नेपाल: प्रचंड से लड़ाई के बाद ओली क्या अपनी कुर्सी बचा पाएंगे?

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रविवार को संसद का अधिवेशन बुलाया. सदन में हंगामा भी हुआ और प्रचंड गुट ने वॉकआउट भी किया. लेकिन नेपाल के राजनीतिक संकट का हल नहीं निकला, बल्कि संकट और गहरा गया.

पिछले साल 20 दिसंबर को प्रधानमंत्री ओली ने संसद भंग करने की सिफ़ारिश राष्ट्रपति के पास भेजी थी. राष्ट्रपति ने ओली सरकार की सिफ़ारिश को मानते हुए देश की संसद को भंग कर दिया था और मध्यावधि चुनावों की घोषणा की थी.

इस साल सुप्रीम कोर्ट ने केपी शर्मा ओली के संसद भंग करने के आदेश को पलटते हुए 13 दिन के अंदर संसद का अधिवेशन बुलाने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले को नेपाल के कई राजनीतिक जानकारों ने ओली के लिए झटका क़रार दिया था. जानकारों को लगा कि ओली अब अपनी कुर्सी नहीं बचा पाएँगे.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रविवार को संसद का अधिवेशन बुलाया भी गया, लेकिन रविवार को ही एक दूसरे फ़ैसले के बाद दोबारा से लगने लगा है कि ओली अपने पद पर कुछ समय और बने रहेंगे. हालाँकि कुछ जानकार इसे देश में गहराते राजनीतिक संकट के तौर पर भी देख रहे हैं.

इसलिए ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर ताज़ा फ़ैसले के मायने क्या हैं?

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क्या है ताजा फ़ैसले के मायने?

नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे ने बीबीसी से बातचीत में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को विस्तार से समझाया. उनके मुताबिक़ इस फ़ैसले की तीन महत्वपूर्ण बाते हैं.

पहला- नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) को मिला कर नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) नाम मिलना ही ग़लत था, क्योंकि इस नाम की पार्टी पहले से ही पंजीकृत थी.

दूसरा- पार्टी के तौर पर एनसीपी का अस्तित्व नहीं है. यानी अब एनसीपी विलय के पहले वाली पार्टी ही हैं.

तीसरा- अगर दोनों पार्टियों को दोबारा विलय करना ही है तो वापस से पूरी प्रक्रिया को अपनाना होगा.

याचिकाकर्ता ऋषि राम कट्टेल ने इस विलय के फै़सले के ख़िलाफ़ एक याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था उन्होंने इस नाम से पहले ही एक पार्टी रजिस्टर करवा रखी है.

कात्याल ने मई 2018 में ओली और प्रचंड की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) को पंजीकृत करने के चुनाव आयोग के फ़ैसले को चुनौती दी थी.

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प्रधानमंत्री ओली के पद पर इस फ़ैसले का असर

लेकिन इस फ़ैसले को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीक़े से पढ़ रहे हैं. साल 2017 के चुनाव में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) और प्रचंड के नेतृत्व वाले नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) ने चुनावी गठबंधन बनाया था.

दोनों पार्टियों के उम्मीदवार अपने-अपने चुनाव चिन्ह पर एक साझा मेनिफ़ेस्टो के साथ चुनाव लड़े थे. इस गठबंधन को चुनावों में दो-तिहाई बहुमत मिला था. प्रचंड की पार्टी के समर्थन से ही ओली प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे.

उसके बाद दोनों पार्टियों का औपचारिक विलय मई 2018 में हुआ था. यानी नेपाल में ओली प्रधानमंत्री पहले बने और बाद में दोनों पार्टियों का औपचारिक विलय हुआ. इस वजह से नेपाल के वरिष्ठ वकील शंभु थापा को नहीं लगता कि प्रधानमंत्री ओली पर कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले का कोई असर पड़ेगा.

नेपाल से बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "प्रचंड की पार्टी ने अभी तक सरकार से समर्थन वापस नहीं लिया है. जब प्रचंड और ओली के नेतृत्व वाली दोनों पार्टियों ने लिख कर समर्थन पत्र राष्ट्रपति को दिया था, उसके बाद ही ओली नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे. अगर प्रचंड वो समर्थन वापस ले लेते हैं तो ओली के प्रधानमंत्री पद को ख़तरा हो सकता है. केवल कोर्ट द्वारा दोनों पार्टियों के विलय को खारिज़ करने से प्रधानमंत्री को कोई ख़तरा नहीं है."

