कोरोना की दूसरी लहर ने जिन बच्चों को अनाथ बना दिया

बच्चे की प्रतीकात्मक तस्वीर

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    • Author, गुरप्रीत सैनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

तेलंगाना के एक ग्रामीण इलाक़े में आठ महीने के बच्चे के सिर से कोरोना ने माँ-बाप का साया छीन लिया.

दिल्ली के नज़दीक कोरोना की वजह से चार साल और डेढ़ साल के नन्हे भाई-बहन अनाथ हो गए. आस-पास कोई रिश्तेदार भी नहीं रहता था.

वहीं दिल्ली के ही एक घर में जब माँ-बाप ने कोविड से दम तोड़ा, तो 14 साल का बेटा अकेला घंटों तक वहीं बदहवास बैठा रहा.

बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटाकर एक रिश्तेदार को ख़बर की गई. मदद के लिए पहुँचने वाले एक शख़्स के मुताबिक़, "ये बच्चा बोल भी नहीं पा रहा था और अपने गुज़र चुके माँ-बाप के नंबर पर ही लगातार कॉल किए जा रहा था."

इस क्रूर महामारी की दूसरी घातक लहर ने ऐसे कई बच्चों को अपने माँ-बाप से हमेशा के लिए दूर कर दिया है.

दूसरी लहर की चपेट में आकर जान गँवाने वालों में बहुत-से लोग 30 और 40 की उम्र वाले हैं. जिनमें से कई के छोटे-छोटे बच्चे थे. किसी ने अपने माँ-बाप में से एक को खोया और किसी ने दोनों को. कुछ ने अपनी आँखों के सामने अपने माँ-बाप को जाते देखा.

इस महामारी ने कितने बच्चों को इस तरह अनाथ कर दिया है, इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा अब तक सामने नहीं आया है, लेकिन बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और सरकारी चाइल्ड हेल्पलाइन पर मदद के लिए कई एसओएस कॉल आ रहे हैं.

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मदद के लिए आ रहे कई एसओएस कॉल

ग़ैर-सरकारी संस्था, सेव द चिल्ड्रेन के सीईओ सुदर्शन सूची ने बीबीसी को बताया कि उनके पास ऐसे बहुत सारे कॉल आ रहे हैं. इनमें से कई बच्चे ऐसे थे जिनके माँ-बाप को कोविड हो गया और वो बच्चे की देखभाल करने में असमर्थ हैं. कई के माँ-बाप गुज़र गए. कुछ बच्चे अकेले रह गए.

वो बताते हैं कि पिछले 15-20 दिनों में ऐसे कॉल आने बढ़ गए हैं. बेंगलुरु में बेघर लोगों के लिए काम करने वाली संस्था इंपैक्ट इंडिया से जुड़े संपत टीडी ने भी बताया कि उनके पास भी ऐसे बच्चों की मदद के लिए कॉल आ रहे हैं.

बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकारी निदेशक धनंजय ने बीबीसी से कहा कि उनके पास मध्य अप्रैल से इस तरह के कॉल आने लगे और अब देश भर से रोज़ क़रीब 100 कॉल आ रहे हैं, जिनमें कभी कोई बच्चा अपने माँ-बाप के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की मदद माँगता है, कोई अपने माता-पिता को खो चुका होता है या माँ-बाप अस्पताल में हैं और बच्चे घर में अकेले हैं, साथ ही गर्भवती महिलाएँ भी मदद माँग रही हैं.

सोमवार को राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग यानी एनसीपीसीआर ने कहा कि उसे ऐसे कई मामलों की जानकारी मिली है कि कई एनजीओ उन बच्चों के बारे में बता रहे हैं जो कोविड-19 की वजह से माँ-बाप की मौत के बाद अनाथ हो गए हैं.

एनसीआरपी, कमिशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (सीपीसीआर) एक्ट, 2005 के सेक्शन 3 के तहत बनाई गई एक वैधानिक बॉडी है, जिसका काम देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा करना और इससे जुड़े मसलों को देखना है.

एनसीपीसीआर ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को इस बारे में चिट्ठी लिखी है.

