'ज़ंजीर में बंधे' बीमार पत्रकार कप्पन पर विजयन ने योगी को भेजी चिट्ठी

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तर प्रदेश में गिरफ़्तारी के बाद ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि निवारण क़ानून (यूएपीए) के तहत क़ैद में रखे गए पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन की हालत अब दो राज्यों के बीच का मुद्दा बन गई है.
केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे एक पत्र में कहा है कि कप्पन की तबीयत काफ़ी गंभीर है जबकि उन्हें यूएपीए के तहत हिरासत में रखा गया है.
केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने अपने पत्र में लिखा है, "ऐसा बताया जा रहा है कि उन्हें डायबिटीज़ है, दिल की बीमारी है, कोरोना संक्रमण के बाद उन्हें मथुरा के केवीएम अस्पताल में भेजा गया है जहाँ अस्पताल के बिस्तर पर ज़ंजीर से बांधकर रखा गया है जबकि उनकी हालत काफ़ी गंभीर है."

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विजयन ने आदित्यनाथ से इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है ताकि कप्पन के साथ मानवीय व्यवहार हो सके. विजयन ने यह भी लिखा है कि कप्पन को एक सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में स्थानांतरित करने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए जहाँ उनकी जान बचाई जा सके.
केरल के मुख्यमंत्री ने ये भी लिखा है कि सामान्य लोग और मीडिया बिरादरी के लोग विशेष रूप से कप्पन की स्थिति और मानवाधिकारों के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं और उनकी दुर्दशा के बारे में बहुत चिंतित हैं.

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बीबीसी से बात करते हुए उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त महानिदेशक (कानून और व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने कहा कि सिद्दीक़ कप्पन को अस्पताल में सीसीटीवी की निगरानी में रखा गया है और बाहर पुलिस बल की तैनाती है.
जब हमने उनसे पूछा की कप्पन को अस्पताल के बिस्तर से ज़ंजीरों से क्यों बाँध कर रखा गया है तो कुमार ने कहा, "मेरी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं है. वे केवल सीसीटीवी की निगरानी में हैं और उनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक है."
पत्नी ने भेजी अर्ज़ी
कप्पन की पत्नी ने भी सुप्रीम कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना को एक पत्र लिखकर कहा है, "कप्पन को एक जानवर की तरह बिस्तर से ज़ंजीरों से बाँध कर रखा गया है और अगर तत्काल क़दम नहीं उठाए गए तो इससे उनकी असमय मृत्यु हो जाएगी."
केरल यूनियन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने भी कप्पन को दिल्ली के एक अस्पताल में शिफ़्ट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की माँग की है. पत्रकारों के इस संगठन ने कप्पन की गिरफ़्तारी के बाद सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की याचिका दायर की थी.
अपनी याचिका में यूनियन ने अदालत से कहा है कि 20 अप्रैल को बाथरूम में गिरने से कप्पन को गंभीर चोटें आईं और बाद में वे कोरोना संक्रमित भी पाए गए.
वहीं केरल के 11 सांसदों ने भी भारत के नए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना को पत्र लिखकर कप्पन के मामले में तत्काल सुनवाई की गुहार लगाई है.
इन सांसदों ने कहा है कि कप्पन की हालत गंभीर है और उन्हें बेहतर उपचार की आवश्यकता है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि कप्पन को मथुरा मेडिकल कॉलेज अस्पताल से दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी किए जाएँ.

