किसान आंदोलन: राजद्रोह क़ानून के नाम पर असंतोष दबाने की कोशिश

दिशा रवि
    • Author, श्रुति मेनन
    • पदनाम, रिएलिटी चेक टीम, बीबीसी
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हाल ही में बेंगलुरू की एक युवा प्रदर्शनकारी दिशा रवि को दिल्ली में गणतंत्रता दिवस पर हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया गया है.

उनके ख़िलाफ़ जिस क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया है वो उसने एक बार फिर सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है.

आख़िर ये क़ानून क्या है जिसका इस्तेमाल 22 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ किया गया है? क्या आजकल देश में इसका इस्तेमाल कुछ ज़्यादा ही किया जा रहा है?

राजद्रोह क़ानून क्या है?

भारतीय दंड संहिता का ये क़ानून किसी भी उस कार्रवाई को अपराध की श्रेणी में रखता है जिसमें "सरकार के प्रति असहमति जताया गया है या फिर इसकी कोशिश की गई है."

इसमें सज़ा के तौर पर जुर्माना या फिर अधिकतम उम्र कैद की सज़ा या फिर दोनों ही हो सकती है.

सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक करने या फिर उसे शेयर करने, कार्टून बनाने, यहाँ तक की स्कूल में नाटक खेलने को लेकर भी इस क़ानून का इस्तेमाल किया गया है.

जब भारत ब्रितानी हुकूमत के अंदर था तब यह क़ानून 1870 के दशक में लाया गया था.

सऊदी अरब, मलेशिया, ईरान, उज़्बेकिस्तान, सूडान, सेनेगल और तुर्की में भी इस तरह का क़ानून है.

अमेरिका में भी इस राजद्रोह क़ानून का एक रूप मौजूद है लेकिन वहाँ के संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी इतनी मज़बूत रूप में मौजूद है कि शायद ही शायद ही कभी ये वहाँ लागू होता हो.

साल 2009 में ब्रिटेन ने अपने यहाँ यह क़ानून रद्द कर दिया है. वहाँ इस तरह के क़ानूनों के ख़िलाफ़ एक लंबी क़ानूनी मुहिम चली.

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विरोध प्रदर्शन

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भारत में राजद्रोह के मामलों में इजाफा

वकीलों, पत्रकारों और अकादमिकों के एक समूह आर्टिकल 14 के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच सालों में औसतन 28 फ़ीसद के हिसाब से हर साल राजद्रोह के मामलों में भारत में वृद्धि देखी गई है.

भारत के आधिकारिक नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2014 तक राजद्रोह के मामलों को अलग श्रेणी के अंतर्गत रखना शुरू नहीं किया था. एनसीआरबी ने राजद्रोह के जितने मामले बतलाए हैं वो आर्टिकल 14 समूह की ओर से बताई गई संख्या से कम है क्योंकि राजद्रोह से जुड़े सभी मामलों को उन्होंने उस श्रेणी में नहीं रखा था.

आर्टिकल 14 समूह के डेटाबेस की देखरेख करने वाले लुभयाथी रंगराजन का कहना है कि यह समूह कोर्ट के दस्तावेज और पुलिस रिपोर्ट्स को पूरे ध्यान से जांचती है कि क्या-क्या मामले दर्ज किए गए हैं.

वो कहते हैं, "एनसीआरबी मुख्य अपराध क्या है इस आधार पर अपराध को श्रेणीबद्ध करती है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर राजद्रोह के साथ-साथ बलात्कार और हत्या के मामले भी दर्ज हैं तो वो उस मामले को बलात्कार और हत्या की श्रेणी में सूचीबद्ध करती है ना कि राजद्रोह की श्रेणी में."

लेकिन एक बात इन दोनों की ही रिपोर्ट्स मे आम है कि राजद्रोह के मामलों में वृद्धि हुई है.

ग्राफिक्स

आर्टिकल 14 के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में दर्ज कुल राजद्रोह के मामले के दो तिहाई पांच राज्यों बिहार, कर्नाटक, झारखंड, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दर्ज हुए हैं.

ये मामले केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों की ओर से दर्ज किए गए हैं.

कुछ राज्य लंबे वक्त से माओवादी हिंसा से प्रभावित रहे हैं.

लेकिन आंकड़े बताते हैं कि हाल के सालों में राजद्रोह के मामलों में जो इजाफ़ा हुआ है, वो नागरिक आंदोलनों से जुड़ा हुआ है.

मसलन आप वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन को देख लीजिए या फिर 2019 में चले नागरिक संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन को. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में एक दलित लड़की के गैंग रेप के मामले में भी इस क़ानून का उपयोग देखा गया है.

विरोध प्रदर्शन

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राजद्रोह के क़ानून का इस्तेमाल क्यों?

भारतीय अदालतों में भी राजद्रोह के क़ानून के इस्तेमाल को लेकर कई बार सवाल खड़े हुए हैं. दिल्ली की एक अदालत ने इस फरवरी की शुरुआत में कहा था कि राजद्रोह के क़ानून का इस्तेमाल 'असहमति के स्वर को चुप कराने' में नहीं किया जा सकता है.

ऐसा कहते हुए कोर्ट ने उन दो लोगों को जमानत दे दी थी जिनके ऊपर कथित तौर पर फेक वीडियो शेयर करने का इल्जाम था.

भारत के शीर्ष अदालत ने भी कहा है कि राजद्रोह के मामले तब तक नहीं लगाए जा सकते जब तक कि कोई व्यक्ति सरकार के ख़िलाफ़ हिंसा करने के लिए ना उकसाए या फिर उसका मकसद अराजकता फैलाना हो.

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राजद्रोह के मामलों में दोष साबित होने की दर 2014 के 33 फ़ीसद से गिरकर 2019 में तीन फ़ीसद तक आ गई है.

वरिष्ठ वकील कॉलीन गोंसाल्वेस ने राजद्रोह के क़ानून की वैद्यता को चुनौती दी है. उनका मानना है कि इसे डराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "सरकार नौजवान लोगों के ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल कर उन्हें जेल में डालकर डरा रही है."

गोंसाल्वेस का कहना है कि इस क़ानून की प्रक्रिया ही अपने आप एक सज़ा है.

सत्तारूढ़ दल बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता टॉम वडक्कन इस क़ानून का बचाव करते हैं.

वो कहते हैं, "हम अहिंसा में विश्वास रखने वाले देश है लेकिन अगर वैसे तत्व जो ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं जिससे देश की छवि प्रभावित होती है, उनके ख़िलाफ़ यह क़ानून कारगर है."

असीम त्रिवेदी

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इन मामलों में दोषी साबित होने की दर कम होने पर वो कहते हैं, "इसके कई मामलों में पर्याप्त सबूत नहीं मिल पाते हैं. कभी-कभी इसकी तह में जाना मुश्किल होता है."

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को साल 2011 में कांग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार ने राजद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया था. विरोध-प्रदर्शन के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था. वो कहते हैं कि आज हालात बदले हुए दिखते हैं.

वो कहते हैं, "मैं खुशकिस्मत था. मुझे अगर व्यापक पैमाने पर समर्थन नहीं मिला होता तो मुझे बाकी की ज़िंदगी केस लड़ने में गुजरती और मेरे सारे पैसे इसी में जाते. "

"मैं इस बात को लेकर निश्चित हूँ कि आज जैसा वक्त होता तो मेरे ख़िलाफ़ मामला चलता रहता और मुझे कोर्ट के अंदर और बाहर हर जगह खुद का बचाव करना पड़ता."

BBC ISWOTY

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