रूस ने भारत को किया था बाहर लेकिन अमेरिका लाया टेबल पर- प्रेस रिव्यू

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इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के मुताबिक़ भारत आख़िरकार अफ़गानिस्तान में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप पर फ़ैसला लेने वाले छह देशों की सूची में शामिल हो गया है. बीते छह महीने से भारत इसके लिए लगातार कोशिश कर रहा था.
इस नए मैकेनिज़म को अमेरिका ने सुझाया है वहीं रूस ने जो योजना सुझायी थी उसमें भारत को इन देशों की सूची में शामिल नहीं किया गया था.
सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया है कि रूस और चीन के बीच बढ़ती नज़दीकी के बीच रूस ने जो तऱीका सुझाया था, उसमें रूस, चीन, अमेरिका, पाकिस्तान और ईरान को बातचीत के मेज पर रखे जाने की बात कही गई थी.
एक अधिकारी ने अख़बार से बताया कि ऐसा पाकिस्तान के कहने पर किया गया था जो नहीं चाहता कि भारत इस इलाक़े में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप का हिस्सा बने. लेकिन भारत इस पर लंबे वक़्त से काम कर रहा था और इसके लिए सभी भारत ने अफ़गानिस्तान और उससे बाहर सभी अहम किरदारों से संपर्क साधा ताकि वह बातचीत की इस टेबल का हिस्सा बन सके.
एक उच्च अधिकारी ने बताया कि ''हमारे हित सुरक्षित होने चाहिए, आने वाले महीनों में इसे लेकर बात आगे बढ़ेगी.''
अब इस टीम का हिस्सा होने के कारण भारत को उम्मीद है कि वह विशेष रूप से आतंकवाद, हिंसा, महिलाओं के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर नियमों को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.
भारत का यह मानना है कि वह एक अफ़ग़ानिस्तान-नेतृत्व वाली, अफ़ग़ानिस्तान-नियंत्रित और अफ़ग़ानिस्तान के स्वामित्व वाली प्रणाली चाहता है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी हक़ीक़त कुछ ऐसी रही है कि यहाँ ऐसा हो नहीं सका है.

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टोलो न्यूज़ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पिछले सप्ताह अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और हाई काउंसिल फोर नेशनल रिकंसिलिएशन के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला को एक चिट्ठी भेजी थी जिसमें संयुक्त राष्ट्र के संरक्षण में एक रिजनल कॉन्फ्रेंस के गठन का प्रस्ताव दिया गया था. इसके अंतर्गत अमेरिका, भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान के विदेश मंत्री एक साथ मिलकर अफ़गानिस्तान में बेहतरी लाने की कोशिश करेंगे.
सूत्रों का कहना है कि भारत की ओर से इस बातचीत का हिस्सा विदेश मंत्री एस. जयशंकर हो सकते हैं.
एक सूत्र ने अख़बार से कहा कि ये लंबे वक़्त से जारी भारत की कूटनीति का फल है. पिछले साल सितंबर में अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अब्दुल रशीद दोस्तम की भारत यात्रा के दौरान इस पर बातचीत हुई थी. फिर अफ़गानिस्तान के पूर्व सीईओ अब्दुल्ला-अब्दुल्ला और अफ़ग़ानिस्तान नेता अता मोहम्मद से बीते साल अक्टूबर में इसे लेकर चर्चा हुई थी.
इसके बाद इस साल जनवरी में भारतीय एनएसए अजीत डोभाल की गुपचुप अफ़गानिस्तान यात्रा भी इसी कोशिश का हिस्सा थी. जहाँ उन्होंने काबुल के नेताओं से मुलाक़ात की थी.
सूत्रों का कहना है कि ईरान के साथ नई दिल्ली के रिश्ते और चाबहार बंदरगाह को अफ़ग़ानिस्तान तक जोड़ने की विकास की रणनीति भी इसके पीछे एक अहम वजह रही.
ब्लिंकन ने अपनी चिट्ठी में आने हफ्तों में तुर्की में वरिष्ठ अफ़ग़ानिस्तानी नेताओं और तालिबान के बीच बातचीत के लिए बैठक बुलाई है ताकि '90 दिनों के हिंसा घटाने' वाले प्लान पर चर्चा की जा सके.