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शंभु थापा नेपाल की बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं. नेपाल में वो संविधान के जानकार माने जाते हैं. लेकिन युबराज घिमिरे मानते हैं कि रविवार के कोर्ट के फ़ैसले के बाद एक नया और अलग तरह का राजनीतिक संकट पैदा हो गया है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "सरकार बनाने को लेकर संविधान में जो प्रावधान है उसके मुताबिक़ एक पार्टी के पास अगर बहुमत है तो वो सरकार बना सकती है. अगर किसी सूरत में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलता तो दो या उससे ज़्यादा पार्टियाँ मिलकर सरकार बना सकती है और उन्हें एक निश्चित समय-अवधि में विश्वास मत हासिल करना होता है."

"अगर ये दोनों शर्तें पूरी नहीं हो तो कोई तीसरा सदस्य जो ये कहता है कि मैं सदन में अपना बहुमत साबित कर सकता हूँ और ऐसा कर देता है, तो वो प्रधानमंत्री बन सकता है. ओली जब प्रधानमंत्री बने थे तब उन्हें दो पार्टियों का समर्थन मिला था."

"इन पार्टियों को औपचारिक विलय के बाद एक माना गया था. लेकिन रविवार के सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले के बाद स्थितियां बदल गई हैं. ऐसी सूरत में वर्तमान संसद त्रिशंकु संसद हो जाती है. अब ओली इस स्थिति को कैसे परिभाषित करते हैं, ये देखने वाली बात होगी"

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नेपाल की प्रतिनिधि सभा में आँकड़ो का खेल

नेपाल की प्रतिनिधि सभा में कुल सदस्यों की संख्या 275 हैं. साल 2017 के चुनावों में, ओली की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने 121 सीटें जीती थीं और प्रचंड की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) ने 53 सीटें.

इसके अलावा संसद में तीसरी पार्टी नेपाली कांग्रेस के पास 63 सदस्य हैं और जनता समाजबादी पार्टी के पास 34 सदस्य हैं. जबकि सरकार बनाने के लिए बहुमत का आँकड़ा 138 है.

युवराज घिमिरे कहते हैं, "फ़िलहाल 266 सदस्यों के पास ही वोटिंग का अधिकार है, क्योंकि कुछ सदस्यों का निधन हो गया है और कुछ सस्पेंड किए गए हैं. ऐसे में बहुमत का आँकड़ा 134 हो जाता है."

अगर प्रचंड की पार्टी सरकार से समर्थन वापस ले लेती है तो, नेपाली कांग्रेस या फिर जनता समाजबादी पार्टी के समर्थन से ओली प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं. हालांकि नेपाल के जानकार इस संभावना से इनकार करते हैं.

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फ़ैसले को चुनौती

शंभु थापा कहते हैं, "रविवार को एनसीपी नाम से दोनों पार्टियों के विलय पर कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले पर रिव्यू याचिका दायर करने का विकल्प खुला है.

ये सुप्रीम कोर्ट के डिविज़न बेंच का फ़ैसला है. इसको आगे चुनौती देने का रास्ता अभी खुला है. इसके अलावा इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ चुनाव आयोग में भी शिकायत की जा सकती है."

उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही इस फ़ैसले को राजनीतिक पार्टियाँ आगे चुनौती देंगीं.

ओली कब तक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़रवरी के फ़ैसले में ये नहीं कहा है कि प्रधानमंत्री केपी ओली को विश्वास मत हासिल करना है. उस फ़ैसले में केवल संसद बहाल करने की बात की गई थी. इसलिए ओली पर विश्वास मत हासिल करने का कोई दवाब कोर्ट की तरफ़ से फ़िलहाल नहीं है.

शंभु थापा कहते हैं, "प्रधानमंत्री ओली को पद से हटाने के लिए ये ज़रूरी है कि दूसरी पार्टी उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए या फिर प्रचंड अपना समर्थन सरकार से वापस ले लें. अब ओली केयर टेकर सरकार नहीं चला रहे हैं."

