प्रधानमंत्री मोदी के बनारस में भी हालात भयावह, इलाज के बिना दम तोड़ रहे लोग

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सोमवार को वाराणसी में लाखों लोग जब पंचायत चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे, उस दिन शहर में कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा एक बार फिर दो हज़ार को पार कर गया था और सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, दस लोग इस संक्रमण की वजह से उस दिन जान गँवा चुके थे.

सोमवार को ही सोशल मीडिया पर वाराणसी की वह तस्वीर भी वायरल हो रही थी, जिसमें एक बुज़ुर्ग मां ई-रिक्शे पर अपने उस बेटे के शव के साथ बेबस और असहाय बैठी थी, जिसकी इलाज के अभाव में मौत हो गई थी.

जौनपुर से अपने कोरोना पॉज़िटिव बेटे के इलाज की उम्मीद लेकर वाराणसी आई यह बुज़ुर्ग महिला अस्पताल-दर-अस्पताल भटकती रही और आख़िरकार वह उम्मीद के बदले बेटे की लाश लेकर लौट गई.

सोमवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेश पर लोगों की मदद के लिए उनके संसदीय कार्यालय में एक हेल्पलाइन की भी शुरुआत की गई, जहां लोग अस्पताल, बेड, ऑक्सीजन, एम्बुलेंस संबंधी मदद ले सकते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल चुनावों में अपनी व्यस्तता के बावजूद एक दिन पहले वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए अपने संसदीय क्षेत्र का हाल लिया था और हेल्पलाइन बनाने का निर्देश दिया था. पिछले एक अप्रैल से लेकर अब तक वाराणसी में कोरोना संक्रमण की दर लगातार बढ़ती जा रही है और अब तक 22 हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं.

वाराणसी के सभी छोटे-बड़े, सरकारी-ग़ैर सरकारी अस्पतालों को कोविड अस्पताल बना दिया गया है लेकिन अस्पतालों तक पहुँचने के लिए एम्बुलेंस और अस्पतालों में एक अदद बेड, दवाई और ऑक्सीजन की तलाश में लोग रात-दिन भटक रहे हैं.

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हेल्पलेस नंबर और नेता

वाराणसी में कैंट की रहने वाली मानसी पिछले एक हफ़्ते से अपने बीमार पिता को किसी कोविड अस्पताल में भर्ती कराने के लिए संघर्ष कर रही थीं, आख़िरकार रविवार को एक निजी अस्पताल में उन्हें जगह मिल सकी.

मानसी बताती हैं, "आरटीपीसीआर की रिपोर्ट एक दिन में आ जाती है लेकिन सिस्टम में अपडेट होने में यहां उसे छह-सात दिन लग रहे हैं और इतने दिनों में मरीज की हालत बिगड़ जा रही है. पापा की हालत ख़राब हो रही थी और डॉक्टर रिपोर्ट के बिना भर्ती नहीं कर रहे थे. उन्हें दिख रहा है कि मरीज़ में सारे लक्षण कोविड के हैं, उन्हें तत्काल ऑक्सीजन चाहिए, हम ऑक्सीजन भी उपलब्ध कराने को कह रहे हैं लेकिन अस्पताल भर्ती नहीं कर रहे थे. काफ़ी संघर्ष के बाद जब मैंने रिपोर्ट हासिल की, तब कहीं जाकर अस्पताल ने उन्हें भर्ती किया. अगर मेरे पापा छह दिन पहले ही भर्ती हो जाते तो आज उनकी हालत सुधर गई होती."

मानसी कहती हैं कि प्रशासन की ओर से जारी किए गए "सारे हेल्पलाइन नंबर्स दरअसल, हेल्पलेस नंबर्स हैं. मैंने किसे फ़ोन नहीं किया. विधायकों तक को फ़ोन किया. मैं किसी का नाम नहीं बताऊंगी लेकिन सबने कहा कि हम हेल्पलेस हैं. आख़िर जब आप हेल्पलेस हैं तो हमने आपको चुना क्यों है? लेकिन कौन सुन रहा है? और जगह का मुझे नहीं मालूम लेकिन बनारस में स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह भगवान भरोसे है."

अपने पिता के इलाज में लगीं मानसी के आंसू पूरी बातचीत के दौरान बंद नहीं हुए. बेहद ग़ुस्से में वो कहने लगीं, "जो कुछ भी व्यवस्था के नाम पर किया जा रहा है, सिर्फ़ दिखावा है. अकेले मैं ही परेशान नहीं हूँ बल्कि जिनके घर में मरीज हैं वो सब परेशान हैं. सिस्टम को कोई चेक करने वाला नहीं है कि ज़मीन पर क्या हो रहा है."

