कोरोना संकट से जूझ रहे कश्मीर के कैसे हैं हालात

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर में शनिवार को कोरोना संक्रमण के 3,832 नए मामले दर्ज किए गए, जो दूसरी कोरोना लहर का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है.
शनिवार को इस केंद्र शासित प्रदेश में 47 कोरोना मरीज़ों की मौत हो गई.
इस समय जम्मू और कश्मीर में कोरोना संक्रमण के सक्रिय मामलों की कुल संख्या 30343 है. अभी तक 2330 लोगों की कोरोना से मौत हो गई है जबकि 145441 मरीज़ संक्रमण के बाद ठीक हो चुके हैं.
बीते कई दिनों से जम्मू और कश्मीर में कोरोना के बढ़ते मामलों को देख प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश में गुरुवार शाम सात बजे से 48 घंटों के लिए कोरोना कर्फ़्यू लागू कर दिया था.
साथ ही प्रशासन ने श्रीनगर में धारा 144 लागू कर चार लोगों के एक साथ इकट्ठा होने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है.

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कश्मीर के अस्पतालों का हाल
भारत के कई राज्यों की तरह जम्मू और कश्मीर की स्थिति अभी बहुत ज़्यादा ख़राब नहीं दिख रही है, लेकिन उसके बावजूद कश्मीर के अस्पतालों की जो तस्वीर सामने आ रही है, वो अच्छी नहीं कही जा सकती.
कश्मीर के सबसे बड़े अस्पताल श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में मरीज़ों के तीमारदारों ने एक स्थानीय मीडिया वेबसाइट के साथ बातचीत में इलज़ाम लगाया है कि उनको समय पर ऑक्सीजन मिल नहीं पा रहा है.
विजे नाम के एक तीमारदार ने बताया कि उनकी माँ को जो ऑक्सीजन लगा है, वो आधा ख़त्म हो चुका है और अगर उनको नया सिलेंडर नहीं मिला तो वो मर जाएंगी.
वो कहते हैं, "हमारे पास फ़िटेड ऑक्सीजन नहीं है. बल्कि हमें ख़ुद ऑक्सीजन सिलेंडर ढोना पड़ता है. मेरी माँ वॉर्ड 18 के बेड नंबर 13 पर हैं."
इसी तरह, एक दूसरे तीमारदार ने बताया है कि वो ढाई घंटे से इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक ऑक्सीजन का सिलेंडर नहीं मिल पाया है.
वो कहते हैं, "ढाई घंटों से कहा जा रहा है कि आधा घंटा इंतज़ार करो, लेकिन अभी तक कोई गाड़ी नहीं आई नहीं है. मेरे मरीज़ की ऑक्सीजन सचुरेशन 34 थी और अभी तक भी उनको ऑक्सीजन नहीं मिला है."
इस बारे में बीबीसी ने अस्पताल के सुप्रिटेंडेंट डॉक्टर नज़ीर चौधरी से जब पूछा तो उनका कहना था, "हमारे अस्पताल का हर बेड ऑक्सीजन प्लांट जेनरेशन से जुड़ा होता है. अगर ऑक्सीजन प्लांट में कोई ख़राबी आती है तो हमने सिलेंडर्स भी रखे हैं. अब कुछ लोगों ने भरे हुए सिलेंडर बेड के साथ रखे हैं. फिर ये बाहर आकर कहते हैं कि हमें ऑक्सीजन नहीं मिल रहा है. हमारे पास ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है."

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रेमडेसिविर की उपलब्धता
जम्मू और कश्मीर सरकार ने गुरुवार को देर रात एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि उनके पास काफ़ी मात्रा में रेमडेसिविर की दवाई उपलब्ध है.
उपराज्पाल मनोज सिन्हा के सलाहकार बसीर ख़ान ने बताया "हमारे पास काफ़ी मात्रा में रेमडेसिविर मौजूद है. अगर किसी को ज़रूरत पड़ी, तो हम उसको तुरंत दे सकते हैं."
हालांकि, एक तीमारदार शौकत अहमद ने बीबीसी को बताया कि तीन दिन पहले उन्होंने पूरे कश्मीर में रेमडेसिविर खोजी थी, लेकिन कही नहीं मिली.
वो कहते हैं, "हमने अस्पतालों और बाज़ार दोनों जगहों पर रेमडेसिविर खोजा, लेकिन कहीं नहीं मिला. एक सरकारी अस्पताल में हमें बताया गया कि वो बाहर के मरीज़ को रेमडेवीसिविर नहीं दे सकते हैं. अब हमारा मरीज़ ठीक हो रहा है."
शौकत अहमद के मरीज़ का बारामुला के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है.

