छत्तीसगढ़: सौ से अधिक गांवों के आदिवासी सड़कों पर डटे, क्या चाहते हैं वो?

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित कांकेर ज़िले में सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ़ के दो कैंप को हटाने की माँग को लेकर आदिवासियों का विरोध प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है. पखांजूर में सौ से अधिक गांवों के आदिवासी पिछले छह दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं.
सर्व आदिवासी समाज के इस आंदोलन के समर्थन में 56 से अधिक ज़िला पंचायत और जनपद पंचायत के सदस्यों और सरपंचों ने अपने-अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है. इन पंचायत प्रतिनिधियों का दावा है कि अगर सरकार ने इन कैंपों को नहीं हटाया तो ज़िले के सभी सरपंच अपने पदों से इस्तीफ़ा दे देंगे.
प्रदर्शन में शामिल आदिवासियों का आरोप है कि कांकेर ज़िले के करकाघाट और तुमीरघाट में उनके देव स्थल को तोड़ कर सीमा सुरक्षा बल का कैंप स्थापित किया गया है. आदिवासियों ने साफ़ चेतावनी दी है कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था पर होने वाले किसी भी प्रहार का वो पूरी ताक़त से विरोध करेंगे.

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हालांकि सरकारी अधिकारियों का कहना है कि माओवादियों के दबाव में आकर आदिवासी प्रदर्शन कर रहे हैं.
ज़िले के पुलिस अधीक्षक एमआर अहिरे ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "माओवादियों के प्रेशर की वजह से लोग विरोध के लिए आए हैं. न केवल कांकेर बल्कि अभी तो पूरे बस्तर में यही स्थिति चल रही है. फ़ोर्स को तो सड़क, पुल-पुलिया निर्माण और विकास कार्यों के लिए वहां पर लगाया गया है."
सुरक्षाबलों के कैंप
माओवाद प्रभावित बस्तर में सीआरपीएफ़, बीएसएफ़, सीएफ़ और आईटीबीपी जैसे सुरक्षाबलों के लगभग 70 हज़ार जवान तैनात हैं. इन जवानों के रहने के लिए अलग-अलग इलाक़ों में बड़ी संख्या में विशाल कैंप बनाए गये हैं और पिछले कुछ सालों में लगातार इन कैंपों का विस्तार होता गया है.
बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी के अनुसार, इस साल बस्तर में 16 नये पुलिस बेस कैंप खोले गये हैं. ये कैंप ऐसी जगहों में हैं, जो माओवाद प्रभावित हैं. सुंदरराज पी का दावा है कि इन कैंपों के खुलने से आदिवासियों पर माओवादियों का दबाव कम हुआ है.
लेकिन आदिवासियों का आरोप है कि इन कैंपों के खुलने से आदिवासियों की रक्षा तो नहीं हो पाती, उलटे माओवादियों के नाम पर गांवों में रहने वाले आदिवासियों को प्रताड़ित किया जाता है.

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यही कारण है कि आदिवासी इन कैंपों का विरोध करते रहे हैं.
सुरक्षाबलों के इन कैंपों को हटाने की माँग करते हुए पिछले साल दंतेवाड़ा के पोटाली में आदिवासियों ने कई दिनों तक प्रदर्शन किया था.
धार्मिक आस्था
इसी साल बीजापुर के गंगालूर में भी आदिवासियों ने कैंप का भारी विरोध किया था. सितंबर में दंतेवाड़ा के गुमियापाल अलनार में हज़ारों आदिवासियों ने सुरक्षाबलों के कैंपों का विरोध करते हुए प्रदर्शन किया था.
लेकिन ताज़ा घटनाक्रम में करकाघाट और तुमीरघाट की जिन कैंपों का आदिवासी विरोध कर रहे हैं, उनके बारे में आदिवासियों का कहना है कि आदिवासियों के धार्मिक स्थलों को तोड़ कर इन कैंपों को बनाया गया है.

