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पश्चिम बंगाल: शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा की सदस्यता से दिया इस्तीफ़ा
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी और हाल तक उनका दाहिना हाथ समझे जाने वाले पूर्व मेदिनीपुर ज़िले के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी के आपसी संबंध अब उस मुकाम तक पहुंच गए हैं जिसे 'प्वॉयंट ऑफ़ नो रिटर्न' कहा जाता है.
बुधवार तक तो शुभेंदु को मनाने की कवायद जारी थी और उनके कम से कम विधायक के तौर पर पार्टी में बने रहने के कयास लगाए जा रहे थे. लेकिन बुधवार शाम शुभेंदु ने विधानसभा की सदस्यता से अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया.
अब देखना यह है कि वह तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा कब देते हैं.
शुभेंदु शाम को जब विधानसभा भवन पहुंचे तो अध्यक्ष विमान बनर्जी वहां नहीं थे. इसलिए उन्होंने विधानसभा के सचिव को अपना इस्तीफा सौंपा. शुभेंदु ने ई-मेल से विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है.
दूसरी ओर, विधानसभा अध्यक्ष विमान बनर्जी ने पत्रकारों को बताया, "फिलहाल शुभेंदु का इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं होगा. नियमों के मुताबिक़ उनको खुद अध्यक्ष को इस्तीफ़ा सौंपना होगा. सचिव को इस्तीफ़ा स्वीकार करने का अधिकार नहीं है. तमाम कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद ही इस मुद्दे पर फ़ैसला किया जाएगा."
शुभेंदु के करीबी सूत्रों ने बताया कि वे गुरुवार को दिल्ली जा सकते हैं. वहां से वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ शनिवार को कोलकाता लौंटेंगे.
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी या पार्टी के किसी दूसरे नेता ने शुभेंदु के इस्तीफे पर फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की है.
ममता और शुभेंदु के बीच कैसे बिगड़े रिश्ते?
मंगलवार को शुभेंदु और ममता बनर्जी की अलग-अलग रैलियों और उनमें किसी का नाम लिए बिना एक-दूसरे पर किए गए हमलों के बाद अब उनका बीजेपी में शामिल होना लगभग तय माना जा रहा है.
इसके साथ ही अब यह अटकलें भी जोर पकड़ रही हैं कि इस सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के समय शनिवार को मेदिनीपुर में ही शुभेंदु औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम सकते हैं.
शाह के मेदिनीपुर दौरे के कार्यक्रम में बदलाव से भी इसका संकेत मिलता है.
पहले शाह को वहां कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करना था. लेकिन अब वे एक रैली को संबोधित करेंगे.
इन कयासों को उस समय और बल मिला जब बीजेपी के बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने मंगलवार को ही शुभेंदु को फ़ोन पर जन्मदिन की बधाई दी.
शुभेंदु ने पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी शहर में अपना जो निजी दफ्तर खोला है उसे भगवा रंग में रंगा गया है. इस पर 'शुभेंदु बाबू का सहायता केंद्र' का बोर्ड लगाया गया है.
साथ ही उनको केंद्र की ओर से ज़ेड प्लस सुरक्षा दिए जाने की भी चर्चा है.
मंगलवार की रैली में इस बागी नेता ने बीजेपी के सुर में सुर मिलाते हुए खुद को पहले भारतीय और फिर बंगाली बताया.
बंगाल की राजनीति में शुभेंदु इतने अहम क्यों?
तृणमूल कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व क्यों आखिर तक उनको मनाने के लिए हाथ-पैर मारता रहा और बीजेपी की निगाहें क्यों इस कद्दावर नेता पर टिकी हैं?
इन तमाम सवालों का जवाब तलाशने के लिए कम से कम पंद्रह साल पीछे जाना होगा.
शुभेंदु ने वर्ष 2006 के विधानसभा में पहली बार कांथी दक्षिण सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था.
उसके बाद वर्ष 2009 में उन्होंने तमलुक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. साल 2014 के चुनावों में भी उन्होंने अपनी सीट पर कब्जा बनाए रखा.
उसके बाद वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने नंदीग्राम सीट से चुनाव जीता और ममता मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बनाए गए.
अधिकारी परिवार का राजनीतिक रसूख
धीरे-धीरे उनको सरकार में नंबर दो माना जाने लगा था. मेदिनीपुर इलाक़े में अधिकारी परिवार का काफी राजनीतिक रसूख है.
शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी वर्ष 1982 में कांथी दक्षिण विधानसभा सीट से कांग्रेस से विधायक बने थे.
वे बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. वे फिलहाल कांथी लोकसभा सीट से सांसद हैं.
शिशिर अधिकारी यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रहे थे.
शुभेंदु के भाई दिब्येंदु भी जिले की तमलुक लोकसभा सीट से सांसद हैं. शुभेंदु के एक अन्य भाई सौम्येंदु कांथी नगरपालिका के अध्यक्ष हैं.
नंदीग्राम आंदोलन के वास्तुकार
पूर्व मेदिनीपुर जिले के 16 सीटों के अलावा पश्चिम मेदिनीपुर (18), बांकुड़ा (12), पुरुलिया (9), मुर्शिदाबाद (22) और मालदा (12) जिलों की ज्यादातर सीटों पर भी अधिकारी परिवार का असर है.
मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में पार्टी के पर्यवेक्षक के तौर पर शुभेंदु ने वहां कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को तृणमूल में शामिल कर कई नगरपालिकाओं को जीतने में अहम भूमिका निभाई थी.
इसी वजह से बीजेपी उनको हर हालत में अपने पाले में करना चाहती है.
तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में जिस नंदीग्राम आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी उसके मुख्य वास्तुकार शुभेंदु ही थे.
वर्ष 2007 में कांथी दक्षिण सीट से विधायक होने के नाते तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के ख़िलाफ़ 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमिटी' के बैनर तले स्थानीय लोगों को एकजुट करने में उनकी सबसे अहम भूमिका थी.
तृणमूल कांग्रेस का मज़बूत आधार
उस समय नंदीग्राम में प्रस्तावित केमिकल हब के लिए जमीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी.
उस दौर में इलाके में सीपीएम नेता लक्ष्मण सेठ की तूती बोलती थी.
लेकिन यह शुभेंदु ही थे जिनकी वजह से इलाके के सबसे ताकतवर नेता रहे सेठ को पराजय का मुंह देखना पड़ा था.
उसके बाद जंगलमहल के नाम से कुख्यात रहे पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा जिलों में तृणमूल कांग्रेस का मज़बूत आधार बनाने में भी शुभेंदु का ही हाथ था.
शुभेंदु बीते तीन-चार महीनों से न तो केबिनेट की किसी बैठक में हिस्सा ले रहे थे और न ही अपने जिले में तृणमूल की ओर से आयोजित किसी कार्यक्रम में.
इसके उलट वे 'दादार अनुगामी' यानी 'दादा के समर्थक' नामक एक संगठन के बैनर तले लगातार रैलियाँ और सभाएं कर रहे थे.
'अधिकारी बंधुओं की नाराज़गी'
लेकिन आख़िर कभी दीदी यानी ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में शुमार शुभेंदु के साथ ऐसा क्या हुआ कि अचानक उनके सुर बदल गए?
इसके लिए कम से कम छह महीने पीछे के घटनाक्रम को देखना होगा.
तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "दरअसल अधिकारी बीते कुछ महीनों से पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज चल रहे थे. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह पर चल रहा है. ख़ासकर पूर्व मेदिनीपुर ज़िले के मामलों में अधिकारी से राय लेने की जरूरत नहीं समझी गई. इसके साथ ही ममता जिस तरह अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी के तौर पर पेश कर रही हैं, उससे भी अधिकारी बंधुओं में भारी नाराज़गी है."
परिवहन विभाग के एक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि शुभेंदु के परिवहन मंत्री होने के बावजूद हाल के महीनों में मंत्रालय से संबंधित ज्यादातर फ़ैसले ममता बनर्जी और उनके क़रीबी लोग ही करते रहे हैं.
आगामी विधानसभा चुनाव
शुभेंदु की पहल पर पार्टी में शामिल होने वाले लोगों को उनके मुकाबले ज्यादा तरजीह दी जा रही थी.
शुभेंदु ने हाल में एक जनसभा में किसी का नाम लिए बिना कहा था, "मैं किसी की मदद या पैराशूट के जरिए ऊपर नहीं आया हूं. लेकिन मैं जिन नेताओं को पार्टी में ले आया था आज वही मेरे ख़िलाफ़ साज़िश रच रहे हैं."
शुभेंदु ने करीबियों से बातचीत में इस बात पर एतराज़ जताया था कि ममता बनर्जी पुराने नेताओं को दरकिनार कर अपने भतीजे को मुख्यमंत्री पद के उत्तराधिकारी के तौर पर बढ़ावा दे रही हैं.
