मायावती के बनाए रसिन बांध का उद्घाटन फिर से योगी ने क्यों किया?

- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"बांध का नाम बदल गया है, दीवारें रँग गई हैं, नहरों के किनारे पौधे भी लग गए हैं, हेलीपैड भी बन गया है लेकिन खेतों की सिंचाई कितनी होगी, ये तो बाद में ही पता चलेगा. अब तक तो नहर सूखी ही रहती थी."
बांदा और चित्रकूट ज़िलों की सीमा पर बने रसिन बांध के किनारे खड़े रघुवर सिंह ने ये बातें बांध के किनारे लगे नए साइन बोर्ड को निहारते हुए कहीं जिसमें लिखा है कि साल 2003 से शुरू हुई यह परियोजना साल 2019-20 में पूरी हुई.
इस साइन बोर्ड से ठीक पहले बांध के बारे में जानकारी देता जो बोर्ड लगा था, उसमें बांध का नाम 'चौधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना' लिखा था लेकिन अब इसका नाम सिर्फ़ 'रसिन बांध परियोजना' रह गया है.

इसी महीने 10 मार्च को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चित्रकूट ज़िले में बाणगंगा नदी पर बने रसिन बांध का विधिवत तरीक़े से एक भव्य कार्यक्रम में लोकार्पण किया और दावा किया कि इससे बुंदेलखंड जैसे सूखे से ग्रस्त इलाक़े के कई गाँवों को सिंचाई की सुविधा मिलेगी.
हालांकि इस बांध का निर्माण कार्य साल 2011 में ही पूरा हो गया था और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उद्घाटन भी किया था.
इतना ही नहीं, साल 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान तत्कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव ने भी यहां एक निरीक्षण भवन का उद्घाटन किया था. इसलिए बांध निर्माण के क़रीब दस साल के बाद लोकार्पण करने को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
वैसे बांध से निकलने वाली दो नहरें अपनी क्षमता के हिसाब से किसानों की ज़मीन पिछले कई साल से सींच भी रही हैं. ये अलग बात है कि नहरों में पानी अक्सर नहीं रहता और आगे भी इनमें पानी रहेगा, इसे लेकर लोग आशंकित हैं.

परियोजना की शुरुआत
सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक, रसिन बांध परियोजना की नींव साल 2003 में पड़ी थी और साल 2004 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ. साल 2011 में बांध बनकर तैयार हो गया. चित्रकूट और बांदा ज़िलों की सीमा पर बने इस बांध की शुरुआती लागत क़रीब 76 करोड़ रुपए रखी गई थी जो बाद में बढ़कर 141 करोड़ रुपए तक पहुंच गई. यानी लगभग दोगुनी.
बांध से बदौसा और सुदिनपुर गाँवों में दो बड़ी और चार छोटी नहरें निकाली गई हैं जिनके पानी से आस-पास के गाँवों को सिंचाई के लिए पानी मिलता है. इस इलाक़े में धान गेहूं तिलहन दलहन सब्ज़ी की फसल होती है, जो पानी ना मिलने के कारण अक्सर बर्बाद हो जाया करती है.
10 मार्च 2021 को लोकार्पण से पहले बांध की दीवारों पर रंगरोगन करके और आस-पास पेड़ और गमले लगाकर कुछ इस तरह चमकाया गया था जैसे कोई नई परियोजना बनकर तैयार हुई हो.
लोकार्पण मुख्यमंत्री को करना था इसलिए कार्यक्रम स्थल के पास हेलीपैड भी बना और कार्यक्रम स्थल से दोनों ओर जितनी दूर तक किसी की निगाह पहुंच सकती हो, वहाँ तक सड़क भी पक्की कर दी गई. बांध से गाँवों की ओर जाने वाली सड़कों पर सिर्फ़ धूल-मिटी और टूटी-फूटी गिट्टियां ही दिख रही थीं.

रसिनपुर गाँव के रहने वाले देवी दयाल पांडेय रिटायर्ड अध्यापक हैं. कहते हैं, "क़रीब दस साल से इन नहरों से गाँवों को पानी मिल रहा है. हमारे गाँव को तो उतना फ़ायदा नहीं हुआ है क्योंकि हमारा गाँव ऊंचाई पर है. लेकिन नदी के उस पार वालों को ज़्यादा फ़ायदा मिला है. अब उसे थोड़ा और बढ़ा दिया गया है तो शायद ज़्यादा लोगों को फ़ायदा मिल सकेगा."
रसिन गांव काफ़ी बड़ा है. उसमें चार या पाँच छोटे गाँव यानी मज़रे शामिल हैं. क़रीब दस हज़ार के क़रीब वोटर हैं. उन्हीं गाँव में से एक है बेउर.
बेउर गाँव के रहने वाले युवक विकास यादव कहते हैं, "बांध में नया तो कुछ बना नहीं है. नहरों की लंबाई ज़रूर बढ़ाई गई है. लेकिन नहरों में पहले ही पानी नहीं पहुँचता था तो अब कैसे पहुंचेगा. बांध बनने में जिनकी ज़मीनें गईं, उन्हें मुआवज़ा भी नहीं मिला और अब बहुत से लोगों के पास खेती की ज़मीन भी नहीं रही."

