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किसान आंदोलन: समय से पहले बातचीत के लिए क्यों तैयार हुई मोदी सरकार
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली के बॉर्डर पर नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों के प्रदर्शन का आज छठा दिन है.
किसान संगठनों की माने तो भारत के अलग-अलग राज्यों से और किसान इस आंदोलन से जुड़ने वाले हैं. यानी आंदोलन धीरे-धीरे और बढ़ेगा.
इन छह दिनों में केंद्र सरकार की तरफ़ से बड़े मंत्रियों ने तीन बार बातचीत की पेशकश भी की.
पहले नरेंद्र सिंह तोमर फिर गृह मंत्री अमित शाह और बीती रात केंद्रीय गृह सचिव ने किसान संगठनों को बातचीत के लिए निमंत्रण भेजा.
किसान संगठन मंगलवार को केंद्र सरकार से बातचीत के लिए तैयार भी हैं.
इतनी ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले 'मन की बात' में और फिर सोमवार को वाराणसी से किसानों को संबोधित किया.
सरकार की छवि
नतीजा ये कि 3 दिसंबर की बातचीत समय से दो दिन पहले 1 दिसंबर को ही बिना किसी शर्त बातचीत के लिए निमंत्रण गया.
हालांकि सरकार की तरफ़ से कहा जा रहा है कि 'कोरोना और ठंड' की वजह से सरकार ने बातचीत की तारीख़ आगे बढ़ाई है.
लेकिन ये दोनों वजहें पिछले साल दिंसबर में भी थी, जब भारत की राजधानी दिल्ली में सीएए के ख़िलाफ़ धरना प्रदर्शन चल रहा था.
केंद्र सरकार की तरफ़ से ऐसी पेशकश उस वक़्त देखने को नहीं मिली थी. वो वक़्त दिल्ली में विधानसभा चुनाव का भी था.
इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि सरकार इस बार किसानों आंदोलन में क्या लाचार और बेबस है?
क्या इस आंदोलन से सरकार की छवि को नुक़सान पहुँचने का उन्हें डर सता रहा है? या फिर ये क़दम उनकी रणनीति का हिस्सा भर है?
सरकार को डर है पार्टी की किसान विरोधी छवि ना बन जाए?
संजय कुमार सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (CSDS) में प्रोफ़ेसर हैं.
आँकड़ो के आधार पर विश्लेषण करते हुए वो कहते हैं, "किसान आंदोलन जो पिछले कुछ समय से चल रहा है, उसको लेकर सरकार में 'किसान विरोधी छवि' बनने का डर सता रहा था. किसानों की माँग को माना जाए या नहीं, वो अलग बात है और बातचीत के लिए बैठने को तैयार होना अलग बात है."
उनका मानना है कि 2019 लोकसभा चुनाव तक एनडीए की छवि किसानों के बीच अच्छी थी. इस वजह से किसानों ने उन्हें लोकसभा चुनाव में अच्छा समर्थन भी दिया है.
अपने बयान के साथ वो आँकड़े भी गिनाते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में किसानों का वोट एनडीए को बाक़ी दूसरे व्यवसाय करने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा मिला था.
2019 में एनडीए का कुल वोट 44 फीसद था, जिसमें से किसानों का 47 फीसद वोट मिला था और दूसरे व्यवसाय वाले 44 फीसद लोगों ने एनडीए के लिए वोट किया था.
यानी किसानों का झुकाव एनडीए के लिए 2-3 फीसद ज़्यादा रहा है.
एनडीए को मिलता रहा है किसानों का समर्थन
राज्यों की बात करें तो पंजाब में एनडीए गठबंधन को किसानों ने दूसरे व्यवसाय वालों की तुलना में 4 फीसद भले ही कम वोट दिए लेकिन हरियाणा में किसान और दूसरे व्यवसाय वालों ने लगभग एक जैसा वोट एनडीए के लिए किया. वहीं उत्तर प्रदेश में किसानों ने एनडीए को ज़्यादा वोट दिया.
संजय कुमार आगे कहते हैं, "हाल ही में प्रधानमंत्री तीन राज्यों में कोरोना वैक्सीन बनने का जायज़ा लेने गए, वाराणसी गए और गृह मंत्री अमित शाह हैदराबाद में चुनावी रैली को संबोधित करने गए. इससे आम जनता और किसानों के बीच केंद्र सरकार की एक छवि बनने लगी कि केंद्र सरकार किसानों को लेकर लापरवाह है. भले ही प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का ये दौरे पहले से ही तय रहा हो, लेकिन परसेप्शन में वो किसान विरोधी दिख रहे थे."
