कोरोना वैक्सीन: भारत में बने टीके को जल्दीबाज़ी में मंज़ूरी क्यों?

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- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस की वैक्सीन जिसे करोड़ों लोगों को दिया जाना है, उसके आपातकालीन इस्तेमाल की मंज़ूरी क्लिनिकल ट्रायल मोड में कैसे दी जा सकती है?
भारत के जानेमाने वैक्सीन एक्सपर्ट गगनदीप कांग, इसके जवाब में कहते हैं, "नो आइडिया"
"या को आप क्लिनिकल ट्रायल करते हैं या फिर नहीं करते हैं."
क्लिनिकल ट्रायल तीन चरणों का प्रोसेस है. इससे ये समझने में मदद मिलती है कि वैक्सीन की प्रतिरोधक क्षमता कैसी है और क्या इसके कोई साइड-इफ़ेक्ट भी हैं.
रविवार को भारत के ड्रग रेग्यूलेटर ने स्वदेशी वैक्सीन कोवैक्सीन को आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंज़ूरी दे दी, वो भी बिना तीसरे चरण के ट्रायल के.
भारत सरकार के समर्थन से तैयार की गई इस वैक्सीन को भारत बायोटेक नाम की कंपनी ने बनाया है.
प्रतिबंधित इस्तेमाल की मंज़ूरी
ये कंपनी पिछले 24 सालों से वैक्सीन बना रही है, अब तक इसने 16 वैक्सीन बनाए हैं और 123 देशों में इन्हें एक्सपोर्ट किया है.
रेग्यूलेटर के मुताबिक वैक्सीन को "क्लिनिकल ट्रायल मोड में जनहित को ध्यान में रखते हुए आपात स्थिति में प्रतिबंधित इस्तेमाल की मंज़ूरी दी गई है."
ऐसा तब किया गया है जब वैक्सीन हज़ारों लोगों दी जा रही है और इसके असर और सुरक्षा को लेकर अभी भी जांच चल रही है.
रेग्यूलेटर ने ऑक्सफोर्ड-एस्ट्रज़ेनेका की वैक्सीन को भी अप्रूवल दिया है.
रेग्यूलेटर ने आश्वासन दिया है कि टीका "सुरक्षित है और एक मज़बूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रदान करता है", लेकिन अधिकांश वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं."
ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क, जो कि एक वॉचडॉग है, उनके मुताबिक "एक अधूरे अध्ययन वाले टीके को मंजूरी देने के पीछे का वैज्ञानिक तर्क" समझ से बाहर है.

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बायोटेक ने वैक्सीन को सुरक्षित बताया
भारत बायोटेक का कहना है कि उसके पास कोवैक्सीन के 2 करोड़ टीके तैयार हैं, और साल के अंत तक दो शहरों में इनकी चार फैसिलिटी में 70 करोड़ टीके बनाने का लक्ष्य है.
फर्म के अध्यक्ष डॉ. कृष्णा एला कहते हैं, "हमारा टीका 200% सुरक्षित है"
डॉ. एला ने कहा कि बंदरों और हैम्स्टर्स पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि कोवैक्सिन कोरोना संक्रमण के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है.
उन्होंने कहा कि 26,000 में से लगभग 24,000 वॉलंटियर्स तीसरे चरण के परीक्षण में भाग ले चुके हैं, और फरवरी तक वैक्सीन की एफिकेसी यानी वैक्सीन कितनी प्रभावी है, उसका डेटा उपलब्ध होगा.
वैज्ञानिक संदेह में हैं. देश के प्रमुख वायरोलॉजिस्ट शाहिद जमील ने बीबीसी को बताया, "चूंकि परीक्षण के तीसरे चरण का कोई डेटा नहीं है, हम नहीं जानते कि यह टीका कितना प्रभावी होगा."

