छत्तीसगढ़ः पहली बार पुलिस फ़ोर्स का हिस्सा बनीं ये ट्रांसजेंडर महिलाएं

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ के कोरबा की रहने वाली 22 साल की सबूरी यादव बेहद ख़ुश हैं.
वो कहती हैं, "लोग किसी भी मौक़े पर चिढ़ाते हैं, छेड़ते हैं, अपशब्द कहते हैं लेकिन किसी पुलिस वाले के बग़ल से गुज़रते ही माहौल बदल जाता है. मुझे लगता था कि पुलिस की वर्दी ही इस अपमान से मुझे मुक्ति दिला सकती है. अब वह समय आ गया है."
सबूरी यादव नौ ट्रांसजेंडरों से समूह में शामिल हैं और जिन्होंने हाल ही में छत्तीसगढ़ पुलिस की आरक्षक भर्ती परीक्षा पास की है.
रायपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव के अनुसार लिखित और शारीरिक परीक्षा के बाद इस वर्ष जिन प्रतियोगियों को सफल घोषित किया गया है, उनमें 317 पुरुष और 71 महिलाओं के अलावा नौ ट्रांसजेंडर भी शामिल हैं.
इसके अलावा राज्य के अलग-अलग पुलिस रेंज में भी लगभग आधा दर्जन ट्रांसजेंडर वर्ग के उम्मीदवारों के चयन की ख़बर है.

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2017 में राज्य में पुलिस बल में भर्ती के लिए पद विज्ञापित किये गये थे, जिसमें पहली बार ट्रांसजेंडर समुदाय को भी अवसर दिया गया था. इस परीक्षा के परिणाम सोमवार को घोषित किए गये.
पुरुष के शरीर में में स्त्री
सबूरी यादव बताती हैं कि किशोरावस्था से ही उन्हें लड़कियों की तरह रहना पसंद था. उन्हें बार-बार लगता था कि उनकी देह भले पुरुष की है लेकिन उनके भीतर एक स्त्री बसती है. लेकिन चार बहनों के अकेले भाई के रूप में घर पर यह स्वीकार नहीं था.
सबूरी बताती हैं, "बेहद ग़रीबी के कारण घर में एक बहन के अलावा किसी ने पढ़ाई नहीं की है. मैं जब भी लड़कियों की व्यवहार करती, मुझे डांटा-फटकारा जाता. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा कि अगर पढ़-लिख लूंगी आत्मनिर्भर बन जाऊंगी तो शायद मैं जो हूं, उसे समाज के सामने खुल कर स्वीकार करना सरल होगा."
सबूरी के पिता की मौत पिछले साल ही हो गई और मां दूसरों के घरों में घरेलू काम करती हैं. घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है लेकिन सबूरी अब इस बात से ख़ुश हैं कि उनके दिन बदलने वाले हैं.
कुछ ऐसी ही ख़ुशी जांजगीर-चांपा ज़िले के मालखरौदा की रहने वाली 32 साल की ट्रांसजेंडर नेहा की बातचीत में भी झलकती है. अनुसूचित जनजाति वर्ग से जुड़ी अशोक कुमार बंजारे ऊर्फ़ नेहा के माता-पिता मज़दूरी करते थे.
नेहा कहती हैं, "जब मैंने चलना शुरु ही किया था और छोटा भाई गोद में ही था, उसी समय मुझे दादी के पास छोड़ कर मेरे माता-पिता कमाने कहीं बाहर चले गये थे. जब पिता लौटे तो पता चला कि डायरिया के कारण मेरी मां की मौत हो गई. मुझे तो मां का चेहरा भी याद नहीं है."