इसलिए सरकार समय से पहले बातचीत के लिए राजी हो गई. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह को नहीं लगता की बीजेपी के अंदर इस तरह का कोई डर है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं कि किसानों के हित में पिछले छह सालों में सरकार ने जितना काम किया है, उसके बाद पार्टी पूरी तरह आश्वस्त है. चाहे किसान सम्मान निधि की बात हो या फिर किसानों की आय दोगुनी करने का वादा या फिर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना सरकार ने हर मोर्चे पर किसानों के लिए ख़ूब काम किया है.
लेकिन ये भी सच है कि एनडीए के पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण संबंधी बिल पर केंद्र सरकार को एक बार झटका लग चुका है. इसलिए इस बार केंद्र सरकार किसानों से जुड़े मुद्दे में इस बार कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती.
सरकार रणनीति के तहत किसानों की आशंकाओं को दूर करना चाहती है
वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह मानते हैं कि वाराणसी से सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को जैसे संबोधित किया, वो बताता है कि सरकार झुकी नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से भाषण में 'छल' शब्द का इस्तेमाल किया वो बताता है कि किसानों के साथ धोखा हो रहा है. इस शब्द प्रयोग उन्होंने बहुत सोच समझ के किया."
"ये बताने की कोशिश की गई कि सरकार के फ़ैसलों का विरोध उस वक़्त नहीं हुआ जब क़ानून बन रहे थे. और बाद में किसानों को भड़काने की कोशिश की जा रही है. पीएम ने ये भी कहा कि जिनके मन में इस क़ानून को लेकर कोई आशंका है तो उनको भी इसका लाभ मिलेगा. ये दोनों वाक्य बीजेपी की रणनीति को बयां करने के लिए काफ़ी हैं."
वो आगे कहते हैं कि मंगलवार को बातचीत का न्योता केवल इस बात को दिखाता है कि सरकार किसानों की आशंकाओं को दूर करना चाहती है. ये उनकी एक रणनीति है. तीन नए कृषि क़ानून पर सरकार पीछे नहीं हटने वाली.
प्रदीप सिंह अपने बात के समर्थन में तर्क़ देते हैं कि पंजाब और हरियाणा के अलावा दूसरे राज्यों में इस क़ानून का केवल प्रतीकात्मक विरोध है. नए क़ानून से पुरानी कोई व्यवस्था ख़त्म नहीं की गई. एक नया विकल्प उनके लिए जोड़ा गया है.
दवाब में है केंद्र सरकार
आउटलुक मैग़ज़ीन की राजनीतिक संपादक भावना विज अरोड़ा भी मानती है कि सरकार का समय से पहले किसानों से बातचीत के लिए तैयार हो जाना एक तरह से उनकी रणनीति को भी दिखाता है, साथ ही ये भी बताता है कि सरकार दवाब में है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, " बीजेपी से पहली चूक ये हुई कि उन्हें एकदम अंदाजा नहीं था कि ये आंदोलन इतना बड़ा होने वाला है. इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली तक पहुँच जाएँगे. बीजेपी का लग रहा था कि हरियाणा में ही किसानों को संभाल लिया जाएगा. और हरियाणा के किसान इस आंदोलन में पंजाब वालों का साथ नहीं देंगे."
वो आगे कहती हैं, "पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहे थे कि ये आंदोलन केवल पंजाब के किसानों का है, हरियाणा के किसान इसमें शामिल नहीं हैं. लेकिन जब हरियाणा के किसान भी पंजाब के किसानों के समर्थन में पहुँचे तब सरकार को अहसास हुआ कैसे आने वाले दिनों में बात हाथ से निकल सकती है."
बीजेपी की हरियाणा में अपने दम पर सरकार नहीं है और अब मुख्यमंत्री खट्टर भी दवाब महसूस कर रहे हैं. कहीं ऐसा ना हो कि हरियाणा में अगले चुनाव में उनको इस आंदोलन की वजह से नुक़सान हो.