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क्या लोगों को ट्रायल के तहत वैक्सीन दी जाएगी?
"दो चरणों के परिणाम से हमें ये पता है कि टीका सुरक्षित है, क्या होगा यदि हम बिना एफेकेसी जाने टीका लगाने लगें और बाद में पता चले कि ये केवल 50% प्रभावी हैं? फिर क्या ये जिन्हें दिया जाएगा, उनके लिए उचित होगा."
यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि रेग्यूलेटर के यह कहने का क्या मतलब है कि वैक्सीन को "क्लिनिकल ट्रायल मोड" में दिया जाएगा. आमतौर पर किसी परीक्षण में, वॉलंटियर्स को यह नहीं बताया जाता है कि उन्हें वैक्सीन दी जा रही है या प्लेसबो. कई लोगों को स्वास्थ्य कारणों से भाग लेने से नहीं दिया जाता.
डॉ. एला का कहना है कि वैक्सीन दिए जाने के बाद उनकी फर्म उन लोगों को मॉनीटर करती रहेगी. लेकिन अगर ऐसा हुआ, तो इससे वैक्सीन देने की प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी.
तो क्या रेग्यूलेकर ये कहना चाह रहे थे कि कोक्सैक्सिन को "क्लिनिकल ट्रायल के चौथे चरण" में दिया जाएगा और ये पहले से चल रही स्टडी का हिस्सा होगा?
डॉ एला ने कहा, "हमें पूरी बात समझने के लिए कुछ समय दें. हम नहीं जानते कि क्या इसे एक परीक्षण के रूप में माना जाएगा."
लेकिन बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.

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वैक्सीन को लेकर भ्रम की स्थिति
कोविड टास्क फ़ोर्स के एक वरिष्ठ सदस्य ने ये कह कर और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी कि कोवैक्सिन को एक बैकअप वैक्सीन की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, किसी आपातकाल परिस्थिति से निपटने के लिए ,जब केस बहुत तेज़ी से बढ़ने लगेंगे.
लेकिन कुछ जानकार इससे हैरान हैं.
महामारी पर शोध करने वाले एक वरिष्ठ शोधकर्ता ने कहा, "क्या इसका मतलब ये है कि किसी आपातकाल परिस्थिति में कुछ लोगों को वैसी वैक्सीन दी जाएगी, तो कितनी प्रभावी है, ये हमें पता ही नहीं."
हालांकि, क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ प्रो पॉल ग्रिफिन का कहना है कि वैक्सीन को ऐसे आपातकालीन परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जाना नया नहीं है. आमतौर पर ऐसा तब होता है जब पहले से चल रहे परीक्षण के डेटा से पता चलता है कि वैक्सीन "सुरक्षित और प्रभावकारी है."
भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले 1 करोड़ की संख्या को पार कर चुके हैं, अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ा है. सरकार की कोशिश है कि जुलाई तक 30 करोड़ का टीकाकरण किया जाए.
लेकिन टीके प्रकिया तब शुरू हो रही है, जब नए मामलों की संख्या में कमी आई है. वैक्सीन बनाने के लिए बायोटेक एक जानामाना नाम है जिसने 20 देशों में 7 लाख से अधिक लोगों पर परीक्षण किया है.
तो फिर सरकार ने अप्रूवल देने में इतनी जल्दीबाज़ी क्यों की? क्या कुछ हफ़्तों तक वैक्सीन के प्रभाव का डेटा आने का इंतज़ार नहीं किया जा सकता था?
विपक्ष ने की आलोचना
कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने सरकार के इस कदम की आलोचना की. उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार "काम से ज़्यादा नारों को ऊपर रखती है." इस मामले में वो "वैक्सीन राष्ट्रवाद के नाम पर सीना ठोकना चाहते हैं."
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर दिखने के लिए उन्होंने कॉमन सेंस और सालों से चले आ रहे प्रोटोकॉल को नज़रअंदाज़ किया.
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भारत वैक्सीन बनाने का पावर हाउस है. दुनियाभर के 60 प्रतिशत वैक्सीन का उत्पादन यहां होता है. दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन प्रोग्राम भारत में चलता है जिसके तहत 5.5 करोड़ मिहिलाओं और नवजात को 39 करोड़ वैक्सीन दिए जाते हैं.
कोवैक्सीन के कारण पैदा हुए भ्रम से भारत बहुत कुछ सीख सकता है.
वायरस जिस तरह से बदल रहा है, मुमकिन है कि भविष्य में हमें एक से अधिक वैक्सीन की ज़रूरत पड़े.
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, "सभी टीकों को एफिकेसी और सुरक्षा के पर्याप्त सबूतों के आधार पर स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए. टेस्ट और खु़राक को लेकर भी स्पष्टता होनी चाहिए"
उन्होंने कहा, "यविज्ञान और सभी के विश्वास के लिए वैक्सीन से संबंधित सभी चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित किया जाता है."
"हम इस लड़ाई को नहीं जीत सकते हैं यदि हम उन हथियारों पर संदेह करते हैं जो हमें सौंपे जा रहे हैं."
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