उपचुनाव: ज्योतिरादित्य अग्निपरीक्षा में पास लेकिन कमलनाथ का क्या होगा?

ज्योतिरादित्य सिंधिया

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार में जदयू नेता नीतीश कुमार के नेतृत्व में एडीए की सरकार बननी तय हो गई है वहीं 11 राज्यों की 58 सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे भी स्पष्ट हो गए है.

इन उपचुनावों में मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य था जिसमें बीजेपी और कांग्रेस दोनों का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था. यहां 28 सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इन 28 सीटों में से बीजेपी ने 19 सीट अपने खाते में दर्ज की हैं वहीं कांग्रेस को 9 सीटों पर संतोष करना पड़ा है.

मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार इसी साल तब बनी जब राज्य में कमलनाथ की करीब 15 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार के दो दर्जन से ज़्यादा विधायकों ने पार्टी का हाथ छोड़ दिया. इन विधायकों ने बीजेपी के कमल को थाम लिया था. कांग्रेस में ये बग़ावत लंबे समय तक कांग्रेस में रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में हुई. इसके अलावा तीन सीट विधायकों के निधन के बाद खाली हो गईं थीं.

साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीट मिली थीं और वो बहुमत से दो सीट पीछे छूट गई थी और बीजेपी को 109 सीटों पर जीत मिली थी. कांग्रेस चार निर्दलीय विधायकों की मदद से सरकार बनाने में कामयाब हुई थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की बग़ावत ने सरकार का आँकड़ा घटा कर 88 पर ला दिया था और वहीं हाल ही में एक और विधायक बीजेपी में शामिल हो गया हैं.

उपचुनाव में मिली इस जीत से शिवराज सिंह चौहान की सरकार को मज़बूती मिलेगी. यहां सवाल यह भी है कि क्या इससे ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी में और प्रभावी होंगे?

साल 2019 में हुए संसदीय चुनाव में ज्योतिरादित्य अपनी पारंपरिक सीट गुना से चुनाव हार गए थे. ऐसे में बीजेपी में शामिल होने के बाद उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ग्वालियर और चंबल क्षेत्र में अपने दबदबे को क़ायम रखना भी था. ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर के पुराने राजघराने से ताल्लुक़ रखते हैं. इस जीत के बाद न केवल बीजेपी में उनका दबदबा बढ़ेगा बल्कि ये उनके राजनीतिक करियर के लिए भी अहम था.

वीडियो कैप्शन, मध्य प्रदेश उपचुनाव में बीजेपी बड़ी जीत की तरफ

केंद्र में हो सकते हैं प्रभावी?

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, ''जब सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी तो पार्टी ने उन्हें धोखेबाज़, गद्दार कहा गया. इसके बाद चंबल और ग्वालियर में जीत दर्ज करना ये उनके लिए उपलब्धि है. क्योंकि इन इलाकों में महल का बड़ा मुक़ाम और प्रतिष्ठा है और वहीं से राजनीति होती है ऐसे में अब बीजेपी ने उस पर कब्ज़ा कर लिया है. पहली बार जब चुनाव हुए थे ये हिंदू महासभा का गढ़ माना जाता था और इसलिए जवाहरलाल नेहरू ने राजमाता सिंधिया (ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी) को कांग्रेस का प्रतिनिधि बनाया था. वो चुनाव भी लड़ीं. कांग्रेस जानती थी कि ये क्षेत्र राइट विंग विचारधारा की तरफ झुक सकता है और इसी बात का कांग्रेस को डर हमेशा था लेकिन इस उपचुनाव में बीजेपी से मिली भारी हार से अब ये क्षेत्र उसके हाथ से पूरी तरह से निकल चुका है''.

लेकिन क्या इस जीत के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की बीजेपी में शीर्ष पद पर जाने की संभावना बढ़ गई है?

