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कृषि बिल पर क्या 'डैमेज कंट्रोल' में जुट गई है मोदी सरकार?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कृषि बिल को लेकर देश के तमाम बड़े अंग्रेज़ी और हिंदी अख़बारों में एक बड़ा विज्ञापन देखने को मिला. केंद्र सरकार की ओर से जारी विज्ञापन में कृषि बिल से जुड़े 'झूठ' और 'सच' के बारे में बात की गई है.
विज्ञापन में बताया गया है कि कैसे नए कृषि बिल में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अनाज मंडियों की व्यवस्था को ख़त्म नहीं किया जा रहा है, बल्कि किसानों को सरकार विकल्प दे कर, आज़ाद करने जा रही है.
एक ऐसी ही कोशिश केंद्र सरकार की तरफ़ से सोमवार को देर शाम हुई. सरकार ने छह फसलों की एमएसपी बढ़ाने की घोषणा की.
पिछले 12 सालों से अब तक रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा सितंबर के बाद होती आई है. लेकिन इस बार किसानों के विरोध प्रदर्शन और विपक्ष के आक्रामक रवैए को देखते हुए केंद्र ने संसद सत्र के बीच में ही इसकी घोषणा कर दी.
इसके अलावा केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने यूपीए और एनडीए दोनों के कार्यकाल में एमएसपी वाले फसलों के दामों में कितनी बढ़ोतरी की है, इसका भी लेखा जोखा ट्विटर के माध्यम से जनता तक पहुँचाने की कोशिश की.
इतना ही नहीं, केंद्र ने मंडियों से कितनी फसल ख़रीदी और यूपीए कार्यकाल से एनडीए कार्यकाल में कितनी बढ़ोतरी हुई, इस पर भी उन्होंने आक्रामक तरीक़े से अपनी बात रखी है.
खु़द प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग-अलग कार्यक्रमों में इस विषय पर संसद और दूसरी जगहों पर अपनी राय रख चुके हैं.
रविवार को राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उसके बाद केंद्र सरकार ने राजनाथ सिंह समेत छह वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारा.
रही सही कसर तब पूरी हो गई, जब राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश को भी बिहार और बिहारी अस्मिता से जोड़ा जाने लगा.
पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें बिहार का बताया, फिर क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ये बात दोहराई. तीसरी बार खुद़ हरिवंश ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख कर अपने बिहार से जुड़े होने की याद दिला दी.
प्रधानमंत्री ने भी इस पत्र को ट्वीट कर देशवासियों को इसे ज़रूर पढ़ने की सलाह दी है.
ऐसे में हर तरफ़ चर्चा है कि आने वाले दिनों में बिहार विधानसभा चुनाव में भी इस मुद्दे को उठाया जाएगा.
इस बिल के विरोध में विपक्ष भी ख़ूब सक्रिय है. संसद के इतिहास में पहली बार रात भर सांसद धरने पर बैठे रहे. कांग्रेस ने सड़क पर इस विरोध को ले जाने की बात की है. कई पार्टियों ने अपनी गुहार राष्ट्रपति तक लगाई है.
लेकिन सरकार भी नए कृषि बिल पर उतनी ही अडिग नज़र आ रही है.
सरकार को कितना 'डैमेज' हुआ?
सत्ताधारी पार्टी ने कृषि बिल के मामले में अपने 23 साल पुराने दोस्त अकाली दल के मंत्रिमंडल से जाने की भी कोई ख़ास परवाह नहीं की और बिल के मसौदे से ठस से मस नहीं हुई.
बिल पर केंद्र सरकार को 'डैमेज' तो हुआ है, लेकिन सरकार उसे 'कंट्रोल' करने में भी पूरे ज़ोर-शोर से जुट गई है.
वरिष्ठ पत्रकार निस्तुला हेब्बार कहती हैं कि सरकार के जितने क़दम आपने गिनाए हैं, ये डैमेज कंट्रोल से ज़्यादा पुरानी ग़लतियों से सीख को दर्शाता है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "जिस तरह से भूमि अधिग्रहण बिल केंद्र सरकार को वापस लेना पड़ा था, इस बार केंद्र सरकार थोड़ी सजग ज़रूर है. भूमि अधिग्रहण बिल पर विपक्ष सत्ता पक्ष पर भारी पड़ गया था. उस वक्त़ कांग्रेस ने सूट-बूट की सरकार का नारा दिया था, जो एक तरह से बीजेपी पर चिपक गया था. तो इस बार बीजेपी भी अपना 'कम्यूनिकेश गेम' दुरुस्त कर रही है."
'परसेप्शन' की लड़ाई
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) में प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं, "राजनीति में परसेप्शन का बहुत बड़ा रोल होता है. बीजेपी चाहती है कि 'किसान विरोधी परसेप्शन' बनने के पहले ही उसे ध्वस्त करना ज़रूरी है. यही वजह है कि युद्ध स्तर पर बीजेपी जुट गई है. ख़ुद प्रधानमंत्री इसके बारे में सार्वजनिक मंच से बोल रहे हैं. कृषि मंत्री की जगह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और छह बड़े नेताओं को भी इस कारण ही आगे किया गया."
संजय कुमार की मानें, तो हरसिमरत कौर बादल का मंत्रिमंडल से ये बता कर इस्तीफा देना कि नए कृषि बिल किसान विरोधी हैं, ये भी एक परसेप्शन बनाता है कि बीजेपी एक पार्टी के तौर पर किसान विरोधी है.
इसलिए राजनाथ सिंह से जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये सवाल पूछा गया, तो राजनाथ सिंह ने जवाब को 'राजनीतिक मजबूरी' करार दे दिया. बीजेपी ये संदेश नहीं देना चाहती कि वो अपने ही साथी को नहीं मना पा रही. बीजेपी के लिए ये 'परसेप्शन' तोड़ना भी ज़रूरी है.