बनारस में अस्पताल

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रिपोर्ट मिलने में देरी

कोरोना संक्रमण के बीच रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र के ज़िम्मेदार लोगों से वस्तुस्थिति की जानकारी ली थी और तत्काल हेल्पलाइन बनाने के निर्देश दिए थे. सोमवार को हेल्पलाइन बनकर शुरू भी हो गई और एक दिन में ही सैकड़ों फ़ोन भी आए लेकिन कितनों की मदद करने में ये हेल्पलाइन सफल रही, इसका विवरण किसी के पास नहीं है.

वाराणसी में नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय से जुड़े और पार्टी के सह प्रभारी सुनील ओझा कहते हैं, "मोदी जी के निर्देशों से हम लोगों ने बनारस में "कंट्रोल रूम फ़ॉर कोविड" की शुरुआत 19 अप्रैल से की है. इसका मूल उद्देश्य है कोरोना से संबंधित सभी विभागों का कोऑर्डिनेशन करना ताकि संक्रमित लोगों को जल्द से जल्द इलाज और ज़रूरी सुविधाएँ मिल सकें. इसके लिए 30 लोगों की टीम चौबीस घंटे काम कर रही है. इनमें 12 डॉक्टरों को भी लगाया गया है. चिकित्सकों के सुझाव के अनुसार उन्हें सहायता दी जा रही है."

वाराणसी में नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय से जुड़े और पार्टी के सह प्रभारी सुनील ओझा

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इमेज कैप्शन, वाराणसी में नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय से जुड़े और पार्टी के सह प्रभारी सुनील ओझा

वाराणसी के रहने वाले राकेश श्रीवास्तव की पत्नी की 15 अप्रैल को कोविड संक्रमण से मौत हो गई. पिछले साल उनके इकलौते बेटे की मौत हुई थी और उसके सदमे से राकेश श्रीवास्तव के पिता भी चल बसे. अब परिवार में सिर्फ़ वो और उनकी 11 साल की बेटी है.

बीएचयू और अन्य सरकारी अस्पतालों में लंबी लाइन और अन्य मुश्किलों को देखते हुए वो पत्नी को इलाज के लिए एक बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल में ले गए थे. वहाँ पहली रिपोर्ट नेगेटिव आई लेकिन अस्पताल ने दोबारा जांच की. छह दिन तक अस्पताल में रहने के बाद राकेश श्रीवास्तव अपनी पत्नी की कोविड जांच रिपोर्ट तो नहीं पा सके लेकिन पत्नी दम तोड़ गईं.

राकेश श्रीवास्तव बताते हैं, "बहुत लापरवाही है. यही सोचकर लाए थे कि प्राइवेट में अच्छा इलाज होगा लेकिन नहीं हुआ. ऑक्सीजन लगाए थे फिर भी सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी. बार-बार कहने के बावजूद डॉक्टर ध्यान नहीं दे रहे थे. बाद में आईसीयू में शिफ़्ट कर दिए. प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू में शिफ़्ट करने का मतलब ही है कि लाखों रुपया वसूलने के बावजूद मरीज़ का मर जाना. वही हमारे साथ हुआ."

राकेश श्रीवास्तव बताते हैं कि अस्पताल ने उन्हें कोविड रिपोर्ट तो नहीं दी लेकिन 'रेमडेसिवीर इंजेक्शन लगाया गया था, इसका मतलब रिपोर्ट पॉज़िटिव ही रही होगी.'

वीडियो कैप्शन, लॉकडाउन लगने पर कई जगहों से शुरू हुआ मज़दूरों का पलायन

स्थानीय लोगों के मुताबिक़, प्राइवेट अस्पतालों में सामान्य रूप से चालीस-पचास हज़ार रुपये एक दिन का चार्ज कर रहे हैं. ऑक्सीजन सिलिंडर बाज़ार में तीस हज़ार तक के बेचे जा रहे हैं और वो भी मिल नहीं रहे हैं. कई बार तो लोग अस्पताल तक नहीं पहुँच पा रहे हैं और अस्पताल पहुंचने की क़वायद में ही घंटों बिना ऑक्सीजन के रहने के बाद दम तोड़ रहे हैं. न सिर्फ़ अस्पतालों का बल्कि श्मशान घाटों का भी बुरा हाल है, जहाँ लाशों के ढेर लगे हुए हैं और रात भर लाशें जल रही हैं.

