#मोदी_रोज़गार_दो, #मोदी_जॉब_दो - ट्विटर ट्रेंड के पीछे कारण क्या है

रोजगार

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    • Author, निधि राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

गुज़रे कुछ दिनों से ट्विटर पर #मोदी_रोज़गार_दो और #मोदी_जॉब_दो जैसे कई हैशटैग्स सुर्खियों में हैं और इनमें मोदी सरकार से नौकरियों की मांग की जा रही है.

इस ट्रेंडिंग हैशटैग के पीछे एक अहम वजह छात्रों का ये आरोप लगाया जाना है कि कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) ने कम्बाइंड ग्रेजुएट लेवल (सीजीटी) परीक्षाएं सही तरीके से नहीं कराई हैं.

हर साल लाखों छात्र ये परीक्षा देते हैं ताकि उन्हें सरकारी दफ्तरों में टियर टू और टियर थ्री स्तर के नौकरियां मिल सकें.

मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले रंजीत रघुनाथ ने पिछले साल कृषि में एमएससी की है और अब वे कृषि विभाग में नौकरी हासिल करने के लिए मशक्कत कर रहे हैं. 26 साल के रंजीत पहले ही रिक्रूटमेंट की इस पूरी प्रक्रिया से थक चुके हैं.

रंजीत कहते हैं, "एक तो वे पर्याप्त संख्या में नौकरियां नहीं निकालते हैं, और अगर नौकरियां निकालते भी हैं तो परीक्षा ठीक तरह से नहीं कराते हैं. अगर परीक्षा ठीक से हो जाए तो नतीजों में दिक्कतें होती हैं. मैं कृषि विभाग के लिए कई परीक्षाओं में बैठ चुका हूं और अभी भी मैं एक अच्छे मौक़े के लिए संघर्ष कर रहा हूं. रिजल्ट्स में बड़े फर्जीवाड़े होते हैं."

रंजीत ने भी #मामा_रोज़गार_दो हैशटैग के साथ ट्वीट किया है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राज्य में मामा कहकर बुलाया जाता है.

रंजीत कहते हैं, "मैं युवाओं के एक ऐसे समूह का हिस्सा हूं जो कि अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है. रोज़गार पर बहस शुरू करने के लिए हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. हमें इस बारे में कुछ करना होगा."

नरेंद्र मोदी और निर्मला सीतारमण

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भारत में बेरोज़गारी की समस्या

देश में बेरोज़गारी की समस्या के चलते युवा नौकरियों की मांग को लेकर ट्वीट कर रहे हैं.

थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2021 में देश में बेरोज़गारों की तादाद क़रीब 4 करोड़ है.

इस संख्या में दो तरह के बेरोज़गार शामिल हैं, वो जो सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में हैं और वो भी जो नौकरी नहीं ढूंढ रहे हैं. जनवरी में बेरोज़गारी की दर सुधरकर 6.5 फ़ीसदी पर आ गई जो कि दिसंबर 2020 में 9.1 फीसदी थी.

वित्त वर्ष 2019-20 के अंत में सीएमआईई के दर्ज किए गए आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में क़रीब 40 करोड़ लोग रोज़गार में थे और 3.5 करोड़ लोग बेरोज़गार थे.

इसके साथ ही हर साल भारत में करीब दो करोड़ लोग 15 से 59 उम्र की उस आबादी में शामिल होते हैं जिसे काम की तलाश होती है.

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30 साल के पीयूष मालवीय महाराष्ट्र के चिखलदाड़ा में रहते हैं. कई बार असफल होने के बाद उन्होंने अब नौकरी ढूंढना ही बंद कर दिया है.

वे कहते हैं, "मैंने 2016 में राजनीति विज्ञान से एमए कर लिया था. इसके बाद से मैंने कई सरकारी नौकरियों के लिए कोशिश की. 2011 में मेरी बीएड हो गई थी और मैं शिक्षक बनना चाहता था. लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया."

अब पीयूष अपने पिता के मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स के कारोबार से जुड़ गए हैं. पीयूष ने भी इस हैशटैग के साथ ट्वीट किया है और उन्हें लगता है कि देश में बेरोज़गारी पर बात होनी चाहिए.

पीयूष कहते हैं, "युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पाने के पीछे कई वजहें हैं. हमें इस बारे में चर्चा छेड़नी होगी और सोशल मीडिया एक अहम प्लेटफॉर्म है."

अब सवाल यह पैदा हो रहा है कि देश बेरोज़गारी के इस बड़े आंकड़े पर कैसे पहुंचा.

देश के पूर्व सांख्यिकीविद प्रणब सेन का मानना है कि नोटबंदी के चलते बेरोज़गारी की समस्या ने गंभीर रूप अख्तियार किया. वे कहते हैं, "नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र को बुरी तरह से तोड़ दिया है और जब हम रिकवरी कर रहे थे तभी कोविड-19 महामारी आ गई. इस तरह से समस्या कई गुनी बढ़ गई."

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जॉबलेस ग्रोथ

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव महेश व्यास कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार नीतिगत स्तर पर इसे एक दिक्कत मानती ही नहीं है.

वे कहते हैं, "समस्या यह है कि ग्रोथ की अगुवाई ज्यादा पूंजी की मांग वाली इंडस्ट्रीज करती हैं. सरकार पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरियां पैदा नहीं कर रही है. सरकार को यह सोचना चाहिए कि नो अर्थव्यवस्था में कैसे अधिक नौकरियां पैदा करेगी. आर्थिक सर्वे और बजट दोनों में ही इस बारे में कोई बात नहीं की गई है."

सीएमआईई के आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी इलाकों में बेरोज़गारी की समस्या ग्रामीण इलाकों के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर है. जनवरी 2021 में शहरी बेरोजगारी की दर आठ फ़ीसद थी, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 5.8 फ़ीसद थी.

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एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस मुश्किल से निपटने कि लिए सरकार को महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) प्रोग्राम के शहरी वर्जन को लाना चाहिए, यानी इसके ज़रिए शहरों में भी काम की गारंटी देनी चाहिए.

मनरेगा के तहत सरकार किसी भी एक वित्त वर्ष में हर ग्रामीण परिवार को 100 दिन की रोज़गार की गारंटी देती है. साथ ही अगर नौकरी के लिए आवेदन करने के 15 दिन के भीतर ही आवेदक को नौकरी नहीं मिलती है तो उसे बेरोज़गारी भत्ता दिए जाने का प्रावधान है.

प्रणब सेन कहते हैं, "इस विचार पर चर्चा हुई है और इस पर सोचा जा सकता है. लेकिन, इसे कैसे लागू किया जाएगा यह देखने की बात होगी."

सरकार देश में जॉब मार्केट को कैसे सुधार सकती है, इस पर महेश व्यास कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले तो यह मानना होगा कि बेरोज़गारी एक समस्या है. व्यास कहते हैं, "सरकार को इसके लिए कोई नीति बनानी होगी."

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मुख्य आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने कहा कि सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर दिए जा रहे ज़ोर से नई नौकरियां पैदा होंगी और अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा.

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