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विधानसभा चुनावों के तहत तेल कंपनियों को दाम नहीं बढ़ाने के निर्देश
सरकार नियंत्रित तेल कंपनियां (ओएमसी) अब फ़िलहाल तेल की क़ीमतें नहीं बढ़ाएंगी. इससे कम से पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दामों की मार जेल रहे लोगों को कुछ राहत तो ज़रूर मिलेगी. बिज़नेस स्टैंडर्ड की ख़बर के अनुसार, इस क़दम को विधान सभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है.
बीते एक हफ़्ते से अधिक समय से सरकार पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दामों को लेकर लगातार विपक्ष के निशाने पर है. पेट्रोल-डीज़ल के दाम तो बढ़े हैं ही साथ ही रसोई गैस में दाम में हुई 125 रुपए की बढ़त ने आम लोगों को काफी परेशानी में डाल दिया है.
पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दामों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का एक प्रमुख कारण इस पर लगने वाला कर है. बिज़नेस स्टैंडर्ड ने सरकारी अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि सरकार ने अनौपचारिक तौर पर ही सही तीन कंपनियों को फ़िलहाल के लिए दाम नहीं बढ़ाने के लिए कहा है.
एक सरकारी अधिकारी के हवाले से अख़बार लिखता है कि कुछ राज्यों ने अपने यहां तेल की ख़रीद पर कर में कटौती की है लेकिन आम लोगों को इसका बहुत फ़ायदा नहीं मिलेगा. जैसे- पश्चिम बंगाल ने पेट्रोल और डीज़ल पर एक रुपये प्रति लिटर कर कम किया है. राजस्थान ने कर को 38 फ़ीसदी से कम करके 36 फ़ीसदी कर दिया है और असम में भी कोरोना वायरस के कारण जो अतिरिक्त राशि कर के रूप में ली जी रही थी उसे वापस ले लिया है. मेघालय में भी मामूली ही सही पर कटोती की गई है.
लेकिन तेल क़ीमतों को नहीं बढ़ाने के आदेश से तेल कंपनियों की चिंता ज़रूर बढ़ सकती है.

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क्या उत्तराखंड में हो सकता है सत्ता हस्तांतरण
उत्तराखंड में अगले साल विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं लेकिन चुनावों से पहले ही उत्तराखंड में बीजेपी में आंतरिक कलह देखने को मिल रही है. जिसका नतीजा ये हुआ कि राज्य के आलाकमान नेताओं को दिल्ली तलब किया गया.
इससे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के बदलने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं. जनसत्ता की ख़बर के अनुसार, बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह किसी और को राज्य की कमान सौंप सकता है. आज पार्टी की संसदीय बैठक होनी है, जिसके बाद इन सभी अटकलों के जवाब संभवत: मिल जाएं.
इस बीच उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देर रात पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात की लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि चालीस मिनट तक उनकी पार्टी अध्यक्ष नड्डा से क्या बात हुई. हालांकि पार्टी के दूसरे नेता किसी भी तरह के आंतरिक गतिरोध से इनक़ार कर रहे हैं.

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तीन दशक पुराने फ़ैसले पर पुर्नविचार करेगा उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय के पांच जजों की बेंच अब ये विचार करेगी कि क्या नौकरियों में पचास फ़ीसदी से अधिक आरक्षण दिए जाने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं.
हिदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, उच्चतम न्यायालय ने मराठा आरक्षण मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि वह इस मुद्दे पर भी दलीलें सुनेंगी किया क्या इंदिरा साहनी मामले में साल 1992 में आये ऐतिहासिक फ़ैसले पर भी दोबारा से विचार किये जाने की आवश्यकता है.
1992 में सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता इंदिरा साहनी की याचिका पर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फ़ीसदी तय कर दी थी.
इस मामले की अगली सुनवाई 15 मार्च को होगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामसे में सभी राज्यों के पक्ष सुनना ज़रूरी है.
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