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कोरोना के ख़िलाफ़ जंग
डॉक्टर नज़ीर चौधरी भी कहते हैं कि बीते तीन दिनों से उनके अस्पताल में रेमडेसिविर दवा उपलब्ध नहीं थी.
वो कहते हैं, "ये दवाई केंद्र सरकार से आती है. जब ये दवाई आती है तो हम सप्लाई बहाल करते हैं. ये बात दुरुस्त है कि मेरे अस्पताल में रेमडेसिविर की दवाई तीन दिनों के लिए उपलब्ध नहीं थी. कल मेरे पास 198 वायल्स आई थीं. कल रात तक हमारे पास 39 वायल्स बची थीं. ये सारी सप्लाई मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन से आती है. इस पर मैं इससे ज़्यादा टिप्पणी नहीं कर सकता हूँ."
कश्मीर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉक्टर निसार उल हस्सान कहते हैं कि कश्मीर के अस्पतालों में कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ी जा रही जंग को लेकर जो इंतज़ाम होने चाहिए था, वो अभी तक मौजूद नहीं है.
उन्होंने बताया, "दरअसल, जबसे कोरोना की दूसरी लहर शुरू हो गई है, अस्पतालों में मरीज़ों की संख्या बढ़ गई है. नतीजा ये निकला कि जो नॉर्मल वॉर्ड्स थे, उनको हमने फिर कोरोना वॉर्ड्स में बदल दिया है. मिसाल के तौर पर हम श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल को ही लेते हैं. यहाँ, इन वॉर्ड्स में जो बेड्स हैं, उन सब के साथ ऑक्सीजन पॉइंट्स जुड़े नहीं हैं और कुछ पॉइंट्स ख़राब पड़े हैं."
"ज़्यादातर मरीज़ों को काफ़ी ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है. फिर होता ये है कि मरीज़ों के तीमारदार बड़े-बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर्स लाते हैं और अपने मरीज़ों तक पहुँचाते हैं. मैं तो ये नहीं कहूंगा कि ऑक्सीजन की कमी है, लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे तो फिर पहली लहर की तरह ही इंतज़ार करना पड़ेगा."

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डॉक्टर निसार आगे बताते हैं, "बीमार के साथ अस्पताल में जो तीमारदार होता है, उनको ख़ुद ऑक्सीजन नहीं लाना चाहिए. ये काम तो अस्पताल के कर्मचारियों का है. मैं बार-बार कहता हूँ कि अगर आप मरीज़ को भर्ती करते हैं, तो ये किसकी ज़िम्मेदारी है कि मरीज़ का ख्याल रखा जाए? तीमारदार को क्यों सिलेंडर उठाना पड़ता है? ये ज़िम्मेदारी तो अस्पताल प्रशासन की होती है या अस्पताल के कर्मचारियों की."
"इनको इसके लिए पैसा मिलता है. ये सब देखकर कई सारे मरीज़ शुरू-शुरू में अस्पताल आना ही नहीं चाहते हैं. वो सोचते हैं कि वहाँ तो अस्पताल में सिलेंडर ख़ुद उठाना पड़ता है. इस वजह से भी कई सारे लोगों की मौत हो गई है. जब अस्पताल जाने में देरी होती है तो फिर गंभीर स्टेज पर वो मरीज़ अस्पताल पहुँचता है और वो फिर मर जाता है. अस्पतालों में कोरोना मरीज़ों का ईमानदारी से ख्याल नहीं रखा जा रहा है. जो काम अस्पताल प्रशासन को करना होता है, वो काम मरीज़ के तीमारदार करते हैं. कई सारे कोरोना मरीज़ आईसीयू बेड्स न होने की वजह से मर गए. यही वो हालत है, जो मैंने अस्पतालों में देखी है."

