पुद्दुचेरी से किरण बेदी की विदाई का सबब क्या है?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बैंगलुरू से बीबीसी हिंदी के लिए
राष्ट्रपति ने केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी को हटा दिया है. दरअसल बेदी को वापस बुलाने के फ़ैसले के कई मायने हैं. यह बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का डैमेज कंट्रोल मैकेनिज्म हो सकता है क्योंकि पुद्दुचेरी में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं.
लेकिन बेदी को हटाने की एक और वजह हो सकती है. दरअसल तमिलनाडु में भी चुनाव होने हैं और बीजेपी नहीं चाहती थी कि किरण बेदी के कामकाज के तरीका वहां कोई मुद्दा बन जाए.
पुद्दुचेरी में किरण बेदी और मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी के बीच आम जनता के समर्थन में चलाई जा रही कई नीतियों को लागू करने के सवाल पर शुरू से टकराव रहा है.
पोंगल और दिवाली में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को मुफ्त चावल बांटने का मामला हो या कॉन्ट्रैक्ट टीचरों की नियुक्ति का सवाल, दोनों एक दूसरे के काम करने के तरीकों का विरोध करते रहे हैं.
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के प्रोफ़ेसर लक्ष्मणन ने बीबीसी हिंदी से कहा कि इस बात में कोई शक नहीं कि बेदी के कामकाज का तरीका बीजेपी के लिए शर्मिंदगी की वजह बनता जा रहा था. लिहाजा पार्टी के लिए उन्हें हटाने का फ़ैसला उसका अपना नुकसान कम करने के लिए उठाया गया क़दम ही है. अगर उन्हें बरक़रार रखा जाता तो इसका असर तमिलनाडु पर भी पड़ता.
एलजी और सीएम के बीच गहरे मतभेद

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प्रोफेसर लक्ष्मणन ने कहा, "बेदी रोजमर्रा के काम में दख़ल देती थीं. यह बेवजह था. सरकार के कामकाज में बेदी का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया था कि वह सरकार के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को भी पूरा करने की राह में अड़चन डालने लगी थीं. "
प्रोफ़ेसर लक्ष्मणन कहते हैं, "कहावत है कि जब दो हाथी लड़ते हैं तो नीचे की घास कुचली जाती है. बेदी और नारायस्वामी की लड़ाई में इस कहावत को लागू करते हुए कहा जा सकता है कि जब प्रशासन पर मार पड़ती है तो आम जनता को झेलना पड़ता है".
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बेदी और नारायणस्वामी के बीच टकराव तो साल 2016 से शुरू हो गए थे. दोनों को झगड़ा इतना बढ़ गया था कि फरवरी 2019 में सीएम को राजभवन (लेफ्टिनेंट गवर्नर का आवास) के सामने छह दिनों तक धरना देना पड़ा.
दरअसल किरण बेदी, सरकार की ओर से पारित 39 प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दे रही थीं. इनमें समाज के कुछ खास वर्गों के लिए दिवाली और पोंगल में मुफ़्त अनाज और उपहार बांटने की योजनाएं शामिल थीं.

