के बाक़ी देशों में भी वैक्सीनेशन के बाद 'ब्रेकथ्रू इंफेक्शन' के मामले देखने को मिले हैं. इसलिए वैक्सीन की दो डोज़ और 15 दिन के बाद मौत को 100 प्रतिशत मात देने की बात अब सही नहीं ठहरती है."
लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है कि वैक्सीन के ट्रायल में दूसरे नतीज़े आए जबकि वास्तविक नतीज़े कुछ और देखने को मिल रहे हैं?
इस पर डॉक्टर संजय राय कहते हैं, "मामला एफ़िकेसी बनाम इफे़क्टिवनेस का है. वैक्सीन की एफ़िकेसी का मतलब है कि वैक्सीन किस हद तक वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है. वैसे भी किसी भी वैक्सीन ने अभी तक 100 फ़ीसद एफ़िकेसी का दावा नहीं किया है. एफ़िकेसी डेटा, निकालते समय ट्रायल में परिस्थितियाँ नियंत्रित होती हैं. ट्रायल में शामिल होने वाले वॉलेंटियर और वैक्सीन लगाने वाले लोग दोनों पूरी तरह से बातों को समझते हैं."
डॉ. राय समझाते हैं, "वैक्सीन की इफे़क्टिवनेस (कारगर होने) का पता असलियत में तब चलता है जब एक बड़ी आबादी को इसे लगाया जाता है. तब वैक्सीन लगाने और लगवाने वाले दोनों पर किसी का वश नहीं होता. न ही वैक्सीन को ट्रांसपोर्ट करते वक़्त, उसे स्टोर करते वक़्त, उस तरह का नियंत्रण होता है जैसा ट्रायल के दौरान संभव है. यही वजह है कि वैक्सीन एफ़िकेसी से वैक्सीन इफेक्टिवनेस हमेशा ही कम देखने को मिलती है."

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संभावित कारण
केंद्र सरकार का कहना है कि वैक्सीन की दो डोज़ के बाद मौत के मामलों पर आईसीएमआर नज़र रख रहे हैं.
भारत में कोरोना संक्रमण से हो रही मौत का आँकड़ा आईसीएमआर के पास ही अपडेट होता है, वहाँ एक कॉलम होता है जिनकी मौत हुई उन्होंने वैक्सीन ली है या नहीं.
कई दूसरे जानकार भी मानते हैं कि भारत सरकार को इस पर शोध करके इस पर नतीजे जल्द ही सार्वजनिक करने चाहिए. देरी होने पर वैक्सीन लेने में हिचक को ऐसे मामले बढ़ावा देंगे.
डॉक्टर संजय राय कहते हैं, "सरकार को इस बारे में और पता लगाने की ज़रूरत है कि ऐसे लोग कोरोना के किस वेरिएंट से संक्रमित हुए थे? पहले से उन्हें किस तरह की बीमारी थी? वैक्सीन के बाद उनके रहन-सहन, मिलना जुलना और बाकी दिनचर्या क्या थी, ऐसे लोग किस प्रोफेशन से जुड़े हैं, एक्सपोज़र किसका कहाँ था?"

डॉक्टर संजय अपनी बात को तथ्यों से सपोर्ट करते हैं.
वो बताते हैं कि इसके वैज्ञानिक आधार हैं कि कोविशील्ड वायरस के बी.1.351 वैरिएंट के (इसे साउथ अफ्रीका वैरिएंट भी कहा जा रहा है) कम गंभीर लक्षण वाले मरीज़ों पर असरदार नहीं है. दक्षिण अफ्रीका में इसका ट्रायल करीब 2000 नौजवानों (30 साल के आयुवर्ग) पर किया गया था जिसके बाद दक्षिण अफ्रीका ने एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक भी लगा दी थी.
भारत में ऐसा क्यों हो रहा है इसका कोई स्पष्टीकरण सरकार ने अभी तक साझा नहीं किया है.
लेकिन इस बीमारी के दूसरे मरीज़ों का इलाज करे रहे मेदांता अस्पताल के डॉक्टर अरविंद कुमार कहते हैं इसके पीछे संभावित तीन वजहें (थ्योरी) हो सकती हैं.
- हो सकता है कि टीका लगने के बाद लोगों में एंडीबॉडी (वायरस से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता) सही मात्रा में ना बनी है.
- ये भी संभव है कि एंटीबॉडी बनी तो ज़रूर पर वो उतनी ताकतवर नहीं थी, जो शरीर में वायरस का मुक़ाबला कर सके
- तीसरी वजह ये हो सकती है कि जिस वेरिएंट (स्ट्रेन) की वजह से कोरोना संक्रमण हुआ, वैक्सीन से बनी एंडीबॉडी उस पर बेअसर है.
हालांकि डॉक्टर अरविंद भी इस पर रिसर्च के नतीजों का इंतजार करने की बात कहते हैं. साथ ही जोड़ते हैं कि मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि लोग वैक्सीन लगवाने के बाद तुरंत अपनी एंटीबॉडी चेक कराने पहुँच जाएँ. केवल एंटीबॉडी ही वायरस से बचाव का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता.
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