आयोग ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति, संस्था या एनजीओ को ऐसे बच्चों की जानकारी मिलती है तो उनको इस बारे में चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 पर जानकारी देनी होगी और बच्चे को ज़िले की चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी के सामने पेश करना होगा.

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चिट्ठी में एनसीपीसीआर ने कहा, “देश में कोविड-19 से बढ़ रहे मामलों की दुखद स्थिति के बीच ऐसे हालात बन रहे हैं, जहाँ बच्चे ने अपने दोनों माँ-बाप को खो दिया है या अकेले रह गए हैं. जिन बच्चों ने कोविड-19 की वजह से परिवार का सपोर्ट खो दिया है या कोविड-19 के चलते माँ-बाप की जान चली जाने की वजह से अकेले रह गए हैं, उनकी किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत देखभाल और सुरक्षा की जाएगी और ऐसे बच्चों को जेजे एक्ट 2015 के सेक्शन 31 के तहत ज़िले की चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी के सामने पेश करना होगा, ताकि बच्चे की देखभाल के लिए ज़रूरी आदेश पास किए जा सकें.”

वहीं केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी एक ट्वीट करके बताया कि भारत सरकार ने सभी राज्यों से संपर्क करके कोविड की वजह से अपने माँ-बाप को खोने वाले बच्चों को जेजे एक्ट के तहत संरक्षण देना सुनिश्चित करने के लिए कहा है और महिला और बाल विकास मंत्रालय ने राज्यों से अपील की है कि वो बाल कल्याण समितियों को ज़रूरतमंद बच्चों के बारे में सक्रिय रूप से पता करते रहे के काम में लगाएँ.

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राज्यों की बात करें, तो तेलंगाना चाइल्ड हेल्पलाइन के पास भी बच्चों की मदद के लिए रोज़ाना 20 कॉल आ रहे हैं.

हेल्पलाइन के लिए कंसल्टेंट राकेश रेड्डी ने बीबीसी को बताया, “हमें ऐसे कॉल भी मिल रहे हैं कि बच्चे के माँ-बाप कोविड की वजह से नहीं रहे, या बच्चे ऑर्फ़़न या सेमी ऑर्फ़न हो गए हैं. या विभाग की ओर से उन्हें कोई सपोर्ट चाहिए. जैसे किसी बच्चे को तुरंत खाना चाहिए, या कोई आर्थिक मदद चाहिए या उनकी पढ़ाई को लेकर मदद चाहिए.”

वो बताते हैं कि उनके पास जो कॉल आते हैं, उन्हें तुरंत ज़िले की चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी को फ़ॉर्वर्ड किया जाता है. फि वो बच्चे से संपर्क करते हैं. उनकी ज़रूरतों का पता लगाकर उसी दिन काम किया जाता है.

”अगर कोई बच्चा अनाथ हो गया है, तो हम पढ़ाई का इंतज़ाम करते हैं, या उनको अडॉप्शन पूल में डाल सकते हैं. अगर कोई रिश्तेदार उनकी देखरेख कर रहा है तो हम उनको भी सपोर्ट करते हैं.”

वहीं दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) ने भी एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया है. डीसीपीसीआर के चेयरपर्सन अनुराग कुंडु ने ट्वीट कर कहा, “अगर आपको ऐसे ज़रूरतमंद बच्चों के बारे में पता चलता है तो +91-9311551393 पर रिपोर्ट करें. डीसीपीसीआर 24 घंटे के अंदर मदद करेगा.”

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, कर्नाटक स्टेट प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइस्ट्स चेयरपर्सन एंथोनी सेबेस्टियन ने बताया है कि राज्य हेल्पलाइन पर ऐसे कई कॉल आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि उनकी टीम देख रही है कि ऐसे मामलों को कैसे हैंडल किया जाए और पता कर रहे हैं कि क्या इन बच्चों के लिए महामारी की वजह से बंद पड़ी चाइल्डकेयर संस्थाओं को फिर से खोला जा सकता है.

कैसे पहुँचाई जा रही मदद

सेव द चिल्ड्रेन के सुदर्शन सूची कहते हैं कि ऐसे बच्चे के बारे में पता लगने पर पहली कोशिश होती है कि उसके पास जल्द से जल्द मदद पहुँचे. वो कहते हैं कि बच्चों का विषय बहुत ही संवेदनशील है इसलिए प्रशासन को साथ में लेकर लीगल तरीक़े से ही सबकुछ किया जाता है.

