कश्मीर के शोपियां 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' पर पुलिस ने जो अब तक बताया

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

कश्मीर के शोपियां में भारतीय सेना ने 18 जुलाई, 2020 को तीन 'ख़ूँख़ार मिलिटेंटों' को एक एनकाउंटर में मारने की पुष्टि करते हुए घटनास्थल से हथियार और कुछ आपत्तिजनक चीज़ें बरामद करने का दावा किया था.

इसके 22 दिनों के बाद श्रीनगर स्थित सेना के प्रवक्ता राजेश कालिया ने एक बयान जारी करके कहा, "हमने ऑपरेशन से संबंधित सोशल मीडिया के इनपुट्स को नोट किया है. सेना मामले की जाँच कर रही है."

इस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एसाईटी) का गठन करके मामले की जाँच शुरू की थी.

एसआईटी ने एनकाउंटर को फ़र्ज़ी बताया

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जम्मू-कश्मीर पुलिस की एसआईटी ने चार महीने के भीतर 26 दिसंबर, 2020 को शोपियां की एक अदालत में सेना के एक कैप्टन भूपिंदर सिंह उर्फ़ बशीर ख़ान और दक्षिणी कश्मीर के दो अन्य नागरिकों ताबिश नज़ीर और बिलाल अहमद लोन को आरोपी बनाया है और एनकाउंटर को 'फ़र्ज़ी' बताया है.

जम्मू-कश्मीर पुलिस की एसआईटी ने कैप्टन भूपिंदर सिंह, ताबिश नज़ीर और बिलाल अहमद लोन को अपनी जाँच में अभियुक्त बनाया है. पुलिस के आरोप पत्र में सेना के कैप्टन और ताबिश के ख़िलाफ़ कई धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं, जबकि बिलाल को इस मामले में सरकारी गवाह बनाया गया है.

पुलिस ने अपने आरोपपत्र में (जिसका एक बड़ा हिस्सा बीबीसी के पास मौजूद है) बताया है कि सेना के 62 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के एक कैप्टन भूपिंदर सिंह ने अन्य दो स्थानीय नागरिकों (ताबिश और बिलाल) के साथ मिलकर बीस लाख की इनामी रक़म हासिल करने के लिए तीन निर्दोष युवकों को मार डाला था और इन लोगों ने एक 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' को असली मुठभेड़ दिखाने की कोशिश की थी.

पुलिस ने आरोप पत्र में बताया है कि कैप्टन भूपिंदर सिंह ने अपने सीनियर अधिकारियों को ग़लत सूचना दी ताकि वो अपने अधिकारियों को गुमराह कर मामले की प्राथमिकी दर्ज करवा सकें और इनामी रक़म हासिल कर सकें.

इनामी रक़म पर सेना का खंडन

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हालाँकि, सेना ने पिछले सप्ताह एक बयान जारी करके कहा है कि भारतीय सेना के जवानों के लिए इनामी रक़म देने की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. बयान में यह भी कहा गया है कि मीडिया में ऐसी ख़बरें हक़ीक़त से कोसों दूर हैं.

सेना ने मीडिया में 20 लाख के इनामी रक़म की ख़बरें आने के बाद यह बयान जारी किया था.

पुलिस ने अपने आरोपपत्र में बताया है कि 18 जुलाई, 2020 को पुलिस स्टेशन हिरपोरा में सेना की लिखित शिकायत पर एक मामला दर्ज किया गया था. लिखित शिकायत में सेना ने बताया था कि शोपियां के आमिशपुरा में तीन अनजान चरमपंथियों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद उन्हें 17 जुलाई को घेरा गया और बाद में मुठभेड़ में वे मारे गए.

पुलिस ने एनकाउंटर की पूरी कहानी बताई

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जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस 'फ़र्ज़ी मुठभेड़' के हर पहलू को जोड़ते हुए ताबिश और बिलाल को गिरफ्तार किया है. कैप्टन भूपिंदर सिंह को सेना ने अपनी हिरासत में रखा है.

पुलिस ने आरोपपत्र में यह भी बताया है कि सेना ने अपनी लिखित शिकायत में दावा किया था कि मारे गए तीन चरमपंथियों से हथियार बरामद किए गए थे.

आरोपपत्र के मुताबिक़, कैप्टन भूपिंदर सिंह ने घटनास्थल से दो पिस्तौल, दो मैगज़ीन, चार खाली पिस्तौल कार्टिज, 15 लाइव कार्टिज, AK-47 की 15 खाली कार्टिज के अलावा कुछ आपत्तिजनक सामाग्री बरामद करने का भी दावा किया था.

