कोरोना से लड़ाई में कितनी कारगर होगी नेज़ल वैक्सीन

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस से लड़ाई अब वैक्सीन तक पहुंच चुकी है. कई देशों में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ वैक्सीन लगाई जा रही है.
भारत में भी टीकाकरण अभियान की शुरुआत हो चुकी है और स्वास्थ्यकर्मियों को वैक्सीन दी जा रही है. जिन लोगों को पहले चरण के दौरान टीका लगा है शनिवार से उन्हें दूसरा टीका लगाने का अभियान शुरू किया जाएगा.
भारत में पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया की कोविशील्ड और भारत बायोटेक की को-वैक्सीन कोरोना वैक्सीन के इस्तेमाल को मंज़ूरी मिली है. ये दोनों इंजेक्शन के ज़रिए दी जाने वाली वैक्सीन है.
न्यूज़ एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ 25 जनवरी तक भारत में 20 लाख से ज़्यादा लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है.
लेकिन इंजेक्शन के ज़रिए दी जा रही वैक्सीन के अलावा अब नेज़ल कोरोना वैक्सीन की चर्चा भी हो रही है.
भारतीय बायोटेक्नोलॉजी कंपनी भारत बायोटेक भी नेज़ल कोविड-19 वैक्सीन (BBV154) के इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल की मंज़ूरी के लिए प्रयास कर रही है.
हाल ही में भारतीय ड्रग रेग्यूलेटर सीडीएससीओ के एक एक्सपर्ट पैनल ने इंसानों पर फेज़ 1 के क्लीनिकल ट्रायल की मंज़ूरी के लिए सिफारिश की है. कंपनी का कहना है कि उसके जानवरों पर किए गए क्लीनिकल ट्रायल में अच्छे परिणाम सामने आए हैं.
इसी तरह चीन की एक कंपनी वानटाई बायोलॉजिकल फार्मेसी एंटरप्राइज कंपनी लिमिटेड भी नेज़ल वैक्सीन पर काम कर रही है.
नेज़ल वैक्सीन को कोरोना वायरस से लड़ाई में गेम चेंजर बताया जा रहा है. नीति आयोग के सदस्य डॉक्टर वीके पॉल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, “नेज़ल वैक्सीन के एक उम्मीदवार की पहचान हो गई है. अगर ये काम करता है तो ये गेम चेंजर होगा.”
ऐसे में जानते हैं कि नेज़ल वैक्सीन क्या होती है और ये किस तरह काम करती है.