वाराणसी में भोजूवीर के रहने वाले विमल कपूर की माँ की तीन दिन पहले कोरोना संक्रमण से मौत हो गई. विमल कपूर बताते हैं, "नौ अप्रैल को एडमिट किया था. बताया गया कि फेफड़े ठीक से काम नहीं कर रहे हैं. हम लोग अंदर तो जा नहीं सकते थे. हम लोग भी कोरोना पॉज़िटिव थे. जो डॉक्टर कह रहे थे वही मानना पड़ रहा था. माँ की मृत्यु के बाद घंटों एंबुलेंस के लिए परेशान रहे और फिर हरिश्चंद्र घाट पर जो दृश्य देखा, वो दिल दहलाने वाला था. न जाने कितनी लाशें वहां जल रही थीं."

बनारस में श्मशान घाट

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श्मशानों का दिल दहलाने वाला हाल

वाराणसी में गंगा किनारे मणिकर्णिका घाट पर यूं भी लाशें हर समय जलती रहती हैं लेकिन हरिश्चंद्र घाट पर महज़ 10-15 लाशें ही एक दिन में जलती हैं. इन दिनों यह संख्या कई गुना बढ़ गई है.

स्थानीय लोगों के मुताबिक़, वाराणसी में ज़िला प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हर दिन जो आँकड़े जारी कर रहे हैं, श्मशान घाटों पर होने वाले दाह संस्कारों और अस्पतालों में होने वाली मौतों से वह कहीं से मेल नहीं खाते.

इस बारे में वाराणसी के ज़िलाधिकारी, अपर ज़िलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी से कई बार बात करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने फ़ोन नहीं उठाया और ना ही मेसेज का जवाब दिया. ज़िलाधिकारी के असिस्टेंट ने उनका सीयूजी यानी सरकारी नंबर उठाया लेकिन हर बार यही जवाब दिया कि 'साहब व्यस्त हैं.'

बनारस श्मशान घाट

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'ऐसा हाल कभी नहीं देखा'

वाराणसी में वरिष्ठ टीवी पत्रकार विक्रांत दुबे पिछले कई दिनों से कोविड संक्रमण की विकराल होती स्थिति को कवर कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "बनारस में पहली बार इतनी गंभीर मेडिकल इमरजेंसी देखने को मिल रही है और स्वास्थ्य व्यवस्था का असली चेहरा भी दिख रहा है. अस्पताल, ऑक्सीजन और इंजेक्शन को लेकर हर जगह मारामारी है और उसके बाद श्मशान घाट पर अफ़रा-तफ़री मची है. हरिश्चंद्र घाट पर कोविड पॉज़िटिव मरीज ही आ रहे हैं और हर दिन पचास से ज़्यादा लाशें जल रही हैं. यही नहीं, कुछ ऐसे मरीजों का दाह संस्कार मणिकर्णिका पर भी हो रहा है जो मर तो कोरोना के लक्षणों से रहे हैं लेकिन जांच होने के बावजूद उनकी रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है. ऐसे में उन्हें नेगेटिव ही मान लिया जा रहा है."

अस्सी घाट के पास रहने वाले धीरेंद्र सिंह कहते हैं कि घाटों पर एंबुलेंस की ऐसी लाइनें आज तक कभी किसी ने नहीं देखी होंगी जैसी इस समय दिख रही है. धीरेंद्र सिंह सवाल उठाते हैं कि प्रशासन का आंकड़ा कहां से आ रहा है, समझ से परे है.

बनारस

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उनके मुताबिक़, "हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार के लिए लोगों को सात से आठ घंटे इंतज़ार करना पड़ रहा है. ये उन्हीं लोगों के शव हैं जिनकी मौत कोविड से हो रही है. पचासों शवों के अंतिम संस्कार रोज़ हो रहे हैं और प्रशासन आंकड़ा 10 या 12 मौत का दे रहा है."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर बनी हेल्पलाइन को अभी एक ही दिन हुआ है. बड़ी संख्या में लोगों के फ़ोन भी आ रहे हैं लेकिन लोगों की मदद में अभी यह उतनी कारगर होती नहीं दिख रही है.

विक्रांत दुबे कहते हैं, "हेल्पलाइन से तत्काल किसी को फ़ायदा नहीं हो रहा है क्योंकि भीड़ इतनी ज़्यादा है कि वहां काम करने वाले तीस लोग उसे सँभाल नहीं पा रहे हैं. लेकिन इतना ज़रूर है कि उन ग़रीब और असहाय लोगों के लिए यह हेल्पलाइन बहुत बड़ा सहारा है जिनकी अस्पतालों में सिफ़ारिश करने वाला कोई नहीं है."

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