आरोपपत्र के अनुसार पुलिस ने जाँच को आगे बढ़ाते हुए पाया कि मारे गए तीनों युवक, चरमपंथी नहीं बल्कि जम्मू के राजौरी ज़िले के तीन लापता मज़दूर थे, जिनकी पहचान अबरार अहमद ख़ान (20), इम्तियाज़ अहमद (25) और इबरार अहमद (16 ) के रूप में हुई थी.

पुलिस जाँच के मुताबिक़, कैप्टन भूपिंदर सिंह ने 17 जुलाई 2020 को ताबिश और बिलाल को रोशनगिरी कैम्प पर शाम साढ़े छह बजे बुलाया था, जहाँ वो बिलाल लोन की ऑल्टो कार में पहुंचे थे. कैम्प में पहले ही एक दूसरी कार (सुज़ुकी आई-स्टार) का कैप्टन सिंह ने पहले बंदोबस्त किया था और उसी कार में कैप्टन सिंह, ताबिश और बिलाल के साथ कैम्प से रवाना हुए थे और उसी कार में हथियार भी रखे हुए थे.

पुलिस के मुताबिक़, राजौरी के तीन युवकों का जिस समय अपहरण किया गया था, उस समय उन्होंने कुछ सामान ख़रीदा था और किराये के कमरे में आराम कर रहे थे.

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तीनों युवकों का चौगाम इलाक़े से अपहरण करने के बाद, आरोपपत्र के मुताबिक़ अमशिपोरा ले जाया गया था. तीनों युवकों का अपहरण करने के बाद उन्हें एक निजी कार में अमशिपोरा पहुंचाया गया था जहाँ उन्हें कुछ दूर पैदल ले जाकर एक बाग़ में गोलियों से भून डाला गया था.

'एनकाउंटर के बाद आए सुरक्षाबल'

पुलिस ने बताया है, "आरोपी कैप्टन भूपिंदर सिंह ने तीनों के मारे जाने तक अपने किसी भी सीनियर अधिकारी को इस मामले की सूचना नहीं दी थी, बल्कि तीनों को मारने के बाद कैप्टन सिंह ने अपने सीनियर अधिकारयों को सूचित किया था कि इलाक़े में तीन चरमपंथी मौजूद हैं जिसके बाद सेना की एक टुकड़ी घटनास्थल पर पहुंच गई थी."

मारे गए युवकों में से एक युवा इम्तियाज़ अहमद अभियुक्त ताबिश नज़ीर को जानता था. इम्तियाज़ और उनके दो साथियों ने जहाँ मकान किराए पर लिया था, ताबिश का घर उस मकान के नज़दीक है.

आरोपपत्र में बताया गया है कि मारे गए तीन युवकों ने 17 जुलाई, 2020 को शोपियां के चौगम इलाक़े में शौकत अहमद लोन के घर में कमरा किराए पर लिया था और उसी रात को तीनों युवक किराए के इस मकान से रात को लापता हो गए थे.

पुलिस आरोपपत्र के मुताबिक़, एजाज़ अहमद लोन आई-स्टार कार के मालिक हैं. उन्होंने पुलिस को बताया है, "रोशनगिरी, शोपियां में सेना के कैम्प के सैनिक उनके घर पर 17 जुलाई, 2020 को शाम के समय आकर उनसे उनकी गाड़ी लेकर गए थे और अगले दिन सेना ने उन्हें सूचित किया था कि उनकी कार अमशिपोरा में बिगड़ी हुई हालत में रखी हुई है. सेना ने उन्हें ये भी बताया था कि गाड़ी की मरम्मत के बिल कैम्प पर लाए और पैसा ले जाए."

एजाज़ ने बताया है कि उन्होंने कई दिनों के बाद एक टीवी चैनल पर अपनी गाड़ी का फ़ुटेज देखा था.

वीडियो कैप्शन, कवर स्टोरी: क्यों हैं जम्मू-कश्मीर के वनवासी नाराज़

पुलिस ने आरोपपत्र में कहा है, "62 राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कमांडिंग अफ़सर (सीओ) ने बताया है कि अमशिपोरा में हुई घटना के दौरान अभियुक्त कैप्टन भूपिंदर सिंह ने दावा किया था कि उन्होंने अपनी सर्विस राइफ़ल से कुल 37 गोलियां चलाईं थीं. पुलिस ने यह भी कहा है कि कैप्टन सिंह ने 37 में से कुछ गोलियां तब चलाई थीं जब वो घटनासथल पर तीन युवाओं के साथ अकेले थे."