उधर, तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि शुभेंदु अगले विधानसभा चुनावों में अपने पचास से ज्यादा उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए दबाव बना रहे थे. लेकिन यह संभव नहीं था.
रैलियों में आरोप-प्रत्यारोप
इस सप्ताह की शुरुआत तक शुभेंदु को लेकर संशय बना हुआ था. तृणमूल नेताओं का दावा था कि शुभेंदु ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा भले दिया है, वह पार्टी में बने रहेंगे.
लेकिन मंगलवार को पूर्व मेदिनीपुर के हल्दिया में शुभेंदु और उसके कुछ देर बाद जलपाईगुड़ी में ममता बनर्जी की रैली के बाद शुभेंदु की वापसी संभावनाएं लगभग खत्म हो गई हैं.
शुभेंदु ने अपनी रैली में किसी का नाम लिए बिना कहा, "किसी पद पर नहीं होने के बावजूद आम लोग मेरे साथ हैं. संविधान में लिखा है 'फॉर द पीपल, बाय द पीपल, ऑफ़ द पीपल'. लेकिन बंगाल में 'फॉर द पार्टी, बाय द पार्टी, और ऑफ़ द पार्टी' के फॉर्मूले पर शासन चल रहा है. इसके साथ ही यहां लोकतंत्र बहाल करना होगा. पार्टी में कुछ लोगों को संगठन से ज्यादा तरजीह दी जा रही है."
शुभेंदु ने कहा कि वो और उनका परिवार "पहले भारतीय है और उसके बाद बंगाली. भारत में किसी भी कोने से बंगाल आने वालों को बाहरी नहीं कहा जा सकता. मुझे किसी पद का लालच नहीं है."
ममता बनर्जी बीजेपी नेताओं को बाहरी कहती रही हैं.
ममता बनर्जी का बयान
उसके कुछ देर बाद ममता अपनी रैली में शुभेंदु का नाम लिए बिना उन पर जमकर बरसीं और उन पर सत्ता सुख भोगने का आरोप लगाया.
ममता ने कहा, "आपने दस साल तक पार्टी और सरकार का खाया. जो लोग चुनाव के दौरान निष्ठाएं बदलते हुए समझौते करते हैं उनको बर्दाश्त नहीं किया जाएगा."
ममता और शुभेंद के बीच लगातार बढ़ती दूरियों के बीच बीजेपी बीते महीने से ही लगातार उन पर डोरे डाल रही थी.
प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष और सांसद सौमित्र खान समेत कई नेता शुभेंदु को भगवा पार्टी में शामिल होने का न्योता दे चुके थे. लेकिन शुभेंदु ने उसके बाद कहा था कि वे अब भी टीएमसी के सिपाही हैं.
बीजेपी नेताओं का कहना है कि शुभेंदु की बगावत तृणमूल कांग्रेस में जारी गुटबाजी का नतीजा है.
प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस में भारी असंतोष है. शुभेंदु के अलावा कई दूसरे नेता भी पार्टी छोड़ने के कगार पर हैं."
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस का घर ताश के पत्तों की तरह ढह रहा है."
शुभेंदु का अगला कदम
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अधिकारी वर्ष 2018 में मुकुल राय के बाद बगावत करने वाले तृणमूल कांग्रेस के दूसरे सबसे ताकतवार नेता हैं. उनकी नाराजगी की सबसे प्रमुख वजह शायद ममता बनर्जी की ओर से उत्तराधिकारी के तौर पर अपने भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी को बढ़ावा देना ही शायद उनकी नाराजगी की सबसे प्रमुख वजह है. उनकी नाराजगी पार्टी के लिए महंगी साबित हो सकती है.
पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "शुभेंदु अगर भगवा खेमे में जाते हैं तो यह मेदिनीपुर और खासकर नंदीग्राम के उन इलाकों में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए भारी झटका होगा जहां से तृणमूल के सत्ता में पहुंचने की राह खुली थी."
फिलहाल तमाम निगाहें अमित शाह के दौरे और शुभेंदु के अगले कदम पर टिकी हैं.
क्या शुभेंदु आखिर तमाम कयासों पर विराम लगाते हुए इसी सप्ताह भगवा खेमे में शामिल हो जाएंगे? लाख टके के इस सवाल का जवाब अमित शाह के दौरे पर मिलने की संभावना है.
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