वो बताते हैं, “दो छोटे-छोटे बच्चे थे, जो दिल्ली के ही आस-पास के थे. दोनों भाई-बहन थे. क़रीब चार साल और डेढ़ साल के थे, जिनके माता-पिता दोनों गुज़र गए थे और आस-पास कोई रिश्तेदार नहीं था और पड़ोसी ने लोगों को ख़बर किया, तो अलग-अलग लोगों से बात हम तक भी पहुँची. जैसे ही हमको ये सूचना मिली तो हमने सबसे पहले सीडब्ल्यूसी यानी चाइल्ड वेल्फ़ेयर कमेटी को बताया, जो हर ज़िले में होती है. चाइल्ड वेल्फ़ेयर कमेटी ही असल में निर्धारित करता है कि बच्चे को कहां पहुँचाया जाए और संस्थागत रखरखाव के लिए कौन सी संस्था उचित रहेगी.”

सबसे पहले ये खोजा जाता है कि क्या कोई रिश्तेदार बच्चे की देखरेख कर सकता है. नहीं तो बच्चे को किसी चाइल्ड केयर संस्था की देखरेख में रखा जाता है.

बचपन बचाओ आंदोलन के धनंजय बताते हैं कि उनके पास एक 14 साल के बच्चे का मामला आया था, जिसने अपने मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची समेत पूरे परिवार को कोरोना की वजह से खो दिया था और बच्चा ख़ुद भी कोरोना पॉज़िटिव था. फिर बाद में वो अपने दोस्त के परिवार की देखरेख में रहने लगा और दोस्त की एक आंटी ने उसे क़ानूनी तरीक़े से गोद लेने का फ़ैसला किया.

लेकिन जिन बच्चों की देखरेख करने वाला कोई नहीं मिलता, उनके लिए एसओएस चिल्ड्रेन विलेज इंडिया जैसी ग़ैर-सरकारी संस्थाएँ सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए सामने आई हैं. इस संस्था के 22 राज्यों में 32 फोस्टर होम हैं. संस्था ने कहा है कि वो कोविड-19 प्रभावित माता-पिता के बच्चों को शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म केयर देने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं.

चुनौतियाँ

कोविड के समय में जब सबकुछ चुनौतीपूर्ण हो गया है, ऐसे में सुदर्शन सूची के मुताबिक़, सोशल डिस्टेंसिंग का और कर्फ़्यू के माहौल में सबसे बड़ी चुनौती है आपस में संपर्क करना, संपर्क करके सीडब्ल्यूसी से बातचीत करना और सबकुछ समयबद्ध और नियमबद्ध तरह से करना, क्योंकि एक-एक मिनट बच्चों के लिए मुश्किल और असुरक्षित होता है.

ह्यूमन राइट वॉट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, कोविड की वजह से अनाथ हुए बच्चे मानव तस्करी और दूसरे तरह के शोषण जैसे यौन शोषण, जबरन भीख मंगवाने और दूसरे तरह के बाल श्रम के ख़तरे में हैं.

इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि पश्चिम अफ्रीका में इबोला संकट के दौरान अनाथ हुए कई बच्चों को बीमारी से जुड़े स्टिग्मा या इस डर से कि बच्चा कहीं ख़ुद भी संक्रमित ना हो, उन्हें ऐसे ही अकेले छोड़ दिया गया था. साथ ही कई बड़े भाई बहनों को अपने छोटे भाई बहनों को सपोर्ट करने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ा था.

ऐसी ही आशंका के चलते हाल में भारतीय अभिनेता सोनू सूद ने सरकार से अपील की थी कि कोविड की वजह से अपने माँ-बाप को खोने वाले बच्चों की शिक्षा फ्री कर दी जाए. अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने भी सरकार से यही माँग दोहराई है.

इन सब चीज़ों को देखते हुए ह्यूमन राइट वॉच ने सरकारों को कोविड से अनाथ हुए बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई सुझाव दिए हैं.