इस सवाल के जवाब पर रशीद किदवई कहते हैं, ''ज्योतिरादित्य का व्यक्तित्व काफ़ी प्रभावशाली माना जाता है. उनकी अंग्रेजी और हिंदी भाषा पर अच्छी कमांड है. वे यूपीए के दौरान भी मंत्री रह चुके हैं तो ऐसे में इन सभी चीज़ों का समावेश करके देखा जाए तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद दूसरी पंक्ति के नेताओं जैसे देवेंद्र फडनवीस, स्मृति इरानी, योगी आदित्यनाथ की कतार में अब उन्हें भी शामिल कर लिया जाएगा. उन्हें केंद्र में मंत्री बनाया जा सकता है.साथ ही नरेंद्र मोदी के उनकों केबिनेट में लाने से छवि भी साफ़ होगी. और जब उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में लाया जाएगा तो वे राहुल गांधी को बहुत परेशान करेंगे क्योंकि बीजेपी उन्हें इसी मक़सद से लाई है वे राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी की काट कर सके.''

वहीं शिवराजसिंह चौहान की बात की जाए तो ये उपचुनाव उनके लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं थे. क्योंकि अगर सीटें कम आती तो उनके मुख्यमंत्री पद पर गाज गिर सकती थी. क्योंकि ये समझा जा रहा है कि राज्य और केंद्र में कई मंत्री शिवराज चौहान को हटाने की कोशिश में लगे हुए हैं और विश्लेषकों का ये भी कहना है कि शिवराज सिंह चौहान के शीर्ष नेताओं के साथ अब इतने मधुर संबंध भी नहीं हैं. लेकिन अब इस जीत से उनके भविष्य का रास्ता साफ़ हो गया है.

कमलनाथ के लिए आगे की राह

कमलनाथ

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लेकिन राज्य के एक और वरिष्ठ नेता कमलनाथ के लिए आगे की राह आसान नहीं नज़र आती.

रशीद किदवई के अनुसार, ''74 वर्षीय कमलनाथ केंद्र की राजनीति में भी काफ़ी दक्ष माने जाते हैं लेकिन अगर राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष बनते है या उनकी कोर टीम में वे कितना फिट हो पाएंगे ये देखने वाली बात होगी. और राज्य में जब 2023 में विधानसभा चुनाव होंगे तो उनकी उम्र को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं. वहीं राज्य में वे नेता प्रतिपक्ष होने के साथ-साथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं तो उनके दो पदों पर एक साथ रहने के ख़िलाफ़ भी आवाज़े उठ सकती हैं.''

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी का कहना है कि कमलनाथ राजनीतिक तौर कमज़ोर होंगे लेकिन दिग्विजय और उनके बेटे के राज्य में संभवनाएं बढ़ेगी लेकिन रशीद किदवई इस बात से इतेफ़ाक नहीं रखते.

उनके अनुसार,'' दोनों नेता एक ही नाव पर सवार हैं क्योंकि दोनों की उम्र एक फैक्टर बनेगी और 2023 में वे नेतृत्व करने में शायद ही सक्षम हो. लेकिन दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह, जितू पटवारी जैसे कई युवा नेता है जिन्हें राहुल गांधी राज्य में ज़िम्मेदारी देना चाहेंगे. ऐसे में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की राज्य में राजनीतिक पारी समाप्त होती ही नज़र आती है. क्योंकि राज्यसभा चुनाव के लिए अभी समय है तो ऐसे में कमलनाथ क्या करेंगे? हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि वे राहुल गांधी के लिए कारगर साबित हो सकते हैं लेकिन ये केवल राहुल गांधी के फैसले पर ही निर्भर करेगा.''

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत

योगी आदित्यनाथ

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इधर उत्तरप्रदेश की सात सीटों में से छह पर बांगरमऊ, बुलंदशहर,देवरिया, घाटमपुर, टूंडला और नौगांवा सादत पर बीजेपी और मल्हनी पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की है.

