स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव की माँग क्यों उठी?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सलमा (बदला हुआ नाम) और राजेश (बदला हुआ नाम) एक दूसरे से साल 2011 में मिले. धारे-धीरे नज़दीकियाँ बढ़ीं और फिर उन्होंने शादी करने का फ़ैसला किया. लेकिन इस शादी में उनका अलग-अलग धर्म का होना एक अड़चन था.
साल 2018 में सलमा और राजेश ने जब परिवार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, तो दोनों के ही परिवारवालों ने इस रिश्ते को नामंज़ूर कर दिया और दोनों के ही परिवारों ने उनके लिए जीवन साथी की तलाश शुरू कर दी.
इन दोनों की तरफ़ से हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि लॉकडाउन में चीज़े और ख़राब हो गईं, जब सलमा के परिवारवालों ने उनके लिए लड़के का चुनाव कर लिया और उन्होंने सलमा से कहा कि वो उनकी शादी राजेश से नहीं होने देंगे.
इतना ही नहीं उसे ज़िन्दगी भर घर में बिठाकर रखने की भी बात कही. लेकिन सलमा तैयार नहीं थीं.
याचिका के अनुसार, लड़की की स्थिति ख़राब हो चली थी और उसके लिए अपने माता-पिता के साथ रहना भावनात्मक तौर पर मुश्किल हो रहा था.
सलमा ने अपने इलाक़े के पुलिस उपायुक्त के सामने बयान दर्ज कराया कि वो अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहतीं.
पुलिस ने उन्हें सुरक्षा का आश्वासन दिया और एक ग़ैर-सरकारी संस्था 'धनक ऑफ़ ह्यूमैनेटी' की तरफ़ से उनके रहने की व्यवस्था की गई.

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स्पेशल मैरिज एक्ट भी बना अड़चन
इस हाल में दोनों ने शादी का फ़ैसला तो किया लेकिन वे धर्म बदलना नहीं चाहते थे.
इसके बाद सलमा ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया क्योंकि दोनों ही शादी के लिए धर्म परिवर्तन नहीं करना चाहते थे.
लेकिन उनके लिए दिक़्क़त थी - स्पेशल मैरिज एक्ट का वो प्रावधान जिसमें पब्लिक नोटिस अनिवार्य है.
इसी वजह से उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में स्पेशल मैरीज एक्ट-1954 के सेक्शन 6 और 7 को चुनौती देते हुए याचिका दाख़िल कर दी.
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि इन दोनों सेक्शन के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन कराने की प्रक्रिया से वे प्रभावित और आहत हैं.
उनके अनुसार, दिल्ली में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी से पहले सब-डिवीज़नल मैजिस्ट्रेट के दफ़्तर के बाहर एक पब्लिक नोटिस 30 दिन तक के लिए लगाया जाता है.
अपनी याचिका में उन्होंने कहा है कि रजिस्ट्रेशन में इस तरह की जानकारी देने को रद्द किया जाये क्योंकि ये अवैध, एकपक्षीय और भारतीय संविधान के अनुसार नहीं है.
याचिकाकर्ताओं के वकील उत्कर्ष सिंह का कहना है, ''जब एक ही धर्म के लोग शादी करते हैं तो उनकी शादी एक ही दिन में हो जाती है, लेकिन अगर अलग-अलग धर्म के लोग शादी करते हैं तो उसमें तीस दिन का समय लगता है, ऐसा क्यों?"
वे कहते हैं, "इस एक्ट में काफ़ी दिक़्कते हैं. इसमें आप शादी के लिए एसडीएम को अर्ज़ी देते हैं. इसमें आपको अपनी पूरी जानकारी, नाम, धर्म, उम्र आदि देनी होती है. फिर फार्म-2 है जिसमें आप जो जानकारी देते हैं, उसे एसडीएम के दफ़्तर के बाहर 30 दिन तक लगाया जाता है ताकि ये जाना जा सके कि किसी को कोई आपत्ति तो नहीं है."
उत्कर्ष सिंह के अनुसार, "और अगर किसी को आपत्ति है, तो वो उसे उसे रजिस्टर करवाएं. ऐसे में ये शादी के इच्छुक जोड़ों की निजता का भी उल्लंघन करता है और भेदभावपूर्ण है."