ये इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि भारत में कई लोग ऐसे बच्चों के बारे में सोशल मीडिया पर जानकारी डालकर मदद माँग रहे हैं.

सुदर्शन कहते हैं, “हम लोगों की भावनाओं का तो सम्मान करते हैं लेकिन ऐसे पोस्ट करना और इनपर जवाब देना दोनों ही ग़लत तरीक़ा है. हम भी भावुक हो जाते हैं जब ट्विटर और व्हाट्सऐप में कोई ऐसा पोस्ट आता है तो लगता है कि जल्दी से कोई मदद कर दी जाए. लेकिन हमेशा कोशिश ये होनी चाहिए कि भावुक होने की जगह लोगों को सावधान करें. सरकार को इस बारे में प्रचार थोड़ा बढ़ाना पड़ेगा कि सही पद्धति और सही तरीक़ा क्या है और कारा यानी सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी जैसी एजेंसी और सीडब्ल्यूसी की प्रक्रिया के बारे में लोगों को जागरूक करना पड़ेगा.”

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मनोवैज्ञानिक सपोर्ट सबसे अहम

तेलंगाना चाइल्ड हेल्पलाइन से जुड़े राकेश रेड्डी कहते हैं कि इन बच्चों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है इमोशनल सपोर्ट की, लेकिन वो आसान नहीं होता. क्योंकि कई बच्चे पूरी तरह अकेले हो जाते हैं और अगर रिश्तेदार साथ हैं भी तो वो भी शोक में डूबे होते हैं. इसलिए इन बच्चों के लिए काउंसलिंग का भी इंतज़ाम किया जाता है.

क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट और फॉर्टिस स्कूल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम की प्रमुख मीमांसा सिंह तंवर कहती हैं कि बच्चों के आस-पास का माहौल बहुत मायने रखता है. माँ-बाप के ना होने पर बच्चों के लिए परिवार के दूसरे सदस्य जैसे दादा-दादी, चाचा-चाची का सपोर्ट बहुत ज़रूरी है. अगर बच्चे के साथ कोई भी नहीं है और उसे शेल्टर होम में रखा जाता है, तो वहाँ पर भी जितना हो सके बच्चे के लिए सपोर्टिव माहौल रखना चाहिए.

वो कहती हैं, “जब बच्चा कोविड की वजह से अपने माँ-बाप में से किसी एक को या दोनों को खो देता है तो उन्हें ग़ुस्सा आना, उदास होना, डर महसूस होना, शोक महसूस होना सामान्य है. उस वक़्त उन्हें वो सारी भावनाएँ व्यक्त करने देनी चाहिए. उन्हें माँ-बाप के लौट आने की झूठी उम्मीद देने के बजाए आपको कहना चाहिए कि आप इस सबमें उनके साथ हैं. बच्चे के रोज़ के बर्ताव में भी बदलाव देखने को मिल सकता है, जिसे समझते हुए उन्हें ग्रीफ प्रोसेस से रिकवर करने का वक़्त देना चाहिए.”

मीमांसा सिंह कहती हैं, “बच्चों के साथ उस घटना के बारे में बात करें. मृत्यु के बारे में समझाएँ. बच्चों को समझाने और अपनी भावनाएँ व्यक्त करने देने के लिए अलग-अलग माध्यमों का इस्तेमाल कर सकते हैं. आर्ट या स्लो सॉफ्ट म्यूज़िक या गुड़िया का इस्तेमाल कर सकते हैं. कोई ग्राफ़िक डिटेल ना दें, सिर्फ़ जो बच्चा पूछता है उसे उस तरह से समझाएँ.”

“ऐसा नहीं होता है कि बच्चा दो या तीन दिन में ठीक हो जाएगा, हर बच्चा अपना समय लगाता है. बस ध्यान रखें कि बच्चे का रूटीन सामान्य रहे. परिवार साथ है तो कोशिश करें कि उनको एक नॉर्मल रूटीन दें, बातचीत ज़्यादा करें. सपोर्ट देते रहें. अगर सपोर्ट के बावजूद लंबे वक़्त तक चीज़ें ठीक ना हों और बढ़ती जाएँ, तो किसी मेंटल हेल्थ विशेषज्ञ के पास जाने की ज़रूरत है."

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