रसिन बांध का लोकार्पण राजनीतिक चर्चा में भी रहा.
यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तंज़ कसते हुए कहा था कि 'सरकार ने एक बार फिर दूसरों के कामों का श्रेय लेने और नाम बदलने की कोशिश की है' तो राष्ट्रीय लोकदल ने बांध से चौधरी चरण सिंह का नाम हटाने पर नाराज़गी जताई है.
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नया क्या?
बांध में नया क्या था, जिसका इतने ज़ोर-शोर से लोकार्पण किया गया, इस सवाल के जवाब में चित्रकूट में सिंचाई विभाग के अधिशाषी अभियंता विपिन बिहारी सिंह कहते हैं, "शत-प्रतिशत न तो यह बना था और न ही शत-प्रतिशत इसका लाभ मिल पा रहा था. इसकी वजह पैसे की कमी थी. मौजूदा सरकार ने इसके लिए 66 करोड़ रुपये मुहैया कराए जबकि पिछले 14 साल में सिर्फ़ 75 करोड़ रुपये ही मिल सके थे. दोनों नहरों की कुल लंबाई अब 24.1 किमी हो गई है. पहले यह लंबाई सिर्फ़ 11 किमी. थी यानी 13 किमी लंबाई भी बढ़ाई गई है."
रसिन बांध में अन्य मदों के अलावा साल 2009 में केंद्र सरकार की ओर से बुंदेलखंड इलाक़े में सूखे से निबटने के लिए दिए गए बुंदेलखंड पैकेज के भी क़रीब 22 करोड़ रुपये शामिल हैं.
लोकार्पण के बाद रसिन बांध परियोजना की जानकारी देने वाले बोर्ड में न सिर्फ़ चौधरी चरण सिंह का नाम हटाया गया है बल्कि इस बात का भी कोई ज़िक्र नहीं है कि इस परियोजना में बुंदेलखंड पैकेज से भी धनराशि दी गई है जबकि पहले वाले बोर्ड में यह साफ़-साफ़ लिखा था.
बांदा में सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि बुंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत मिले पैसों से बांध के दोनों ओर पार्क बनाए गए, पार्क में महापुरुषों की मूर्तियां बनाई गईं और आज वे मूर्तियां भी ग़ायब हो गई हैं.
आशीष सागर कहते हैं, "लोकार्पण के वक़्त तक नहर में पानी नहीं था और बाद में पानी छोड़ा भी गया तो वह महज़ कुछ ही दूर तक पहुँचा. सिंचाई के लिए इतना कम पानी किसी काम का नहीं होता. ऐसे में नहर की लंबाई बढ़ाने का कोई बहुत फ़ायदा नहीं होगा."

दरअसल, रसिन बांध पर बने जलाशय में पानी का स्रोत बाणगंगा नदी और बरसात का पानी है. इस पहाड़ी इलाक़े में बरसात कम होती है और नदी लगभग सूख चुकी है.
ऐसे में यहां इतना पानी ही नहीं रहता कि उसे नहर के रास्ते खेतों में पहुंचाया जा सके. अब दावा किया जा रहा है कि इससे 17 गाँवों की क़रीब पाँच हज़ार हेक्टेयर ज़मीन पर सिंचाई हो सकेगी, लेकिन यह तो तभी होगा जब जलाशय में पानी होगा.
सिंचाई विभाग के अधिशाषी अभियंता विपिन बिहारी सिंह कहते हैं कि बेउर गाँव की वजह से पहले जलाशय भर नहीं पाता था लेकिन अब उस गाँव के लोगों को विस्थापित करके उनका पुनर्वास करा दिया गया है, इसलिए अब जलाशय भरा रहेगा.
विपिन बिहारी सिंह भले ही दावा करें कि सभी का पुनर्वास हो गया है और मुआवज़ा मिल चुका है लेकिन बांध के लिए बेघर हुए कई ग्रामीणों और आदिवासियों को अब तक रहने के लिए घर नहीं मिले हैं. तमाम लोग अभी भी ऐसे हैं जो सिंचाई विभाग की ओर से दी गई टिन की झोंपड़ी में जीवन बिता रहे हैं.

विस्थापितों का मुआवज़े के लिए संघर्ष
बेउर गाँव के एक बुज़ुर्ग बद्री कहते हैं, "हमारे पास अब एक बिस्वा ज़मीन नहीं बची है जबकि हमारे सात भाइयों के बीच 24 बीघा ज़मीन थी. हमें सिर्फ़ सत्तर-सत्तर हज़ार रुपये मिले थे. वो भी सब ख़र्च हो गए. मेरे चार बच्चे हैं. वो भी मज़दूरी ही करते हैं और मैं भी मज़दूरी करता हूं."
विनोद कुमार भी बेउर गांव के ही रहने वाले हैं. कहते हैं कि न तो हमें ज़मीन का मुआवज़ा मिला है और न ही घर बनाने के लिए हमें प्लॉट दिया गया है. विनोद कुमार जैसी शिकायत कई अन्य लोग भी करते हैं.
बेउर गांव के क़रीब 76 घरों को बांध क्षेत्र में लेकर खाली करा लिया गया था. इनमें से ज़्यादातर लोग मज़दूरी और खेती करते थे.
सभी को घर बनाने के लिए प्लॉट और पैसे देने का वादा किया गया था लेकिन कई लोग अभी भी उसकी आस देख रहे हैं. विपिन बिहारी सिंह कहते हैं कि बांध का डूब क्षेत्र जहां चिह्नित किया गया था, उस क्षेत्र में आने वाले सभी लोगों को मुआवज़ा दिया जा चुका है.
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