वे कहते हैं, "वहीं दूसरी ओर जो जोड़ा शादी कर रहा होता है वो भावनात्मक, कई बार आर्थिक और परिवार की तरफ़ से संघर्ष कर रहा होता है. ऐसे में वे परिवार ही नहीं, अराजक तत्वों के निशाने पर भी आ जाते हैं. जहाँ उन पर अपने ही धर्म में शादी का दबाव डाला जाता है. लेकिन ये भी देखा गया है कि लड़की चाहे किसी भी समुदाय की हो परेशानी सबसे ज़्यादा उसे ही उठानी पड़ती है. दिल्ली तो चलिए बड़ा शहर है, लेकिन ऐसे राज्यों या इलाक़ों में सोचिए जहाँ ऐसे जोड़ों की ख़बर के फैलने में देर ना लगे वहाँ अराजक तत्व इन जोड़ों को नुक़सान भी पहुँचा सकते हैं."
मौलिक अधिकारों का हनन है क़ानून?
वकील सोनाली कड़वासरा जून का कहना है कि 'भारतीय समाज में हम ऑनर-कीलिंग की घटनाएं देखते रखते हैं. 'लव जिहाद' की बात भी रह रह कर उठती रहती है, ऐसे में 30 दिन का इंतज़ार ऐसे जोड़ों के लिए ज़िन्दगी का ख़तरा बन सकता है, साथ ही ये एक्ट संविधान के मौलिक अधिकारों का भी हनन करता है.'

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उनके अनुसार, ''स्पेशल मैरिज एक्ट-1954 काफ़ी पुराना है. और इसके 30 दिन के नोटिस पीरियड को दो दृष्टि से देखा जाना चाहिए. पहला यह कि ये संविधान के अनुच्छेद-14 समानता के अधिकार और अनुच्छेद-21 जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करता है. दूसरा साल 1954 के मुक़ाबले अब संचार की नई तकनीक जैसे फ़ोन, मोबाइल और मेल की सुविधा उपलब्ध है जहाँ आप कुछ सेकेंड में संदेश दे सकते हैं तो 30 दिन का नोटिस पीरियड काफ़ी लंबा हो जाता है."
"अगर आप आज के माहौल को देखें तो चीज़ें बहुत तेज़ी से वायरल हो जाती हैं, कोई भी समूह या असामाजिक तत्व इसे मुद्दा बना सकते हैं और ऐसे में इन जोड़ों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं. मेरे अनुसार ये 30 दिन का नोटिस पीरियड का समय ग़ैर-वाजिब है और इसके बिना भी काम चल सकता है.''
धनक ऑफ़ ह्यूमैनेटी - एक ग़ैर-सरकारी संस्था है. इस संस्था के आसिफ़ इक़बाल का कहना है कि 'उनके पास साल भर में क़रीब 1,000 मामले आते हैं जिसमें 54 फ़ीसद मामले इंटर फ़ेथ या अलग-अलग धर्म को मानने वाले जोड़ों के होते हैं और बाक़ी के मामले अंतर-जातीय होते हैं.'
30 दिन का नोटिस पीरियड डर की असल वजह
वे कहते हैं कि उनके पास ऐसे जोड़े शादी करने के मक़सद से आते हैं. उन्हें डर रहता है कि अगर वे शादी करते हैं तो कोई उन्हें क़ानूनी लड़ाई में ना फंसा दे या धार्मिक रंग देने की कोशिश न करे. या दोनों ही परिवारों को तंग ना किया जाये. साथ ही ये अभिभावकों को मनाने के लिए भी मदद की माँग लेकर आते हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में परिवार वाले नहीं मानते. ऐसे में हमारी संस्था उन्हें आर्थिक सहायता, रहने के लिए जगह, पुलिस और कोर्ट की मदद से सुरक्षा मुहैया भी कराती है. लेकिन ऐसे जोड़ों को भावनात्मक सपोर्ट ज़्यादा चाहिए होता है.
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वो बताते हैं, ''अगर इन जोड़ों में कोई उच्च जाति या प्रभावशाली परिवार की हिंदू लड़की आती है तो ज़्यादा डर रहता है कि कहीं परिवार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर एफ़आईआर ना दर्ज करा दे. तो ऐसे में हम मदद करने वालों और लड़की, दोनों के लिए ख़तरा बन जाता है.''
आसिफ़ इक़बाल के अनुसार, सलमा और राजेश तो शादी कर चुके हैं लेकिन स्पेशल मैरिज एक्ट में जो 30 दिन का नोटिस पीरियड होता है, उसकी वजह से कम जोड़े ऐसी शादी के लिए आगे आते हैं, क्योंकि कहीं ना कहीं एक डर होता है कि इस अवधि में उनके साथ कुछ ग़लत ना हो जाये.
वहीं इस मामले में हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस दिया है और 27 नवंबर तक जवाब माँगा है.
लेकिन ये एक क़ानूनी लड़ाई का मामला नहीं है, बल्कि समस्या सामाजिक भी है, क्योंकि क़ानून में बदलाव हो भी जाये लेकिन जब तक समाज इसे केवल दो लोगों के बीच शादी नहीं देखेगा, तब तक ये दिक़्क़त बनी ही रहेगी.
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