रिंकू शर्मा की दिल्ली में दिन-दहाड़े हुई हत्या की वजह क्या थी

रिंकू शर्मा

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मंगोलपुरी से
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उत्तर पश्चिमी दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में रिंकू शर्मा नाम के एक युवक की हत्या के बाद इस बात पर बहस छिड़ी है कि इस घटना की वजह क्या थी.

सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर लोग लिख रहे हैं कि रिंकू को इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिंदू था और उसका संबंध बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था.

दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह सांप्रदायिक हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि आपसी रंजिश का मामला है जिसकी वजह से यह हत्या हुई है, पुलिस ने इस सिलसिले में चार लोगों को गिरफ़्तार किया है. इलाके में तनाव को देखते हुए वहाँ अर्धसैनिक बल की तैनाती की गई है.

दोपहर में क्या हुआ था?

शुक्रवार दोपहर रिंकू शर्मा के मोहल्ले मंगोलपुरी पहुंचने से पहले इस बीबीसी संवाददाता ने बाहरी दिल्ली के एडिशनल डीसीपी सुधांशू धामा से बात की.

धामा बताते हैं, "परसों रात को कुछ लड़के बर्थडे पार्टी के लिए मंगोलपुरी के इलाके में इकट्ठे हुए थे. इसी पार्टी के दौरान इन लोगों के बीच एक रेस्तरां को लेकर झगड़ा हुआ है. दोनों पक्षों की अलग-अलग रेस्तरां में हिस्सेदारी थी. मृतक की कोई हिस्सेदारी नहीं थी लेकिन इनके मित्र हैं सचिन और आकाश जिनका रेस्तरां था. इसके साथ ही चिंगू उर्फ जाहिद ने रोहिणी में एक रेस्तरां खोला था."

मंगोलपुरी

एडिशनल डीसीपी ने बताया कि मृतक रिंकू शर्मा के मित्र का रेस्तरां लॉकडाउन की वजह से बंद हो गया था. इसी मामले में झगड़ा शुरू हुआ था. झगड़ा बढ़ते-बढ़ते चिंगू उर्फ जाहिद वहां से चले गए. इसके बाद वह अपने मामा और तीन चार रिश्तेदारों को लेकर रिंकू के घर पहुंचे थे. जाहिद के मामा दानिश उर्फ़ लाली का घर मृतक के घर की गली में ही था. यहीं पर इनके बीच झगड़ा शुरू हुआ जिसके दौरान रिंकू को चाकू मार दिया गया. इसके बाद रिंकू को अस्पताल ले जाया गया जिसके बाद इलाज के दौरान रिंकू की मृत्यु हो गई.

धामा ने बताया, "इस मामले में शामिल लोगों को तभी गिरफ़्तार कर लिया गया था, इन चारों का आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. अभी तक इस मामले में किसी भी तरह का सांप्रदायिक एंगल सामने नहीं आया है. ये पूरी तरह एक व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का मामला है. ये लोग एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे और एक दूसरे को जानते थे, ऐसे में ऐसी कोई बात नहीं है कि सांप्रदायिक वैमनस्य का मामला हो."

हालांकि रिंकू के परिवार के कुछ लोगों ने मीडिया से यह बात कही है कि हत्या की वजह उसका हिंदू होना था, वह बजरंग दल का कार्यकर्ता था और राम मंदिर के निर्माण के लिए चंदा जुटा रहा था, ऐसा कहने वालों में रिंकू का छोटा भाई भी शामिल है.

क्या कहते हैं आम लोग?

दिल्ली पुलिस जानकारी मिलने के बाद बीबीसी संवाददाता मृतक के घर पहुंचा जहाँ राजनीतिक हस्तियों का आना-जाना लगा हुआ था. मौके पर पहुंचने पर बीजेपी सांसद हंसराज हंस, आम आदमी पार्टी की विधायक राखी बिड़ला और दिल्ली बीजेपी के प्रमुख आदेश गुप्ता वहां पहुंचते दिखे.

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बीबीसी संवाददाता ने मृतक के घर पहुंचने की कोशिश की लेकिन राजनेताओं के आने की वजह से काफ़ी भीड़ मौजूद थी. ऐसे में पहले आम लोगों से बातचीत करने का फ़ैसला किया.

हंसराज हंस

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इमेज कैप्शन, बीजेपी सांसद हंसराज हंस मृतक रिंकू के घर भी पहुंचे

लोगों से बात करके ये समझने की कोशिश की कि क्या इस मोहल्ले में पहले भी कभी दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक अशांति का माहौल पनपा है.

मृतक रिंकू के घर के पास रहने वाले एक शख़्स ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग दिया जा रहा है. यहां पर काफ़ी मुसलमान रहते हैं, देखिए आपके पीछे ही अज़ान की आवाज़ आ रही है. मैं यहां लगभग 40-45 सालों से रह रहा हूं, यहां कभी ऐसा नहीं हुआ."

इसी मोहल्ले में थोड़ा आगे बढ़ते हुए मैं एक मंदिर में पहुंचा जहां हमारी बात एक 50 वर्षीय महिला से हुई. उन्होंने कहा, "रिंकू बहुत अच्छा लड़का था. पंडित घर से था, मंदिर में आकर पूजा-पाठ किया करता था. कभी झंडे लगा देता था और जब दिख जाता था तो हालचाल पूछ लेता था. सीधा-सादा लड़का था. उसके घर वाले भी बहुत अच्छे हैं. ये बहुत बुरा हुआ है."