आरोपपत्र के मुताबिक़, मोहम्मद यूसुफ़ बट उस बाग़ के मालिक हैं जहाँ अमशिपोरा में तीन युवकों को मारा गया था. उन्होंने अपने बयान में पुलिस को बताया है, "उन्हें सेना के रोशनगिरी कैम्प से 18 जुलाई, 2020 को क़रीब आठ बजे सुबह फ़ोन आया था कि वो अपने बाग़ में पहुंचें. मैं जब बाग़ में पहुंचा तो वहाँ सेना ने मुझे डराया और धमकाया और बताया कि तुम्हारे बाग़ में तीन दहशतगर्द छिपे थे. दहशतगर्द यहाँ कैसे आए था? मैंने जवाब दिया कि मैं काम में मसरूफ़ था और तीन दिन से यहाँ नहीं आया और मुझे इस हवाले से कोई ख़बर नहीं है. बाग़ में अंदर जाते ही मैंने देखा कि बाग़ में तीन लाशें कपड़े में लिपटी थीं. मैंने देखा कि बाग़ में मौजूद शेड जल रहा है और शेड पर घास रखी हुई थी. लोग मोटर से इस पर पानी छिड़क रहे थे."

यूसुफ़ ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा है, "वर्ष 2018 से इम्तियाज़ अहमद (मारा गया तीन में से एक युवा) उनके घर पर काम करता आया था. इम्तियाज़ ने मुझे सूचित किया था कि उसके साथ और दो मज़दूर काम करने के लिए आ रहे हैं और ये भी बताया था कि उनके लिए किराए के मकान की ज़रूरत है."

पुलिस के मुताबिक कैप्टन सिंह की फ़ायरिंग और आदेश के बाद सेना की टुकड़ी ने इलाक़े को घेरा था.

आरोपपत्र में दर्ज है कि, "प्राइवेट कार में दो आम नागरिकों के साथ (ताबिश और बिलाल) कैम्प से निकलने के बाद कैप्टन सिंह ने पुलिस की कोई मदद नहीं ली. कैप्टन सिंह ने घटना को अंजाम देने के आख़िरी लम्हे तक ना ही अपने अधिकारियों को सूचित किया था और ना ही किसी आम नागरिक को गवाह के तौर पर विश्वास में लिया था."

वीडियो कैप्शन, 1990 से अब तक न जाने कितने मकान तबाह हो चुके हैं.

'सबूत मिटाने के लिए शेड में आग लगाई'

पुलिस ने जानकारी दी है, "कैप्टन सिंह ने कैंप से निकलने के बाद कैम्प को सूचित किया था कि वो घटनास्थल पर पहुंच जाएं, जिससे उन्हें इस बात का विश्वास हो गया था कि चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ संभव है. अमशिपोरा तक पहुंचने के बाद अपनी गाड़ियों से उतरने के बाद जब सेना की टुकड़ी पैदल घटनास्थल की तरफ़ बढ़ने लगी तो उन्होंने गोलियों कि आवाज़ सुनी. गोलियों की आवाज़ सुनने के बाद आरोपी सिंह ने बतया था कि छिपे चरमपंथी भागने की कोशिश कर रहे थे."

पुलिस का कहना है कि कैप्टन सिंह ने सबूतों को मिटाने के लिए बाग़ में बने खाली शेड में आग लगाई थी जहाँ तीनों युवकों को मार डाला गया था. कैप्टन भूपिंदर सिंह ने अपने कमांडिंग अफ़सर 62 राष्ट्रीय राइफ़ल्स को सूचित किया था कि उनके स्रोत ने उन्हें टार्गेटेड मकान दिखाते हुए बताया था कि यहाँ पांच चरमपंथी छिपे हुए हैं.

कैप्टन सिंह ने अपने कमांडिंग अफ़सर को ये भी बताया था कि इलाक़े का घेराव करते समय सेना पर दो तरफ़ से गोली चली थी.

पुलिस ने बताया है कि उन ग़ैर-क़ानूनी हथियारों के बारे में अभियुक्तों ने अभी तक कोई जानकारी नहीं दी है कि वो हथियार कहाँ से और किस तरह लाए गए थे, जिन हथियारों को मारे गये तीन युवकों से बरामद करने का दावा कैप्टन सिंह ने किया था.

सेना

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पुलिस के मुताबिक़, इस मामले में 75 गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए गए हैं जिन गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए गए हैं उनमें सेना के चार लोग भी शामिल हैं जो कैप्टन सिंह के दस्ते का हिस्सा थे.

आरोपपत्र में बताया गया है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक़, "तीनों की मौत गोलियां लगने और ख़ून बहने से हुई थी."

मरने वालों की कैसे हुई शिनाख़्त?

आरोपपत्र में बताया गया है कि ताबिश नज़ीर और बिलाल अहमद लोन जून के महीने से ही कैप्टन भूपिंदर सिंह के साथ संपर्क में थे. पुलिस ने यह भी कहा है कि तीनों युवकों की लाशों को हीरपोरा पुलिस स्टेशन में पहचान के लिए रखा गया था, लेकिन मृतकों की तस्वीरों को दिखाने के बाद भी कोई उनकी पहचान नहीं कर सका.