निस्तुला कहती हैं, "सरकार के लिए मुश्किल ये भी है कि संसद का सत्र चल रहा है. जो कुछ हो रहा है, सब जनता देख रही है. ये अध्यादेश कोरोनो के दौर में आया था, उस वक़्त इसे ज़्यादा अहमियत किसी ने दी नहीं. विपक्ष भी इस मुद्दे पर अब आक्रामक है. इसलिए सरकार को भी अपना पक्ष तो रखना ही पड़ेगा."
"पंजाब-हरियाणा के किसानों का दख़ल कृषि संबंधी क़ानून पर तो रहता ही है. लेकिन नए कृषि बिल को महाराष्ट्र के किसानों से समर्थन मिल रहा है, वहाँ नक़दी वाली फसल अधिक होती है. इसलिए ये सही नहीं है कि केवल इस बिल का विरोध ही हो रहा है, सरकार यही दिखाना चाहती भी है, कुछ लोगों को परेशानी है और बहुत सारे लोगों को परेशानी नहीं भी है."
वोट बैंक का नुक़सान?
निस्तुला कहती हैं कि जब 'डैमेज कंट्रोल' की बात हो रही है, तो ये भी देखना होगा कि 'डैमेज' कितना हुआ है. हाँ, एनडीए का एक पुराना साथी मंत्रिमंडल से निकल ज़रूर गया, लेकिन ऐसा नहीं कि उनका वोट बैंक खिसक गया हो.
उनका मानना है, "बीजेपी केवल ग्रामीण वोट बैंक वाली पार्टी नहीं है. बीजेपी, शहरों और सेमी-अर्बन इलाक़ों में ज़्यादा मज़बूत है. प्रधानमंत्री मोदी और उनकी कल्याणकारी सरकारी योजनाओं की वजह से वैसे लोग भी अब बीजेपी से जुड़ने लगे हैं, जो कभी उनके पारंपरिक वोटर नहीं रहे. भारत में जनता जाति पर भी वोट करती है और इस बात पर भी कि सरकार की नीतियों से उन्हें क्या मिला है. बीजेपी देश में पारंपरिक राजनीति के तरीक़े में बदलाव लाने की कोशिश कर रही है."
निस्तुला बीजेपी के राजनीतिक प्रयोगों से उस बात को समझाती हैं. इसका उदाहरण जनता ने महाराष्ट्र और हरियाणा में देखा. "महाराष्ट्र में 'मराठा' को महत्व दिया जाता था, लेकिन बीजेपी ने मुख्यमंत्री ब्राह्मण को बनाया. उसी तरह से हरियाणा में 'जाट' की जगह खट्टर को मुख्यमंत्री बना दिया. परंपरा तोड़ने की शुरुआत ख़ुद मोदी से होती है, जो ख़ुद उस तबके से आते हैं जो गुजरात की राजनीति में बहुत दख़ल उनके पहले तक नहीं रखते थे."
"नए कृषि बिल में ऐसी ही वर्षों से चली आ रहे 'दखल' को तोड़ने की बात है. इस बिल में मंडियों के साथ साथ किसानों को अनाज किसको बेचना है, इस बारे में एक विकल्प दिया गया है, जो पहले उनके पास उपलब्ध नहीं था. ऐसे में हो सकता है कि पहले 100 लोग मंडियों में अपना अनाज बेचते थे, उनमें से अब 80 किसान ही मंडियों का रुख़ करें. 20 किसान दूसरे विकल्प को स्वीकार करें."
इसलिए निस्तुला को लगता है कि ज़रूरी नहीं कि बीजेपी का ये दांव उलटा पड़े. इस नई व्यवस्था से जो लोग लाभ उठाएँगे, वो तो बीजेपी के लिए वोट करेंगे.
बीजेपी और किसान
संजय कुमार की राय में आने वाले बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में ये बड़ा मुद्दा नहीं होगा. पंजाब में बीजेपी के पास बड़ा वोट बैंक नहीं है, हरियाणा में बीजेपी का वोट है, लेकिन वो पहले से थोड़ा कम वैसे भी है.
हालाँकि संजय कुमार नहीं मानते की बीजेपी अब भी शहरी लोगों की पार्टी रह गई है. वो अपनी बात को कहने के लिए आँकड़े भी गिनाते हैं.
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक़ 2014 में बीजेपी को ग्रामीण इलाक़ों में 30 फ़ीसदी, छोटे शहरों में 30 फ़ीसदी और बड़े शहरों में 39 फ़ीसदी वोट मिले थे. वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान ग्रामीण इलाक़े में पार्टी को 38 फ़ीसदी, छोटे शहरों में 33 फ़ीसदी और बड़े शहरों में 41 फ़ीसदी वोट मिले थे.
संजय कुमार कहते हैं इन आँकड़ों को दो तरह से देखने की ज़रूरत है. ग्रामीण इलाक़ों में बीजेपी का वोट बैंक पाँच सालों में 8 फ़ीसदी बढ़ा है. जबकि छोटे और बड़े शहरों को मिलाकर 5 फ़ीसदी बढ़ा है.
दूसरी तरह से भी देखें, तो ग्रामीण और शहरी इलाक़ों के वोट शेयर का अंतर 2014 में आठ फ़ीसदी था, वो घट कर 2019 में तीन फ़ीसदी रह गया.
संजय कुमार का कहना है कि इसलिए भी बीजेपी युद्ध स्तर पर डैमेज होने से पहले पूरी स्थिति को कंट्रोल कर लेना चाहती है. ये बात बीजेपी ख़ुद भी अच्छी तरह से जानती है और समझती है.
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