बाल विवाह कराना अपराध है तो बचपन में हुई शादी अवैध क्यों नहीं?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में रहने वाले ज़्यादातर लोगों को इस बात की जानकारी है कि भारतीय बाल विवाह क़ानून के तहत भारत में बाल विवाह को क़ानूनी मान्यता हासिल नहीं है.
अगर आप बाल विवाह कराने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं तो आपको सज़ा हो सकती है. बचपन में शादी के बंधन में बंधने वाले लोग वयस्क होकर अपनी शादी को ख़ारिज करा सकते हैं और ऐसा कराने के लिए आपको अपने ज़िला न्यायालय में अर्ज़ी देनी होती है.
केंद्र और राज्य सरकारों ने बाल विवाह को रुकवाने के क़ानूनों में संशोधन किए हैं. कई स्तरों पर अधिकारियों को तैनात किया है ताकि बाल विवाह रोके जा सकें और लोगों को इससे बाहर निकाला जा सके.
लेकिन इसके बावजूद एक 28 वर्षीय महिला ने अपनी शादी को ख़ारिज करवाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में दस्तक दी है.
इस महिला ने कोर्ट से ये माँग भी की है कि दिल्ली में बाल विवाह को अवैध ठहराया जाए. दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली सरकार से जवाब माँगा है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि जब क़ानूनी रूप से भारत में बाल विवाह को मान्यता ही नहीं है तो हाई कोर्ट इस महिला की याचिका क्यों सुन रहा है.
अजीबो-गरीब स्थिति

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संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के मुताबिक़, 18 वर्ष की आयु से पहले बच्चों की शादी मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है. लेकिन इसके बावजूद भारत समेत दुनिया भर में ये प्रथा जारी है.
यूनिसेफ के मुताबिक़, भारत में हर साल लगभग 15 लाख लड़कियों की शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले हो जाती है.
दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी देने वाली महिला भी ऐसी ही तमाम लड़कियों में शामिल हैं. इस महिला की शादी साल 2010 में तब हो गई थी जब वह नाबालिग थीं.
महिला की ओर से कोर्ट में जिरह करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद बताते हैं, “इस बच्ची की शादी 16 साल की उम्र में ज़बरन कर दी गई थी. उस वक़्त इनका वैवाहिक जीवन शुरू नहीं हुआ था. लेकिन अब इन पर दबाव डाला जा रहा है कि वह अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में वापसी करें.”
इस 28 वर्षीय महिला ने कोर्ट से आग्रह किया है कि उनके बाल विवाह को ख़ारिज कर दिया जाए. लेकिन बाल विवाह क़ानून के मुताबिक़, अब ये विवाह ख़ारिज नहीं हो सकता है.
तनवीर अहमद इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, “बाल विवाह क़ानून एक केंद्रीय क़ानून है. लेकिन इसे शेड्यूल सी में शामिल किया जा सकता है. इस वजह से राज्य इस क़ानून में संशोधन कर सकते हैं.
लेकिन इस क़ानून की दुविधा ये है कि एक तरह से ये एक तटस्थ क़ानून है जो कि समाज के हर तबके और धर्म पर लागू होता है. ये क़ानून बाल विवाह को एक आपराधिक कृत्य की श्रेणी में लेकर आता है. लेकिन इसी क़ानून की एक बात इसे मज़ाक का विषय बना देती है.

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क्योंकि यही क़ानून एक तरह से बाल विवाह को स्वीकार्यता भी देता है, जब वह ये ऐलान करता है कि बाल विवाह से बचा जा सकता था. इस क़ानून के तहत बाल विवाह करने वाले महिला-पुरुष में से किसी एक को अपनी शादी ख़ारिज कराने के लिए 18 साल की उम्र पार करने की तिथि से दो वर्ष के भीतर ज़िला न्यायालय में अर्जी देनी होती है.”
तनवीर अहमद मानते हैं कि जब सरकार बाल विवाह को अनैतिक और आपराधिक कृत्य मानती है तो ऐसी शादियों को ख़ारिज करने की ज़िम्मेदारी 18 साल के बच्चों पर क्यों डालती है.
वह कहते हैं, “जब आपने एक क़ानून के तहत बाल विवाह को एक आपराधिक कृत्य करार दिया है और ये इस आधार पर किया गया है कि बाल विवाह अनैतिक है, ग़ैरक़ानूनी है और एक बच्चे के मूल अधिकार का उल्लंघन है. लेकिन इसी क़ानून में आप बाल विवाह की वैधता स्वीकार करते हैं. आप बाल विवाह से होकर गुजरने वाले बच्चे पर ज़िम्मेदारी डालते हैं कि 18 साल की उम्र पार करते ही कोर्ट जाए, वाद प्रस्तुत करें कि उसकी शादी अवैध ठहराई जाए. इसके बाद वह एक लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़े जबकि उस समय उसे अपना करियर बनाने की ओर ध्यान देना था.”
वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद और उनकी क्लाइंट ने दिल्ली सरकार से अपने क़ानून में संशोधन करने की माँग की है. लेकिन सवाल ये है कि ये माँग उठने की वजह क्या है?
क्या क़ानून में कमजोरी है?
सरल शब्दों में कहें तो अगर दो लोगों की शादी कम उम्र में होती है तो शादी अस्वीकार करने वाले शख़्स को 20 साल की आयु सीमा पार करने से पहले कोर्ट जाकर अपनी शादी ख़ारिज करने के लिए आवेदन देना होगा.
ये एक ऐसी शर्त है जो कि बाल विवाह को अवैध ठहराए जाने की प्रक्रिया को बेहद कठिन बना देता है.
क्योंकि भारत के जिन हिस्सों में बाल विवाह काफ़ी प्रचलित है, वहां 18 साल की उम्र पार करने के बाद भी युवाओं के लिए अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर अपनी शादी तोड़ने के लिए कोर्ट जाना काफ़ी मुश्किल होता है.
यही नहीं, ऐसे में मामलों में दूसरे पक्ष की ओर से शादी को बनाए रखने के लिए केस लड़ा जाता है जिससे ये प्रक्रिया और भी ज़्यादा दुष्कर हो जाती है.