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नेज़ल वैक्सीन से लोकलाइज़ इम्यूनिटी
वैक्सीन एक ऐसा तत्व होता है जिससे व्यक्ति के शरीर में एंटीबॉडी विकसित होती है जो वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है.
किसी भी वैक्सीन को लगाने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं. ज़्यादातर वैक्सीन इंजेक्शन के ज़रिए दी जाती हैं, कुछ ओरल दी जाती हैं जैसे पोलियो और रोटावायरस वैक्सीन. कुछ वैक्सीन नाक के ज़रिए भी दी जाती है.
सार्वजनिक नीति और स्वास्थ्य प्रणाली विशेषज्ञ डॉक्टर चंद्रकांत लहारिया बताते हैं कि नेज़ल वैक्सीन इंजेक्टेबल वैक्सीन से अलग होती है. नेज़ल वैक्सीन लोकलाइज इम्यूनिटी भी देती है.
दरअसल, जब वैक्सीन शरीर में प्रवेश है तो वो शरीर में अलग-अलग जगह पहुंचती है. शरीर उसे बाहरी तत्व की तरह पहचानता है और फिर इम्यून सिस्टम सक्रीय हो जाता है. इससे शरीर में एंटीबॉडी बनती है जो ख़ून में मौजूद रहती हैं. शरीर में इनकी मात्रा बराबर रहती है इसलिए जहां पर वायरस सक्रीय होगा वहां पर एंटीबॉडी काम करने लगती है. इसे सिस्टेमैटिक इम्यूनिटी भी कहते हैं.
इसमें वायरस को शरीर में अपनी संख्या बढ़ाने से रोका जाता है जिससे व्यक्ति बीमार नहीं पड़ता.
जैसे नाक या मुंह के माध्यम से शरीर में जाने वाले वायरल इंफेक्शन अंदर पहुंचने के बाद कई गुना हो जाते हैं. अगर इन अंगों पर वैक्सीन के ज़रिए वायरस रुक भी जाए फिर भी वो किसी व्यक्ति के नाक और गले में मौजूद रहता है. ऐसे में वो बीमार नहीं पड़ेगा लेकिन किसी दूसरे को संक्रमित कर सकता है. वो वायरस को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकतीं.
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डॉक्टर चंद्रकांत लहारिया 'टिल वी विन: इंडियाज़ फ़ाइट अगेंस्ट कोविड-19 पेंडेमिक' के सह-लेखक हैं.
वह बताते हैं, “वायरस को पूरी तरह ख़त्म करने वाली इम्यूनिटी को स्टेरेलाइजिंग इम्यूनिटी कहते हैं. सैद्धांतिक रूप से नेज़ल वैक्सीन इस मामले में अच्छी सुरक्षा प्रदान करती है. इसमें वैक्सीन को सीधे नेज़ोफेरिंक्स (नाक का एक अंदरूनी हिस्सा) तक पहुंचाया जाता है इससे एंटीबॉडी बड़ी संख्या में म्यूकस में मौजूद रहती है. म्यूकस शरीर के अंदरूनी हिस्से को ढकने वाली त्वचा को कहते हैं जो बाहरी वातावरण के संपर्क में रहती है.”
“नाक में अंदरूनी हिस्से में बड़ी संख्या में एंटीबॉडी होने से वायरस वहीं पर ख़त्म हो सकेगा. इसे संक्रमण का ख़तरा और कम हो जाएगा. इससे तुलनात्मक रूप से ये इंजेक्टेबल वैक्सीन से बेहतर सुरक्षा प्रदान करेगी. तो इससे सिस्टमैटिक इम्यूनिटी के साथ-साथ लोकलाइज़ इम्यूनिटी भी मिलेगी, जिसे म्यूकोजेल इम्यूनिटी भी बोलते हैं. इससे नाक के पिछले हिस्से, गले और फेफड़ो में ये म्यूकोजेल इम्यूनिटी मिलेगी.”
हालांकि, डॉक्टर चंद्रकांत लहारिया का कहना है कि ये सिर्फ़ थ्योरी है और ये हकीकत में कितना कारगर होगा ये वैक्सीन आने पर ही पता चलेगा. ऐसा होना बड़ी सफलता होगी.
नेज़ल वैक्सीन को लेकर पहले भी कोशिशें की जा चुकी हैं. खसरे के लिए भी नेज़ल वैक्सीन तैयार की गई थी लेकिन वो सफल नहीं हो पाई. मौसमी फ्लू के लिए नेज़ल वैक्सीन इस्तेमाल की जाती है लेकिन वो अलग प्रकार होती है.

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कैसे दी जाएगी नेज़ल वैक्सीन
डॉक्टर लहारिया बताते हैं कि नेज़ल वैक्सीन को स्प्रे के ज़रिए डाल सकते हैं.
इसे हल्के फोर्स के साथ बड़े ड्रॉपर के ज़रिए भी डाला जा सकता है.
संसाधनों की बचत
नेज़ल वैक्सीन को सिर्फ़ चिकित्सकीय कारणों से ही नहीं बल्कि अन्य कारणों से भी फायदेमंद बताया जा रहा है.
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में रेसपाइरेट्री मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉक्टर राजीव चावला कहते हैं कि इंजेक्टेबल वैक्सीन को लगाने के लिए सीरिंज, सुई और प्रशिक्षित स्वाथ्यकर्मियों की ज़रूरत होती है. इसकी पूरी व्यवस्था में बहुत संसाधना लगते हैं. जबकि नेज़ल वैक्सीन को डालने के लिए विशेष प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होगी. साथ ही बच्चों या जिन्हें इंजेक्शन से डर लगता है उन्हें नेज़ल वैक्सीन देना आसान होगा.
हालांकि, डॉक्टर्स का कहना है कि जब तक वैक्सीन पूरी तरह मंज़ूरी के साथ इस्तेमाल के लिए नहीं आ जाती तब तक ये कितनी कारगर साबित होगी, इसे लेकर कोई दावा नहीं किया जा सकता.

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