घटक दल और बीजेपी के अंदर से विरोधी सुर
सोमवार को केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के एक और सहयोगी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने कहा है कि अगर कृषि क़ानून को वापस नहीं लिया जाता है तो वो एनडीए छोड़ने पर विचार कर सकते हैं. इससे पहले कृषि क़ानून के विरोध में अकाली दल पहले ही एनडीए से अलग हो चुका है.
मंगलवार को हरियाणा के निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान ने मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली हरियाणा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है. उन्होंने इसके पीछे किसानों के प्रति केंद्र सरकार के रवैये को ज़िम्मेदार बताया
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को किसान आंदोलन पर कहा कि कृषि क़ानूनों को लेकर हो रहा विरोध ग़लतफ़हमी की वजह से है और सरकार और किसानों के बीच बातचीत होनी चाहिए.
भावना विज अरोड़ा काफ़ी लंबे समय से बीजेपी को कवर करती आई हैं.
वो कहती हैं, " बीजेपी में अब पार्टी के अंदर से भी आवाज़े उठ रही हैं. हरियाणा के बीजेपी नेता धर्मवीर सिंह ने कहा है कि ये किसान जो आंदोलन कर रहे हैं वो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं हैं. ये हमारे अन्नदाता हैं, इन्हें हमें गंभीरता से लेना चाहिए. उसी तरह से दूसरे नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह ने भी कहा है कि नए कृषि क़ानून अच्छे हैं लेकिन क़ानून बनाने से पहले इस पर और बहस होनी चाहिए थी."
जाहिर है हरियाणा बीजेपी के इन दोनों नेताओं के पक्ष केंद्रीय नेतृत्व के पक्ष से थोड़ा अलग हट कर हैं. इस वजह से भी बीजेपी ने बातचीत की तारीख़ दो दिन पहले कर दी है.
इतना ही नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टीन ट्रूडो ने भारत में चल रहे किसान आंदोलन पर टिप्पणी कर चिंता जताया था और कहा था कि वो इस संबंध में भारतीय अधिकारियों से बात करेंगे. भारत सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.
भारत ही नहीं विदेश तक अब इस आंदोलन की गूंज सुनाई दे रही है.
दिल्ली ठप होने से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
दिल्ली आने से पहले पंजाब के किसान राज्य में प्रदर्शन कर रहे थे. मालगाड़ी की आवाजाही प्रदेश में पूरी तरह ठप थी. जिसकी वजह से ज़रूरी सामान की आपूर्ति पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश तक बाधित थी.
पिछले छह दिनों से किसान दिल्ली के पाँचों बॉर्डर पर धरना दे कर बैठे हैं. इनमें से कई किसान अपने खाने-पीने का महीने भर का राशन साथ लेकर आए हैं. ऐसे में अगर किसान आंदोलन लंबा चला तो आने वाले दिनों में दिल्ली में पंजाब हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आने वाली ज़रूरी सामानों की किल्लत बढ़ सकती है.
इन दिनों पहले से ही सब्ज़ियों और फलों की कीमतें बढ़ी हुई है. केंद्र सरकार इसलिए भी नहीं चाहती की किसान आंदोलन लंबा खींचे.
राजनाथ सिंह की सलाह पर बनी रणनीति
भावना आगे कहती है कि ये भी सरकार की रणनीति का ही हिस्सा है कि पूरे मामले पर सरकार ने पहले से ही राजनाथ सिंह को आगे किया था. उन से सलाह लेकर की बीजेपी आगे की रणनीति तैयार कर रही है.
सितंबर में संसद सत्र में जब ज़ोरदार हंगामे के बीच ये बिल पास हुए थे, तो छह मंत्रियों की फ़ौज ने एक प्रेस क़ॉन्फ्रेंस की थी. उसमें भी राजनाथ सिंह को सरकार ने आगे किया था.
मंगलवार को भी किसान संगठनों से बातचीत के पहले बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के घर एक बैठक हुई जिसमें अमित शाह, नरेंद्र सिंह तोमर के अलावा राजनाथ सिंह भी मौजूद थे. शाम वाली बैठक भी राजनाथ सिंह की अगुवाई में हो रही है.
प्रदीप सिंह के मुताबिक़ वाजपेयी सरकार में राजनाथ सिंह कृषि मंत्री बने थे. तब से उनकी छवि पार्टी में और पार्टी के बाहर भी किसान नेता की है. यही वजह है कि इस क्राइसिस के दौर में पार्टी उनकी इस छवि को भुनाने की कोशिश में जुटी है.
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