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मुख्यमंत्री और लेफ्टिनेंट गवर्नर के रिश्तों को बयां करने वाला वो दृश्य अद्भुत था, जिसमें नारायणस्वामी अपने कैबिनेट के सहयोगियों के साथ धरने पर बैठे हुए हैं. सीएम और उनके सहयोगी राजभवन के सामने सड़क पर लगभग लेटे हुए हैं और किरण बेदी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की भारी मौजूदगी के बीच दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने के लिए चेन्नई एयरपोर्ट की ओर रवाना हो रही हैं.
राजभवन के बाहर और भीतर से बेदी और नारायणस्वामी ने एक दूसरे को पत्र भेजा और आख़िरकार 21 फरवरी 2019 को दोनों की मीटिंग हुई. इसके अलावा सीएम के प्रति और कोई शिष्टाचार नहीं दिखाया गया.
आमने-सामने की बैठक में कुछ प्रस्तावों पर विचार करने के बाद उन्हें हरी झंडी दे दी गई. लेकिन दोनों के बीच तनाव जारी रहा. पिछले सप्ताह बेदी की हटाने की मांग लेकर दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात के पहले नारायणस्वामी ने एक बार फिर राजभवन के सामने धरना दिया.
नारायणस्वामी ने बीबीसी हिंदी से 14 फरवरी, 2019 को बात करते हुए कहा था, "जब भी हम उन्हें कोई फ़ाइल भेजते हैं, वह इसमें सवाल लगाकर हमें वापस भेज देती हैं. केंद्र सरकार और बेदी मिल कर साजिश कर रहे हैं. वह प्रधानमंत्री को खुश करना चाहती हैं क्योंकि पुद्दुचेरी में कांग्रेस की सरकार है. हम चाहते हैं कि पुद्दुचेरी की ग़रीब जनता के लिए मुफ़्त अनाज बांटने जैसी योजनाएं लाई जाए. लेकिन वह हमारी कल्याणकारी योजनाओं को रोक रही हैं. उनकी वजह से पब्लिक सेक्टर और को-ऑपरेटिव सेक्टर के कर्मचारियों का वेतन रुक रहा है. शिक्षण संस्थानों को उनका अनुदान नहीं मिल रहा है."

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दिल्ली में जिस तरह से अरविंद केजरीवाल ने लेफ्टिनेंट गवर्नर के ख़िलाफ़ धरना दिया था, ठीक उसी तर्ज़ पर नारायणस्वामी भी किरण बेदी के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गए थे.
किरण बेदी पुद्दुचेरी में बगैर हेलमेट पहने स्कूटर-मोटरसाइकिल चलाने वालों को पकड़ने के लिए खुद सड़कों पर उतर आई थीं. उन्होंने पुलिस को ऐसे लोगों पर भारी जुर्माना लगाने को कहा था. वहीं नारायणस्वामी का कहना था भारी-भरकम जुर्माना लगाने से पहले लोगों को हेलमेट लगाने के बारे में ज़ागरुक करना चाहिए था.
किरण बेदी चाहती थीं कि ग्रामीणों को चावल देने के बजाय पैसा दिया जाए. नारायणस्वामी का मानना था कि अगर वह कैश देंगे तो परिवार के पुरुष इसे महिलाओं से छीन कर शराब में उड़ा देंगे.