बीबीसी संवाददाता ने जब गिरफ़्तार किए गए लड़कों और उनके परिवार के बारे में पूछा तो महिला ने कहा, "हम कायस्थ हैं. हम उन लोगों से मतलब नहीं रखते. वे छोटी जाति हैं. हमारी गली में भी दो घर हैं. हम किसी तरह का मतलब नहीं रखते. इन लोगों के इस मोहल्ले में एक नहीं कई घर हैं. एक-एक के चार-चार लड़के हैं और सब के सब लड़ाई झगड़ा करने में आगे हैं."

इन्हीं महिला ने हमें गिरफ़्तार किए गए लोगों के घर का रास्ता दिखाया.

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मंदिर से लगभग पचास कदम की दूरी पर गुलाबी रंग से पुता हुए एक पुराना सा घर था जो कि अब खाली पड़ा है. यहां आस-पास खड़े लोगों ने बताया कि ये सारे लोग भाग गए हैं.

वहीं रहने वाले महताब के पड़ोसियों से बात करने की कोशिश करने पर वहां मौजूद कई महिलाओं ने कहा कि अब काफ़ी डर लगता है कि भगवान का नाम लेने पर मार दिया जाएगा. महताब के घर के दाईं ओर स्थित घर में रहने वाली लगभग पचास वर्षीय ललिता से बात की तो उन्होंने भी यही बात की.

लेकिन जब उनसे ये पूछा गया कि क्या कभी उन्हें धार्मिक आयोजन कराने पर अपने पड़ोसी (महताब के परिवार) की ओर से आपत्ति का सामना करना पड़ा तो इस पर उन्होंने कहा कि उनके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ.

मंगोलपुरी

बीबीसी संवाददाता ने महताब के घर के सामने रहने वाले कई लोगों से बात की. यहां पर मौजूद दो लोगों ने नाम न बताने की शर्त पर स्पष्ट रूप से बताया कि वे जागरण आदि का आयोजन करते थे, सड़क पर ही खाना बनता था लेकिन कभी भी पेशे से दर्जी महताब के पिता या खुद महताब की ओर से आपत्ति नहीं की गई.

इन लोगों ने ये भी बताया कि इस घटना में जो चाकू इस्तेमाल किया गया था वो मृतक रिंकू शर्मा का था. ये बताते हुए हत्या के समय रिकॉर्ड किया गया वीडियो का हवाला दिया गया.

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नाराज़ भीड़ का हमला

महताब के घर के बाहर उनके पड़ोसियों से बातचीत जारी ही थी कि तभी लाल और ग्रे स्वेटर पहने दो व्यक्तियों ने बीबीसी संवाददाता को घेरना शुरु कर दिया.

सबसे पहले ऊंची आवाज़ में धक्का-मुक्की करते हुए आक्रामक ढंग से धमकाने की कोशिश की गई, इसके बाद इन लोगों ने और लोगों को बुलाना शुरू कर दिया जिससे भीड़ बढ़ने लगी.

इन लोगों ने धमकी दी गई कि हाथ-पैर तोड़ दिए जाएंगे, यहीं कचूमर निकाल देंगे, चला जा यहां से. प्रेस कार्ड माँगने पर आईडी कार्ड दिखाया गया जिस पर बीबीसी का नाम देखते ही ये लोग और आग-बबूला हो गए.

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ये सब कुछ मुख्य सड़क से सिर्फ 15 मीटर की दूरी पर हो रहा था लेकिन हर एक कदम मुख्य सड़क की ओर बढ़ाना भारी पड़ रहा था. बाहर जाने की कोशिश करते ही गालियाँ देती हुई भीड़ पीछे से आने लगती थी.

गली से बाहर जाते हुए पीठ पर घूंसों से वार भी किया गया. किसी तरह 15 मीटर का फ़ासला तय किया गया तो बीएसएफ़ के दो जवान दिखाई दिए. बीएसएफ़ के जवानों को देखकर बीबीसी संवाददाता ने राहत की साँस ली.

मुख्य सड़क पर मौजूद बीएसएफ़ के जवानों के पास पहुंचते ही उन्हें अपना आई कार्ड दिखाकर मदद की माँग की लेकिन जवानों ने हमलावरों को कुछ नहीं कहा. इसके बाद संवाददाता ने किसी तरह मुख्य सड़क पर आगे चलते हुए खुद को बचाने की कोशिश की. लेकिन तभी दो हमलावर अपने साथ भीड़ को लेकर सड़क तक आए और एक बार फिर हाथ पकड़कर गली के अंदर ले जाने की कोशिश की. इसी बीच एक टीवी पत्रकार ने बीबीसी संवाददाता का हाथ पकड़कर वहां से निकाला.

हमलावर भीड़ ने आम लोगों से उनका पक्ष रखने का अधिकार छीन लिया, अफ़सोस इस बात का है कि वो लोग जो दोनों पक्षों से परिचित हैं, वे हमलावर भीड़ के सामने बेहद असहाय होकर एक पत्रकार को अपने बीच से जान बचाकर निकल जाने की सलाह देते दिखे.

BBC ISWOTY

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