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जंग जैसे हालात
डॉक्टर नज़ीर चौधरी से जब पूछा गया कि उनके अस्पताल में भी तीमारदारों को सिलेंडर्स ख़ुद उठाना पड़ रहा है तो उनका जवाब था, "जब हम सिलेंडर की सप्लाई लाते हैं, तो लोग उनपर टूट पड़ते हैं. ये तो जंग जैसे हालात हैं. इन हालत में सबको मिलके ही चलना है."
एक तीमारदार अब्दुल हामिद ने अनंतनाग ज़िला अस्पताल से फ़ोन पर बताया कि उनके मरीज़ को बीते पाँच दिनों से अच्छे से इलाज मिल रहा है.
शुक्रवार को शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज में ग़ुलाम मोहम्मद नाम के एक मरीज़ की मौत हो गई. परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल की लापरवाही के कारण ग़ुलाम मोहम्मद की मौत हो गई.
ग़ुलाम मोहमद के बेटे वक़ार अहमद ने बीबीसी को बताया, "मेरे पिता का अस्पताल में सही से इलाज नहीं हो सका. वो कोरोना पॉज़िटिव थे. उनको दो दिन तक इमरजेंसी वॉर्ड में रखा गया था. अगर वो पॉज़िटिव थे, तो उन्हें कोरोना वॉर्ड में क्यों नहीं रखा गया था? हमने बार-बार डॉक्टर्स से कहा कि उन्हें आईसीयू वॉर्ड में शिफ़्ट किया जाए, लेकिन कोई टस से मस नहीं हुआ. आख़िरकार, शुक्रवार की रात को दो बजे उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया और तीन घंटों के बाद उनकी मौत हो गई. अगर पहले ऐसा किया गया होता तो शायद वो बच जाते."

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वो आगे बताते हैं, "डॉक्टर्स ने मेरे पिता के लिए रेमडेसिविर दवाई लिखी, जो अस्पताल में उस समय उपलब्ध नहीं थी. फिर मैंने दूसरी जगह से ये मंगवाया. अगर दवाई भी समय से मिलती, तो शायद मेरे पिता बच जाते. एक तीमारदार को अस्पताल में एक तरह की मानसिक जंग से गुज़रना पड़ता है."
इस बारे में शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज की प्रवक्ता कुलसुम जान से जब पूछा गया तो उनका कहना था, "ऐसा नहीं है कि डॉक्टर्स ने लापरवाही बरती होगी. हम एक क्राइसिस के हालात से गुज़र रहे हैं. ये भी हो सकता है कि उस समय वेंटीलेटर उपलब्ध नहीं रहा होगा. ऐसा भी रहा होगा कि डॉक्टर्स को लगा नहीं होगा को उन्हें वेंटीलेटर पर रखने की ज़रूरत है. रही बात दवाई की तो इस तरह की दवाई की बहुत मांग रहती है. कल मैंने चेक किया था तो हमारे पास ये दवाई उस समय उपलब्ध नहीं थी. आज हमारे पास स्टॉक है."

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कश्मीर घाटी में वैक्सीन उपलब्ध न होने की वजह से कई सारे सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन सेंटर्स बीते दो दिनों से बंद पड़े हैं.
गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के प्रवक्ता डॉक्टर मोहम्मद सलीम ख़ान ने बताया, "बीते दो दिनों से हमारे यहाँ का वैक्सीन सेंटर बंद है. अभी हमारे पास स्टॉक नहीं है. उम्मीद है कि कल तक आ जाएगा और हम वैक्सीन लगाना दोबारा शुरू करेंगे."
हालाँकि, शनिवार को प्रशासन ने श्रीनगर में वैक्सीन लगाने की मुहिम दोबारा शुरू कर दी है.
जम्मू और कश्मीर नेशनल हेल्थ मिशन ने अपने मीडिया बुलेटिन में बताया है कि बीते शुक्रवार से शनिवार तक 41,000 हज़ार से अधिक लोगों को वैक्सीन लगाए गए.
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