पुलिस जाँच में कहा गया है कि तीनों युवकों को मारे जाने के बाद उन्हें A, B और C कहा गया था. पुलिस ने तीनों ही लाशों को बाद में श्रीनगर के पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) में रखा था और इस दौरान शोपियां, कुलगाम और पुलवामा के उन सभी परिवारवालों को इन लाशों की पहचान के लिए बुलाया गया जिनके बच्चे सक्रिय चरमपंथी हैं. लेकिन कोई भी इन तीनों की पहचान नहीं कर सका.

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पुलिस ने बताया है कि आठ अगस्त, 2020 को जम्मू और कश्मीर के सभी पुलिस स्टेशनों को वायरलेस सूचना के ज़रिए सूचित किया गया था कि अपने-अपने इलाक़ों में लापता लोगों की सूची जारी करें, ताकि मारे गए चरमपंथियों की पहचान की जा सके. लेकिन इसके बाद भी इन तीनों की पहचान नहीं हो सकी थी.

पुलिस का कहना है कि इसके बाद एक बार फिर से भारत के सभी पुलिस स्टेशनों को वायरलेस सूचना के ज़रिए सूचित किया गया था कि वो अपने-अपने इलाक़ों में लापता लोगों के घरवालों को जानकारी दें और पुलिस स्टेशन हीरपोरा में तस्वीरों के ज़रिए लाशों की पहचान के लिए संपर्क करने के लिए कहें.

आख़िरकार, 10 अगस्त, 2020 को राजौरी ज़िला से, पुलिस के मुताबिक़ यह सूचना मिली कि राजौरी के तीन युवा 16 जुलाई 2020 को कश्मीर गए थे, जिनका अभी तक कोई अता-पता नहीं है और न ही अभी तक तीनों युवा घर वापस लौटे हैं.

13 जुलाई, 2020 को कश्मीर से पुलिस का एक दस्ता राजौरी के लिए रवाना हुआ और दावा करने वाले घरवालों से डीएनए नमूने हासिल किए गए. 21 सितम्बर, 2020 को डीएनए नमूनों से यह बात साफ़ हो गई कि मारे गए तीनों युवा राजौरी के मज़दूर थे.

बारामूला के क़ब्रिस्तान में चरमपंथियों को दफ़न किया जाता है

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सेना ने माना आफ़स्पा का ग़लत इस्तेमाल हुआ

पुलिस ने लाशों की पहचान न होने के बाद तीन मृतकों को अमशिपोरा से क़रीब सौ किलोमीटर दूर ज़िला बारामूला के गांठमूला के क़ब्रिस्तान में दफ़न किया था. बारामूला के गांठमूला के क़ब्रिस्तान में चरमपंथियों को दफ़न किया जाता है. डीएनए नमूनों की पुष्टि होने के बाद लाशों को क़ब्रों से वापस निकालकर घरवालों को सौंपा गया.

ग़ौरतलब है कि बीते वर्ष कोविड-19 शुरू होने के बाद कश्मीर में एनकाउंटर्स में मारे जाने वाले चरमपंथियों की लाशें घरवालों के सुपुर्द नहीं की जाती हैं. पुलिस का कहना है कि कोविड-19 को देखते हुए चरमपंथियों की लाशों को घरवालों को सौंपा नहीं जाता है. पुलिस ने बताया है कि पुलिस और सीआरपीएफ़ अमशिपोरा ऑपरेशन में सेना के बाद शामिल हो गए थे.

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ताबिश के वकील एजाज़ ज़रगर ने बातचीत के दौरान बीबीसी को बताया कि वो अदालत में सबूतों के साथ पेश होंगे और अपने क्लाइंट को बेगुनाह साबित करेंगे. अपनी तफ़्तीश में पुलिस ने बताया है कि इस मामले में इस्तेमाल हुई एक अन्य आई-टेन कार भी अभी तक बरामद नहीं हुई है.

पुलिस ने जाँच में बताया है कि आरोपी कैप्टन सिंह, ताबिश नज़ीर और बिलाल लोन ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है जिसे इस बात का यक़ीन हो कि वो निर्दोष हैं.

18 सितंबर, 2020 को सेना ने एक बयान जारी करके कहा था, "ऑपरेशन अमशिपोरा में सेना ने जो जाँच शुरू की थी वो पूरी हो चुकी है. जाँच में पाया गया कि ऑपरेशन के दौरान आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ़स्पा 1990) के तहत मिले विशेषाधिकार का बेजा इस्तेमाल किया गया है."

सेना ने 24 दिसंबर 2020 को एक बयान जारी कर बताया, "अमशिपोरा ऑपरेशन में रिकॉर्डिंग करने और सबूत जुटाने का काम पूरा हो चुका है." इसके अलावा सेना ने और कुछ नहीं बताया है.

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