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आदिवासी नेता लच्छू गावड़े कहते हैं-"करकाघाट और तुमीरघाट में जहां कैंप खोला गया है, वहां कई पीढ़ियों से आदिवासी पूजा करते रहे हैं. वह हमारा देवी स्थल रहा है. वहां आसपास में जो माझी-मुखिया का मठ होता था, उसे भी तोड़ दिया गया है. किसी का मंदिर या मस्ज़िद; उसे तोड़ दें तो क्या होता? हम आदिवासी प्रकृति पूजक हैं. हमारे देव स्थल को तोड़ा गया है, इसलिए आदिवासी कैंप का विरोध कर रहे हैं."
आदिवासियों ने पहले तो कुछ दिनों तक इन कैंपों के सामने ही विरोध प्रदर्शन किया और जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो अपना राशन-पानी ले कर वे पखांजूर इलाके में पहुंच गये.
पिछले छह दिनों से सौ से अधिक गांवों के सैकड़ों आदिवासी स्त्री-पुरुष सड़कों पर डटे हुए हैं.
पेसा क़ानून
आदिवासी बहुल बस्तर का पूरा इलाका संविधान की पांचवी अनुसूची का क्षेत्र है.
इस इलाके में वर्ष 1996 में बनाया गया पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी 'पेसा' क़ानून लागू होता है, जहां ग्राम सभा की अनुमति के बिना किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता.
यही कारण है कि जब आदिवासियों की मांग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो शनिवार को एक ज़िला पंचायत सदस्य, 7 जनपद सदस्यों और 46 सरपंचों ने अपने-अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया.

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गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और ज़िला पंचायत के सदस्य हेमलाल मरकाम का कहना है कि जिन नये कैंपों का निर्माण किया गया है, उस इलाके की पंचायती व्यवस्था से जुड़े लोगों या मांझी, मुखिया, गायता, पटेल जैसे पारंपरिक प्रतिनिधियों को इन कैंपों को खोलने से पहले कोई जानकारी तक नहीं दी गई.
हेमलाल मरकाम कहते हैं-"यहां मूल मुद्दा हमारे संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है. संविधान कहता है कि पांचवीं और छठवीं अनुसूची का क्षेत्र वर्जित और आंशिक वर्जित क्षेत्र है. अनुच्छेद 13-3 क, हमारी रुढ़ी प्रथा को सुरक्षित करने का अधिकार देता है. क्या इसका पालन हो रहा है? पता चलेगा कि इन अधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन हो रहा है. हमारे पूजा स्थलों को निशाना बनाया जा रहा है."
लेकिन ज़िले के पुलिस अधीक्षक एमआर अहिरे का कहना है कि जिन इलाकों में कैंप खोले जा रहे हैं, उससे आदिवासी ख़ुश है क्योंकि इससे उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी. उनका दावा है कि आदिवासियों के पूजा स्थल को कहीं भी छेड़ा नहीं गया है.
दूसरी ओर राज्य में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि आदिवासी समाज की धार्मिक भावनाओं को अगर किसी कारण से ठेस पहुंची है या सरकार और आदिवासियों के बीच किसी तरह की संवादहीनता की स्थिति बनी है तो उसे दिखवाया जायेगा. उनका कहना है कि अफसरों को निर्देश दिया गया है कि आदिवासी समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए.
हालांकि प्रदर्शनकारियों और अफसरों के बीच दो-तीन दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन आदिवासी कैंप हटाये जाने से कम, कुछ भी नहीं चाहते. दूसरी ओर पंचायत प्रतिनिधियों के इस्तीफ़े ने प्रदर्शन को और मज़बूती दे दी है. प्रदर्शन स्थल पर दूसरे ज़िलों और राज्यों से भी आदिवासियों के आने का सिलसिला शुरु हो गया है. ऐसे में माना जा रहा है कि आदिवासियों का यह विरोध प्रदर्शन आने वाले दिनों में और गहरायेगा.
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