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बाल विवाह के रोकथाम में वर्षों से काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती इस शर्त को बाल विवाह क़ानून की बड़ी खामी मानती हैं.
भारती कहती हैं, “बाल विवाह को क़ानूनी रूप से अवैध करार दिए जाने की माँग उठाना जायज है. अगर ये माँग स्वीकार हो जाती है तो शोषित पक्ष को कोर्ट-कचहरी के चक्कर नहीं काटने होंगे. उनकी शादी स्वत: घर बैठे ही अवैध हो जाएगी.
लेकिन अगर इसके सामाजिक पहलू की बात करें तो भले ही आपकी शादी अवैध क़ानूनी रूप से अवैध हो. लेकिन समाज में ये सिद्ध करने के लिए आपके पास एक क़ानूनी दस्तावेज होना चाहिए.
वो कहती हैं कि क्योंकि मान लीजिए क़ानूनन आपकी शादी अवैध भी रहती है. आप ये मानते रहें कि आपकी शादी अवैध है. लेकिन आपके घरवाले नहीं मानेंगे, आपके रिश्तेदार नहीं मानेंगे. आपका समाज ये बात स्वीकार नहीं करेगा और आपको पुलिस से सुरक्षा नहीं मिलेगी.
वो कहती हैं, ''ऐसे में मैं ये महसूस करती हूं कि शादी ख़ारिज करने की प्रक्रिया सहज और सरल होनी चाहिए. ये प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जैसी प्रक्रिया आधार कार्ड बनवाने की होती है जिसमें आप अपनी जानकारी देते हैं और फिर आधार कार्ड आपके घर आ जाता है.''

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कृति भारती के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट जाने वाली लड़की ने ये सही कहा कि कोर्ट जाना बेहद कठिन होता है और कोर्ट आने के बाद का दबाव बहुत बड़ा होता है. परिवार से लेकर रिश्तेदारों का दबाव रहता है.
वो कहती हैं कि हमारे पास जो लड़कियां आती हैं, अपनी शादी अवैध करार दिए जाने के लिए. वे बेहद छोटी होती हैं. उनके लिए इन सभी चीजों को सहन करना बहुत मुश्किल होता है. इनके लिए सबका विरोध सहना बहुत कठिन होता है. क्योंकि आप ये कदम सभी अपनों के ख़िलाफ़ जाकर उठाते हैं.
ऐसे में ये एक समस्या तो है लेकिन समाधान को लेकर गहन विचार करने की ज़रूरत है. क्योंकि आपके पास एक डॉक्यूमेंट की ज़रूरत होगी जो कि आपको एक क़ानूनी आधार दे सके.”
लेकिन ये पहला मामला नहीं है जब क़ानूनन बाल विवाह को अवैध करार दिए जाने की माँग उठी हो. सुप्रीम कोर्ट भारत के सभी राज्यों से अपील कर चुका है कि इस मामले में कर्नाटक मॉडल को अपनाया जाए.
कर्नाटक मॉडल क्यों लागू नहीं होता?

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कर्नाटक सरकार ने साल 2017 में एक क़ानून पास किया था जिसके तहत कर्नाटक में होने वाले बाल विवाह शुरूआत से ही अवैध करार दिए गए.
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता मानते हैं कि ये एक क़ानूनी समस्या होने के साथ-साथ सामाजिक समस्या भी है.
वे कहते हैं, “साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन लोकुर ने सभी राज्यों से ये अपील की थी कि वे बाल विवाह के मामले में कर्नाटक मॉडल को अपनाएं. कर्नाटक मॉडल के तहत, राज्य सरकारें अपने क़ानून में बदलाव करके बाल विवाह को अवैध करार देने की व्यवस्था ख़त्म करके, शुरुआत से ही अवैध करार दे सकती हैं.”
विराग गुप्ता मानते हैं कि ये एक बड़ी समस्या का अंग है जिसके निदान के लिए समाज से लेकर क़ानून के स्तर पर कई बदलावों की ज़रूरत है.
भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में साल 2030 तक बाल विवाह को ख़त्म करने की चुनौती स्वीकार की है. लेकिन भारत सरकार पर अपने इस लक्ष्य के प्रति उदासीन होने के आरोप लगते रहे हैं.
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