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बेदी और नारायणस्वामी के बीच झगड़े की जड़ में कुछ और भी वजहें थीं. इनमें पुद्दुचेरी के इंजीनियरिंग और मेडिसिन जैसे प्रोफ़ेशनल कोर्सों में यहां के सरकारी स्कूली से पास हुए छात्र-छात्राओं के लिए दस फ़ीसदी रिजर्वेशन का मुद्दा भी शामिल था. तमिलनाडु में इस मामले में 7.5 फ़ीसदी लागू है. लेकिन बेदी ने इसे मंजूरी देने से इनकार कर दिया.
किरण बेदी ने खुद को हटाए जाने के फ़ैसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है. लेकिन उन्होंने केंद्र को धन्यवाद देते हुए संदेश जरूर दिया है.
उन्होंने, कहा, "केंद्र सरकार ने पुद्दुचेरी की सेवा का मुझे जो मौका दिया, वह मेरे लिए जीवन भर का यादगार अनुभव बन गया. मैंने जो कुछ भी किया अपना पवित्र कर्तव्य समझ कर किया. मैंने अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी निभाई. पुद्दुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर की यात्रा में जो लोग मेरे साथ रहे उनका बहुत धन्यवाद. मैं पुद्दुचेरी के लोगों और सार्वजनिक सेवा से जुड़े अफ़सरों और कर्मियों को भी धन्यवाद देती हूं.''
क्या पुद्दुचेरी बीजेपी भी किरण बेदी की वापसी चाहती थी?
नाम ने जाहिर करने की शर्त पर एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, "बीजेपी की स्थानीय इकाई भी चाहती थी कि किरण बेदी को वापस बुला लिया जाए. बाद में तो बीजेपी के कुछ नेताओं ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व तक बेदी की शिकायतें पहुंचाने लगे थे.
जब ए नंबीशिवायम बीजेपी में शामिल हुए (पहले वह कांग्रेस में थे) तो उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से अपनी बातचीत में यह भी कहा कि पु्द्दुचेरी में पार्टी को एलजी के फ़ैसले का ख़ामियाजा भुगतना पड़ सकता है."
नाम न जाहिर करने के शर्त पर बीजेपी के एक पर्यवेक्षक ने बीबीसी हिंदी को बताया , "दरअसल पुद्दुचेरी में हेलमेट न पहनने पर जुर्माना लगाने का ही एक मामला ऐसा था, जिसने आम लोगों पर असर डाला था. बाकी मामलों का उन पर कोई असर नहीं हुआ. वैसे भी बेदी पांच साल पूरा कर चुकी थीं. इसलिए उन्हें वापस बुला लिया गया. अब तेलंगाना के गवर्नर रह चुके तमिलसई सौंदराजन को पुद्दुचेरी का एलजी बनाया गया है."
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मलान ने बीबीसी हिंदी से कहा, "बीजेपी बेदी को वापस बुला कर यह दिखाना चाहती है कि एलजी और सीएम के बीच अहम का टकराव चल रहा था. पार्टी चाहती थी कि लोग यह समझें कि बेदी और नारायणस्वामी के अहम की लड़ाई थी. लेकिन लगता नहीं है लोग इसे इस रूप में देखेंगे."
प्रोफेसर लक्ष्मणन का मानना है कि अगर बेदी पुद्दुचेरी की गवर्नर बनी रहतीं तो इसका असर तमिलनाडु में अप्रैल-मई में होने वाले चुनावों पर पड़ सकता है. वह कहते हैं, "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आम तौर पर लोगों की धारणा यही है कि तमिलनाडु में केंद्र यानी बीजेपी पर्दे के पीछे से सरकार चला रही है. अगर बेदी पुद्दुचेरी में बनी रहतीं तो लोगों में यह संदेश जाता कि वहां की तरह केंद्र तमिलनाडु के मामलों में भी हस्तक्षेप करेगा."
कांग्रेस की दुविधा

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पुद्दुचेरी में दो दिन में कांग्रेस के दो विधायक इस्तीफ़ा दे चुके हैं. विपक्ष अब सरकार से बहुमत साबित करने की मांग कर रहा है. कांग्रेस की मुसीबत कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई है.
पुद्दुचेरी के साथ वह तमिलनाडु में भी परेशानी झेल रही है. तमिलनाडु में अब डीएमके सत्ता हासिल करने के लिए ज़ोर लगा रही है. पिछले चुनाव में कांग्रेस अपनी ज्यादातर सीटें जीतने में नाकाम रही थी.
मलान कहते हैं, "पिछले चुनाव में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट अच्छा नहीं था. द्रमुक का मानना है कि अगर कांग्रेस अपनी अधिकतर सीटें जीतने में कामयाब रहती तो इसके साथ मिल कर वह पांच साल तक सरकार चला सकती थी. इसलिए अब वह पुद्दुचेरी की हालत का फ़ायदा उठाते हुए कांग्रेस को कम सीटें देने की कोशिश करेगी."
बेदी की विदाई के अलावा कांग्रेस के लिए दिलासा देने वाली सिर्फ़ एक बात यही है पुद्दुचेरी में अभी इसकी सरकार बरकरार है. जिस दिन बेदी की विदाई हो रही थी उस दिन राहुल गांधी वहां रैली कर रहे थे. दक्षिण में सिर्फ पुद्दुचेरी में कांग्रेस सत्ता में है.

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