किसानों के लिए वॉशिंगटन में प्रदर्शन, गाँधी की मूर्ति को नुकसान- प्रेस रिव्यू

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हिंदुस्तान टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक, दिल्ली में डटे किसानों के समर्थन में शनिवार को वॉशिंगटन में भारतीय दूतावास के सामने लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा को प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया.
ख़बर में कहा गया है कि घटनास्थल पर 'खालिस्तान के झंडे' भी नज़र आए. इसी तरह के झंडे दिसंबर की शुरुआत में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान नज़र आए थे.
दोनों ही जगहों पर जुटे प्रदर्शनकारी दिल्ली में प्रदर्शकारी किसानों के समर्थन में नारे लगा रहे थे.
वॉशिंगटन में महात्मा गांधी की इस प्रतिमा को जून में काले-अमरीकी जॉर्ज फ्लायड के समर्थन में हुए प्रदर्शनों के दौरान भी नुकसान पहुंचाया गया था.
भारतीय दूतावास ने तब पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज कराई थी और तत्कालीन उप-विदेशमंत्री स्टीफ़न बीगन को घटना के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी थी.
वॉशिंगटन में भारतीय दूतावास के सामने इस प्रतिमा का अनावरण तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 सिंतबर 2000 में किया था.
भारत में राजधानी दिल्ली की पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से लगती सीमाओँ पर बीते एक पखवाड़े से हज़ारों किसान मोदी सरकार के नए कृष क़ानून का विरोध कर रहे हैं.

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आईफ़ोन बनाने वाले प्लांट में वेतन नहीं मिलने पर तोड़फोड़ और आगज़नी
इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के अनुसार, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के पास आईफ़ोन बनाने वाले एक प्लांट में लंबित वेतन से ग़ुस्साए कर्मचारियों ने शनिवार को तोड़फोड़ और आगज़नी की है.
ख़बर में बताया गया है कि बेंगलुरु से लगभग 60 किलोमीटर दूर बना यह प्लांट ताइवान की कंपनी विस्ट्रॉन कॉर्पोरेशन का है जहां एपल समेत कई कंपनियों के लिए उपकरण बनाए जाते हैं.
कोलार पुलिस अधीक्षक कार्तिक रेड्डी का कहना है, ''कर्मचारी कुछ महीनों से लंबित अपने वेतन की मांग कर रहे थे. शनिवार को उन्होंने ह्यूमन रिसोर्स डिपार्टमेंट के अधिकारियों से मुलाक़ात की. इसके बाद कुछ कर्मचारियों ने ऑफिस पर हमला किया और फ़र्नीचर को नुकसान पहुंचाया.''
नारसापुरा औद्योगिक क्षेत्र में विसट्रॉन कॉर्पोरेशन का प्लांट 43 एकड़ में फैला है जहां तीन हज़ार करोड़ रुपए का निवेश किया गया है. इस प्लांट में लगभग एक हज़ार कर्मचारी काम करते हैं.
कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री डॉक्टर सी अश्वत्थनारायण ने कहा है कि ''क़ानून को कोई हाथ में नहीं ले सकता, हिंसा के बिना भी समाधान हो सकता है, उपद्रवियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और मज़दूरों का बकाया भुगतान किया जाएगा.''

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'लॉकडाउन के छह-सात महीने बाद भी दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं'
द हिंदू में छपी एक ख़बर के मुताबिक, 'राइट टू फूड कैम्पेन' का कहना है कि लॉकडाउन के छह-सात महीने बीत जाने के बाद भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके पास रोज़ी-रोटी का कोई ज़रिया नहीं है, जिन्हें दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं और रात को अक्सर भूखा सोना पड़ता है.
ख़बर में कहा गया है कि 'राइट टू फूड कैम्पेन' ने सितंबर-अक्तूबर में भारत के 11 राज्यों में बदहाली में किसी तरह गुजारा कर रहे 4,000 लोगों का सर्वेक्षण किया.
'राइट टू फूड कैम्पेन' का कहना है कि सर्वे के नतीजों से प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण योजना के तहत नवंबर के बाद मुफ़्त अनाज नहीं देने के सरकार के फ़ैसले पर सवाल उठ रहे हैं.
'राइट टू फूड कैम्पेन' ने अपने इस सर्वेक्षण को 'हंगर वॉच' नाम दिया है, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के हाशिए पर खड़े उन लोगों पर फोकस किया गया जो इस साल मार्च में लॉकडाउन से पहले हर महीने सात हज़ार रूपये से कम कमाते थे.
सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने कहा कि उनकी खाने की थाली से गेहूं, चावल, दाल और सब्ज़ियां ख़त्म होती गईं. जो शाकाहारी नहीं हैं, अंडे और मांस उनकी पहुंच से बाहर हो गए.
सर्वेक्षण में ये बात भी सामने आई है कि लॉकडाउन के दौरान हाशिए पर मौजूद लोगों को दलित और मुसलमान होने की वजह से कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा.
तीन आईपीएस अफसरों पर केंद्र और बंगाल में तनातनी

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टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी ख़बर के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है जिसका ताज़ा उदाहरण वो तीन आईपीएस अफसर हैं जिन्हें बीजेपी अध्यक्ष नड्डा के क़ाफ़िले पर हमले की पृष्ठभूमि में गृह मंत्रालय ने सेंट्रल डेप्युटेशन पर बुलाया है.
ख़बर में कहा गया है कि पार्टी अध्यक्ष नड्डा के क़ाफ़िले पर गुरुवार को कोलकाता के पास पथराव हुआ था. गृह मंत्रालय इस कथित चूक की ज़िम्मेदारी तय कर रहा है.
केंद्र ने इस मामले पर पश्चिम बंगाल सरकार से 15 दिसंबर तक सहमति मांगी है. राज्य सरकार की ओर से इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जा रहा है.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने शनिवार को गृह सचिव को लिखा कि ''आपका इरादा साफ़ नज़र आ रहा है, आप अधिकारियों पर दबाव बनाना चाहते हैं.''
ख़बर में राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से लिखा गया है, वे बंगाल कैडर के आईपीएस अफसर हैं. केंद्र ने एक-तरफ़ा फ़ैसला किया है. बाकी देश की तरह बंगाल भी महामारी से लड़ रहा है. इसलिए राज्य उन्हें फ़ौरन नहीं छोड़ सकता.''
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