कोरोना वायरस: भारत में वैक्सीन की ज़रूरतें किस तरह से पूरी हो पाएंगी?

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    • Author, रिएलिटी चेक टीम
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

कोरोना वायरस वैक्सीन का सबसे अधिक उत्पादन करने वाले देशों में से भारत एक है. लेकिन अब भारत मांग के अनुरूप वैक्सीन आपूर्ति में समस्याओं का सामना कर रहा है.

इसके सबसे बड़े निर्माता का कहना है कि ब्रिटेन को हो रही कोरोना वैक्सीन की आपूर्ति में अगले महीने ख़ासी कमी आ सकती है और साथ ही नेपाल को की जाने वाली एक बड़ी आपूर्ति को भी रोकना पड़ा है.

आख़िर क्यों आयी है कमी?

भारत में नोवावैक्स और एस्ट्राज़ेनेका का उत्पादन करने वाले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने हाल ही में कच्चे माल की कमी को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी.

सीरम इंस्टीट्यूट के प्रमुख आदार पूनावाला ने अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों के चलते वैक्सीन निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक बैग और फ़िल्टर की कमी होने की आशंका जताई थी.

कंपनी ने ये भी कहा था कि उसे सेल-कल्चर मीडिया, सिंगल यूज़ ट्यूबिंग और विशेष रसायनों के आयात में भी कठिनाई का सामना करना पड़ा है.

आदार पूनावाला ने कहा था कि इन चीज़ों की (कच्चा माल) साझेदारी आने वाले समय में उत्पादन में कमी का एक बड़ा कारक बनने जा रहे हैं और अभी तक किसी का इस ओर ध्यान नहीं गया है.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने भारत सरकार को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने का आग्रह भी किया था ताकि विश्व स्तर पर बिना किसी रुकावट के टीकों का उत्पादन किया जा सके और उनकी आपूर्ति को भी सुनिश्चित किया जा सके.

जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन बनाने वाली एक अन्य भारतीय कंपनी बायोलॉजिकल ई ने भी टीके के उत्पादन में संभावित कमी को लेकर चिंता जताई है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी महिमा डाटला ने हाल ही में कहा था कि अमेरिकी सप्लायर "तय किए गए समय पर डिलीवरी की जिम्मेदारी लेने से हिचक रहे थे."

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अमेरिका के आपूर्ति पर रोक की वजह क्या है?

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने प्रशासन से वैक्सीन उत्पादन के लिए ज़रूरी चीज़ों में आई संभावित कमी से जुड़ी जानकारियां जुटाने को कहा है. बाइडन प्रशासन ने 1950 के डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट को लागू किया है. ये क़ानून अमेरिकी राष्ट्रपति को आपात परिस्थितियों में घरेलू अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए शक्ति प्रदान करता है.

डिफ़ेंस प्रोडक्शन एक्ट के तहत उन उत्पादों के निर्यात को प्रतिबंधित करने की अनुमति देता है जो घरेलू मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) के लिए लिए ज़रूरी हो सकती हैं.

बाइडन प्रशासन ने कहा है कि वे इस एक्ट का इस्तेमाल उन चीज़ों की लिस्ट बढ़ाने के लिए करेंगे जिन पर अमेरिकी वैक्सीन निर्माता कंपनियों को प्राथमिकता मिलेगी. जैसे कि स्पेशल पंप और फ़िल्टरेशन यूनिट.

- प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं की तरफ़ से लगाए गए प्रतिबंध से वैश्विक उत्पादन प्रभावित हो सकता है

- कुछ चीज़ें निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरतीं और वे बेहद ज़रूरी हैं

- दूसरी जगहों से इन चीज़ों का विकल्प मिलने में 12 माह से अधिक का समय लग सकता है

लिवरपूल के जॉन मूरेस यूनिवर्सिटी में वैक्सीन सप्लाई चेन की एक विशेषज्ञ डॉ. साराह शिफ़लिंग का कहना है कि फ़ार्मास्युटिकल सप्लाई चेन बेहद जटिल है.

वो कहती हैं, "यहां तक कि जब मांग बहुत अधिक होती है तब भी वैक्सीन इंडस्ट्री में नए सप्लायर की संख्या दूसरी इंडस्ट्री के जैसे तेज़ी से नहीं बढ़ाई जा सकती क्योंकि नए सप्लायर्स पर लोग जल्दी भरोसा नहीं करेंगे."

वो आगे कहती हैं कि अमेरिका ने जो क़दम उठाए हैं वो दुनियाभर में जो कमी है, उसके जवाब में ही उठाए हैं.

वो कहती हैं, "अगर किसी उत्पाद की मांग पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से बढ़ जाएगी तो उसकी कमी होना तय ही है."

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भारत के वैक्सीन उत्पादन पर प्रभाव

वर्तमान में भारत में दो टीकों को स्वीकृति मिली हुई है. ऑक्सफ़ोर्ड एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन (स्थानीय तौर पर इसे कोविशील्ड के रूप में जाना जाता है) और दूसरी कोवैक्सीन, जो भारतीय प्रयोगशालाओं में विकसित किये गए हैं.