हालांकि क़ानून-व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की काफ़ी आलोचना हो रही थी वहीं हाथरस और उसके बाद अन्य इलाकों से आई कथित बलात्कार की घटनाओं ने सरकार की छवि पर भी असर डाला था लेकिन उपचुनाव पर इन मुद्दों को प्रभाव नहीं दिखाई दिया.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ''राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी मज़बूती से सत्ता में काबिज़ है और संगठनात्मक तौर पर काफ़ी मज़बूत भी हैं. हालांकि क़ानून-व्यवस्था को लेकर एक नाराज़गी सामने आई थी लेकिन हिंदू वोटरों में एकजुटता बनी हुई है. वहीं विपक्ष की हालात काफ़ी ख़राब है. और बसपा तो बीजेपी की टीम बी ही मानी जा रही है और आगे जाकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के साथ चुनाव लड़ सकती है. कांग्रेस में प्रियंका गांधी कोशिश कर रही हैं लेकिन संगठनात्मक तौर पर मज़बूती आई हो ऐसा दिखाई नहीं देता लेकिन सपा जरूर फाइट बेक कर सकती है.''

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ लंबी रेस का घोड़ा साबित होंगे और वे अगला चुनाव भी बीजेपी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी.

गुजरात में बीजेपी का ज़ोर बरक़रार

गुजरात विधानसभा की आठ सीटों मोरबी, अबडासा, धारी, डांग, कपराडा, करजण, लिंबडी और गढड़ा पर बीजेपी चुनाव जीत गई है.

गुजरात के मुख्य मंत्री विजय रूपाणी ने इसे ट्रेलर बताया है. उन्होंने कहा, ''ये उपचुनाव आने वाले दिनों में गुजरात में होने वाले म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और फिर 2022 में हाने वाले विधानसभा चुनाव का ट्रेलर है.ये उपचुनाव कांग्रेस के ताबूत में आख़िरी कील की तरह होंगे.''

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इन सीटों पर जीत हासिल करने के बाद बीजेपी सरकार के पास विधानसभा की 111 सीटें होंगी.

हालांकि इन उपचुनावों के नतीजों से बीजेपी की विजय रूपाणी सरकार के गणित पर कोई असर नहीं होगा क्योंकि उनकी सरकार बहुमत में ही थी और ये जीत उन्हें मज़बूती ही देगी. लेकिन दोनों ही पार्टियों के नवनियुक्त अध्यक्ष , बीजेपी के सीआर पाटिल और कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल के लिए ये उपचुनाव अहम थे क्योंकि उनकी अध्यक्षता में ये पहले चुनाव थे.

राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के विधायकों ने इस्तीफ़े दे दिए थे और वे बीजेपी में शामिल हो गए थे. खाली पड़ी विधानसभा सीटों पर ये उपचुनाव कराए गए . इन चुनाव में बीजेपी ने जहां कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए पांच नेताओं को मैदान में उतारा तो कांग्रेस ने इन दलबदलु नेताओं, बेरोजगारी और किसानों को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था लेकिन शायद ये मुद्दे जनता को लुभा नहीं पाए.

अन्य उपचुनाव

छत्तीसगढ़ की मरवाही सीट पर कांग्रेस को जीत मिली है तो हरियाणा की बरोदा सीट पर कांग्रेस के इंदु राज ने उपचुनाव जीत लिया है. बीजेपी ने इस सीट से ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त को खड़ा किया था.

झारखंड में दो सीटों में से एक दुमका सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी के बसंत सोरेन ने चुनाव जीत लिया है. वे शिबू सोरेन के बेटे हैं और ये सीट आरक्षित है. वहीं बेरमो सीट कांग्रेस ने जीत ली है.

दक्षिणी राज्य तेलंगाना की दुब्बाक सीट के साथ साथ कर्नाटक की सीरा और राजराजेश्वरी नगर सीट बीजेपी ने अपने नाम कर ली है. ओडिशा की बालासोर और तिरतोल सीट पर बीजू जनता दल ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है.

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