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बाद में पिता ने दूसरी शादी कर ली और नेहा को दादी ने ही पाला. वे अभी भी दादी के साथ ही रहती हैं.
नेहा बताती हैं, "नौंवीं-दसवीं क्लास में पढ़ाई के दौरान मैं लड़कों की तरफ़ आकर्षित होने लगी थी. मुझे लड़कियों की तरह रहना पसंद था. लेकिन घर वालों के डर से मैं अपने आपको व्यक्त नहीं कर पाती थी. लेकिन मैं अपने अंदर की औरत को मार तो नहीं सकती थी ना? बीए की पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने लड़कियों की तरह रहना शुरु किया."
नेहा बताती हैं कि नौंवी-दसवीं की पढ़ाई के दौरान ही उनका ट्रांसजेंडर समुदाय के दूसरे लोगों से जान-पहचान हुई और उन्होंने रायगढ़ में अपना गुरु भी चुना.
नेहा कहती हैं, "मैं दूसरे किन्नरों के साथ बधाई माँगने घर-घर जाती थी. वही मेरा कमाई का स्रोत था. लेकिन लगता था कि बहुत हो गया, अब कुछ सम्मानजनक काम करना चाहिए."
ख़ुद को साबित करने का जज़्बा
2017 पुलिस बल में ट्रांसजेंडर समुदाय की भी बहाली का प्रावधान रखा गया तो नेहा ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम करने वाली मितवा समिति के सदस्यों के संपर्क में आईं. उन्होंने रायपुर में राज्य शासन द्वारा चलाये गये कोचिंग में रह कर परीक्षा की तैयारी की.
इसके अलावा पुलिस विभाग के प्रशिक्षण शिविर में भी वे शामिल हुईं और महीनों शारीरिक परीक्षा की तैयारी करती रहीं.
पुलिस बल की परीक्षा के प्रतिभागियों के प्रशिक्षण से जुड़ी रहीं राजनांदगांव ज़िले की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरेशा चौबे मानती हैं कि ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकांश प्रतियोगियों ने प्रशिक्षण को चुनौती की तरह स्वीकार किया.
सुरेशा चौबे कहती हैं, "अपने को साबित करने का जो जज़्बा ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतियोगियों में था, वह चकित करने वाला है. दूसरे प्रतियोगी फ़ुर्सत मिलते ही फ़ोन में व्यस्त हो जाते थे या गप्प मारने लगते थे, जबकि अधिकांश ट्रांसजेंडर पूरे समय मैदान में अपना पसीना बहा रहे होते थे. उनका चयन, असल में उनकी कड़ी मेहनत और लगन का परिणाम है."
राज्य सरकार की छत्तीसगढ़ तृतीय लिंग कल्याण समिति की सदस्य विद्या राजपूत पिछले कई सालों से ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम कर रही हैं. मितवा समिति की अध्यक्ष विद्या पुलिस भर्ती को अपने समुदाय के लिए अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हैं.
उनका कहना है कि तृतीय लिंग व्यक्ति, समाज में कलंक माने जाने के कारण परिवार और समाज से बहिष्कृत ही रहे हैं. वे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक जीवन में प्रतिभागी होने से भी पूरी तरह से वंचित रहे हैं.
विद्या कहती हैं, "जिस पुलिस से थर्ड जेंडर समाज का एक बड़ा वर्ग ख़ौफ़ खाता रहा है, उसी थर्ड जेंडर वर्ग को अपनी मेहनत से अब वर्दी पहनने का अवसर मिला है, यह सुखद है. पुलिस भर्ती में शामिल प्रतिभागियों ने यह साबित कर दिया है कि वे भी सम्मान के साथ जीने के हक़दार हैं और उन्हें अवसर मिले तो वे भी स्त्री-पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल सकते हैं. पुलिस बल में भर्ती की प्रक्रिया ने राज्य भर के तृतीय लिंग समुदाय में एक अलग आत्मविश्वास भरने का काम किया है. आने वाले दिनों में इसके और सुखद परिणाम नज़र आएंगे."
अब अपने प्रशिक्षण और तैनाती की प्रतीक्षा में जुटी नेहा ने अपने लिंग परिवर्तन की प्रक्रिया भी शुरु कर दी है. वे चाहती हैं कि आने वाले दिनों में उनकी किसी ऐसे लड़के से शादी हो, जो उन्हें समझ सके.
नेहा कहती हैं, "टाइम पास करने वाले लड़कों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. कोई गंभीर और ठीक-ठीक लड़का मिले तो बताइयेगा."

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