जनवरी महीने की शुरुआत से अब तक सीरम इंस्टीट्यूट से कोविशील्ड की क़रीब 130 मिलियन ख़ुराक को या तो निर्यात किया गया है या फिर घरेलू उपयोग किया गया है.

भारतीय दवा कंपनियां नई सुविधाओं के इस्तेमाल से या फिर मौजूदा उत्पादन लाइन में परिवर्तन करके उत्पादन में तेज़ी ला रही हैं ताकि घरेलू मांग के साथ साथ वैश्विक आपूर्ति की आवश्यकता को पूरा किया जा सके.

सीरम इंस्टीट्यूट का कहना है कि जनवरी महीने में एक समय में उनका उत्पादन 60 से 70 मिलियन वैक्सीन प्रति माह का था, इसमें कोविशील्ड और अमेरिका में विकसित नोवावैक्स शामिल हैं (जिसके इस्तेमाल के लिए अभी तक लाइसेंस नहीं मिला है.)

सीरम इंस्टीट्यूट ने बीबीसी को बताया कि मार्च महीने से उत्पादन बढ़ाकर इसे बढ़ाकर 100 मिलियन प्रति माह करने का लक्ष्य था लेकिन हाल ही में जब हमने इसे जांचा तो यह 60 से 70 मिलियन ख़ुराक पर ही सीमित था, यह बढ़ा नहीं.

कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या उसके पास पहले से ही उत्पादन किये गए वैक्सीन का भंडारण है और अगर है तो उसके उत्पादन का कितना हिस्सा सिर्फ़ घरेलू उत्पाद के लिए तय है.

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क्या भारत अपनी ज़रूरतों को पूरा कर पा रहा है?

भारत सरकार ने 16 जनवरी को अपना टीकाकरण अभियान शुरू किया था और अभी तक क़रीब 39 मिलियन (3 करोड़ 90 लाख) लोगों को वैक्सीन लग चुकी है. और इसी दौरान कोरोना वायरस की संभावित दूसरी लहर को लेकर भी चिंता बढ़ गई है.

देश के कुछ हिस्सों में एक बार फिर संक्रमण बढ़ रहा है.

अधिकारियों का लक्ष्य है कि सात महीने के भीतर क़रीब 600 मिलियन ख़ुराक का प्रबंध करना है. इसके अनुसार, एक महीने में 85 मिलियन ख़ुराक.

अभी तक सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया और भारत सरकार के बीच 100 मिलियन ख़ुराक को लेकर समझौता हुआ है. इसके अलावा भारत बायोटेक 10 मिलियन ख़ुराक की आपूर्ति कर रहा है.

रूस की गामालेया रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ भी भारत की लाइसेंस डील है. जिसके तहत स्पुतनिक वैक्सीन की 200 मिलियन डोज़ का उत्पादन होना है.

इनका उत्पादन भारतीय निर्माताओं द्वारा, भारतीय बाज़ार और साथ ही निर्यात के लिए भी किया जाएगा.

सीरम इंस्टीट्यूट के प्रमुख आदार पूनावाला ने जनवरी में संकेत दिया था कि कोविशील्ड के लिए आधिकारिक मंज़ूरी इस बात के तहत दी गई थी कि कंपनी भारत की अपनी घरेलू ज़रूरतों को प्राथमिकता देगी.

हालांकि बाद में भारत सरकार ने यह स्पष्ट किया था कि निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं है.

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किसे मिलेंगे भारत के टीके

सीरम इंस्टीट्यूट संयुक्त राष्ट्र समर्थित को-वैक्स पहल के लिए भी प्रतिबद्ध है, जिसके तहत कम और मध्यम आय वाले देशों को वैक्सीन सुलभ कराया जाना है ताकि इन देशों में भी लोगों को वैक्सीन का लाभ मिल सके.

पिछले साल सितंबर माह में सीरम इंस्टीट्यूट ने 200 मिलियन ख़ुराक की आपूर्ति पर सहमति जताई थी. यह या तो एस्ट्राज़ेनेका हो सकती है या नोवावैक्स.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, सीरम इंस्टीट्यूट ने द्विपक्षीय वाणिज्यिक सौदे भी किए हैं, जिसमें एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन की लगभग 900 मिलियन और नोवावैक्स की 145 मिलियन ख़ुराक़ शामिल हैं.

भारत सरकार ने दक्षिण एशियाई देशों में अपने पड़ोसी देशों की मदद को वरीयता देते हुए कई देशों को टीके मदद के रूप में भी दिये हैं.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत ने चीन की तुलना में अधिक वैक्सीन मदद के रूप में दी है. चीन ने जहां 7.3 मिलियन वैक्सीन का दान किया है. वहीं भारत ने 8 मिलियन से अधिक वैक्सीन की मदद की है.

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