ये पूछे जाने पर कि प्रचंड का अगला क़दम क्या होगा? शंभु कहते हैं, वो फ़ैसले को चुनौती दे सकते हैं या सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं. अगर अविश्वास प्रस्ताव पास हो जाता है, तो ओली प्रधानमंत्री पद से हट जाएँगे और अगर अविश्वास प्रस्ताव फ़ेल हो जाता है तो वो प्रधानमंत्री बने रहेंगे."

लेकिन अविश्वास प्रस्ताव में वोट भी एक पेंच हैं.

युबराज घिमिरे कहते हैं, "एनसीपी में ओली के विरोधी कई ऐसे सदस्य भी थे, जो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के चुनाव चिन्ह पर चुनाव जीते थे.

नेपाल में क़ानून के मुताबिक़ जो सदस्य जिस पार्टी की सिंबल पर चुनाव जीत कर आता है, उस पार्टी से अगर अलग हो जाता है तो उसकी सदस्यता ही ख़त्म हो जाती है.

ऐसे सदस्यों के पास दो विकल्प बचते हैं, या तो जिस पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ा उसी पार्टी में वापस चले जाएँ या फिर अपनी सदस्यता से हाथ धो बैठे."

युबराज घिमिरे कहते हैं, "वैसे तो नैतिक आधार प्रधानमंत्री ओली ख़ुद विश्वास मत हासिल करना चाहिए था. लेकिन लगता नहीं कि वो ऐसा करने का मन भी बना रहे हैं. राष्ट्रपति ऐसा करने के लिए उन्हें कह सकतीं है. लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी भूमिका भी विवादस्पद रही है. इसलिए लगता है कि ओली प्रधानमंत्री के पद पर बने ही रहेंगे."

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क्या नेपाल में लोकतंत्र ख़तरे में है?

शंभु थापा कहते हैं, "नेपाल में लोकतंत्र ख़तरे में नहीं है. संसद अब दोबारा कामकाज के लिए बैठी है."

नेपाल में राजनीतिक संकट की शुरुआत तब हुई जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर उस अध्यादेश को वापस लेने का दबाव डाल रही थी जिसमें उन्हें प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता की सहमति के बिना विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के सदस्यों और अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति का अधिकार दिया गया था.

शंभु थापा कहते हैं, "नेपाल के संविधान में प्रावधान है कि किसी भी संवैधानिक पद पर नियुक्ति को 45 दिन के अंदर संसदीय समिति द्वारा मंजूर या नामंजूर करना होता है. चूंकि संसद उस दौरान भंग थी, इसलिए एक गुट का मानना है कि 45 दिन के बाद अपने-आप ही वह अध्यादेश मंज़ूर मान लिया जाएगा. लेकिन दूसरे गुट का कहना है कि चूंकि संसद उस दौरान भंग थी, इसी आधार पर उस अध्यादेश को अवैध करार दे दिया जाना चाहिए."

रविवार को सदन के सदस्यों की बैठक शुरू हुई, तो उस अध्यादेश को सदन पटल पर नहीं रखने की माँग प्रचंड गुट ने की और फिर सदन से वॉकआउट कर गए.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: सियासी संकट में उलझा नेपाल

फैसले के बाद की दुविधा

शंभु थापा और युबराज घिमिरे दोनों जानकार मानते हैं कि दोनों पार्टियों के विलय के बाद भी देश में कई चुनाव हुए हैं, जिसमें एनसीपी के सिंबल पर चुनाव जीत कर लोग आए. उन सदस्यों को किस पार्टी का माना जाएगा?

बहुत जगहों पर उपचुनाव भी हुआ, उसमें भी एनसीपी के उम्मीदवार जीत कर आए हैं? संसद में व्हिप अब कैसे जारी होगा? ऐसे में संसद अब कैसे चलेगी, एनसीपी पार्लियामेंटरी पार्टी का क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद इस तरह के कई सवाल उठ रहे हैं, जिससे एक राजनीतिक संकट तो खड़ा हो गया है.

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