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कप्पन की गिरफ़्तारी
सिद्दीक़ कप्पन को पाँच अक्तूबर 2020 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उस वक़्त गिरफ़्तार किया था जब वे हाथरस में एक 19 वर्षीय दलित महिला के साथ हुए 'सामूहिक बलात्कार' और हत्या के मामले को कवर करने जा रहे थे.
कप्पन और उनके तीन साथियों पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए और उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन पर पर चरमपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया से संबंध रखने का आरोप लगाया.
गिरफ़्तारी के बाद से कप्पन मथुरा की एक जेल में बंद रहे और कुछ ही दिन पहले कोरोना वायरस से ग्रस्त होने पर उन्हें मथुरा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया.
उपलब्ध जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश पुलिस की एफ़आईआर में कप्पन पर भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत राजद्रोह, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने और किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को उसके धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने के लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से उकसाने के आरोप लगाए गए हैं.
साथ ही, उन पर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप दर्ज किए गए हैं.
पुलिस का दावा है कि कप्पन को इसलिए गिरफ़्तार किया गया क्योंकि वे दलित लड़की के बलात्कार और हत्या के विरोध के बीच वहाँ क़ानून-व्यवस्था की समस्या खड़ी करने और जातिगत दंगों की साज़िश रचने के लिए हाथरस जा रहे थे.
उत्तर प्रदेश की अदालत में दायर चार्जशीट में पुलिस ने आरोप लगाया कि कप्पन और अन्य लोगों ने दोहा और मस्कट में स्थित वित्तीय संस्थानों से लगभग 80 लाख रुपये की धनराशि प्राप्त की जिसका मक़सद उत्तर प्रदेश में गड़बड़ी फैलाना था.
पुलिस ने यह दावा भी किया कि कप्पन और उनके साथियों के लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन से कई सबूत बरामद किए गए हैं.
उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि कप्पन जिस केरल स्थित समाचार पत्र का पहचान पत्र दिखाकर ख़ुद को पत्रकार बता रहे थे वो 2018 में बंद हो गया था.
'कप्पन की ज़िंदगी का सवाल है'
बीबीसी से बात करते हुए कप्पन के वकील विल्स मैथ्यूज़ ने कहा कि उनके मुवक्किल चार दिनों से शौचालय नहीं जा पाए क्योंकि उन्हें अस्पताल में उनके बिस्तर से बाँध कर रखा गया है.
मैथ्यूज़ ने कहा कि इस समय उनकी प्राथमिकता कप्पन को ज़मानत पर छुड़ाने से कहीं ज़्यादा इस बात पर है कि उनका जीवन बचाया जाए.
मैथ्यूज़ आख़िरी बार कप्पन से चार मार्च को मिले थे और उनके अनुसार उस समय कप्पन बहुत अच्छी हालत में तो नहीं थे पर फिर भी उनका स्वास्थ्य ठीक था.
उन्होनें बीबीसी को बताया कि उन्हें उच्चतम न्यायालय की रिजिस्ट्री से संदेश मिला है कि कप्पन के मामले हेबियस कॉर्पस की याचिका पर अदालत में सुनवाई कराने की प्रक्रिया चल रही है.

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मैथ्यूज़ ने कहा कि इस मामले में हेबियस कॉर्पस की याचिका पिछले साल छह अक्टूबर को दायर की गई थी. वे कहते हैं, "यह याचिका सात बार सुप्रीम कोर्ट के सामने लिस्ट हुई पर समस्या ये है कि उस पर कोई भी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया. सामान्यतः हेबियस कॉर्पस की याचिका की सुनवाई अति-आवश्यक मानकर जल्दी की जाती है."
कप्पन के वकील के अनुसार हेबियस कॉर्पस की याचिका पर शुरू में नोटिस जारी किया गया जिसके बाद दोनों पक्ष अपनी बात और विरोध बारी-बारी रखते गए और यह ऐसे ही चलता गया लेकिन कोई फ़ैसला नहीं हुआ.
वे कहते हैं, "उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार हमारे मुवक्किल के ख़िलाफ़ आरोप गंभीर हैं. उन्होने यूएपीए का हवाला दिया और देश की एकता और अखंडता की बात की है."
हेबियस कॉर्पस या बंदी प्रत्यक्षीकरण उस अदालती आदेश को कहते हैं जिसके तहत एक व्यक्ति को एक न्यायाधीश या अदालत के सामने लाना अनिवार्य होता है. यह आदेश उन मामलों में अधिकतर इस्तेमाल किया जाता है जिनमें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई हो या उसे अवैध तरीक़े से कारावास में डाल दिया गया हो.
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