अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के मामले में क़ानून क्या कहता है?

अर्नब गोस्वामी

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

महाराष्ट्र की रायगढ़ पुलिस ने बुधवार सुबह अर्नब गोस्वामी और दो अन्य लोगों को 52 वर्षीय इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में गिरफ़्तार किया गया था.

उन पर आईपीसी की धारा 306 के साथ धारा 34 भी लगाई गई है.

अर्नब को मुंबई से गिरफ़्तार किया गया था और बाद में उन्हें रायगढ़ ज़िले के अलीबाग़ ले जाया गया. दोपहर एक बजे उन्हें अलीबाग़ के ज़िला न्यायालय में पेश किया गया.

अदालत ने छह घंटे की सुनवाई के बाद उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का फ़ैसला सुनाया.

लेकिन अर्नब को जिस क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया, उस पर सोशल मीडिया पर बहस चल रही है.

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कई केंद्रीय मंत्री इसे इमरजेंसी कह रहे हैं, कई लोग इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ कह रहे हैं, तो कई लोग इसे प्रेस की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं. कई लोग लिख रहे हैं कि बंद पड़े केस को दोबारा राजनीतिक बदले की भावना से खोला गया है.

लेकिन एक तबक़ा ऐसा भी है, जो ये कहता है कि मामला आत्महत्या के लिए उकसाने का है, जिसे प्रेस की आज़ादी या अभिव्यक्ति की आज़ादी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

इसलिए ये समझना ज़रूरी है कि आईपीसी की धारा 306 क्या है, जिसके तहत अर्नब गोस्वामी को गिरफ़्तार किया गया है.

अर्नब गोस्वामी

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आईपीसी की धारा 306 और 34 क्या है?

भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी में किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने को लेकर धारा 306 का प्रावधान है.

ये धारा उसी पर लगाई जाती है, जिसने किसी व्यक्ति को ख़ुदकुशी के लिए मजबूर किया हो.

जिस इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक को ख़ुदकुशी के लिए उकसाने का आरोप अर्नब गोस्वामी पर लगाया गया है, दरअसल उन्होंने मरने के पहले एक सुसाइड नोट लिखा था.

अन्वय नाइक ने इस नोट में आरोप लगाया था कि वो और उनकी माँ ने इसलिए जीवन ख़त्म करने का फ़ैसला लिया, क्योंकि अर्नब के साथ फ़िरोज़ शेख़ और नितेश सारदा ने 5.40 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया था.

इसी सुसाइड नोट के आधार पर अर्नब गोस्वामी पर आईपीसी की धारा 306 लगाई गई है.

ख़ुदकुशी के लिए 'उक़साना' कब और कैसी परिस्थितियों में माना जाएगा, इसको आईपीसी के सेक्शन 107 में अलग से परिभाषित किया गया है.

इसके तहत तीन बातें आती हैं. पहला जब किसी ने सुसाइड करने में जानबूझ कर मदद की हो. यानी सुसाइड के लिए किसी को जानबूझ कर रस्सी देना, कुर्सी लगा देना, तेल छिड़क देना, माचिस देना आदि.

दूसरा ख़ुदकुशी के लिए षड्यंत्र में कोई शामिल हो. और तीसरा है सीधे तरीक़े से उकसाना.

इन तीनों तरीक़े में से किसी भी तरीक़े से अगर कोई व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति की ख़ुदकुशी के लिए ज़िम्मेदार हैं, तो उस पर धारा 306 लग सकती है. मामला साबित होने पर इसके तहत 10 साल के क़ैद की सज़ा है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

इसमें पुलिस बिना वारंट के अभियुक्त को गिरफ़्तार कर सकती है. ऐसे मामले में ज़मानत देने का अधिकार केवल कोर्ट को होता है, थाने को नहीं.

जबकि आईपीसी की धारा 34 उन पर लगाई जाती है, जिसमें कोई अपराधी दूसरों के साथ मिल कर एक सामान्य इरादे से किसी अपराध को अंजाम देता है. इस मामले में अर्नब के साथ दो अन्य अभियुक्त भी हैं.

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मौत से पहले दिए बयान

सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील दीपक आंनद कहते हैं, "हमने प्रैक्टिस में देखा है कि धारा 306 के ज़्यादातर मामले दहेज क़ानून में लगाए जाते हैं. लेकिन अगर किसी ने जीवन में कभी गाली नहीं सुनी और एक बार किसी ने दे दी, इस वजह से कोई खु़दकुशी कर ले, तो इस सूरत में गाली देने वाले पर धारा 306 नहीं लग सकती. सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग फ़ैसलों में इस पर विस्तार से कहा है. लेकिन अगर हर दिन आप किसी को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, इस वजह से तंग आकर किसी ने ख़ुदकुशी कर ली हो, तो प्रताड़ित करने वाले पर धारा 306 लगाई जा सकती है."

वो आगे कहते हैं, "धारा 306 लगाने के लिए साक्ष्यों की ज़रूरत होती है. अमूमन मरने वाले के आख़िर शब्दों को 'डाइंग डिक्लेरेशन' माना जाता है यानी मौत के पहले दिया गया बयान. इस धारा में ऐसे बयान का बहुत बड़ा रोल होता है."

बीबीसी मराठी के संवाददाता मयंक भागवत के मुताबिक़ रायगढ़ पुलिस ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि अन्वय नाइक के सुसाइड नोट को ''डाइंग डिक्लेरेशन' मान कर उन्होंने कार्रवाई की है.

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क्या सुसाइड नोट 'डाइंग डिक्लेरेशन' माना जाता है?

इस सवाल के जवाब में एडवोकेट दीपक आनंद कहते हैं, "सेक्शन 32 ऑफ़ इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत सुसाइड नोट को 'डाइंग डिक्लेरेशन' माना जाता है. लेकिन उसमें भी कुछ किंतु परंतु हैं. मरने वाले की स्थिति क्या थी, किस हालत में था, सुसाइड नोट में उसने क्या लिखा, जिसका नाम लिखा है उसके पीछे की वजह कितनी वाजिब है, क्या ख़ुदकुशी ही आख़िरी रास्ता बच गया था, सुसाइड नोट के कंटेंट में क्या है? ऐसे तमाम पहलुओं पर जाँच के दौरान ध्यान देने की ज़रूरत होती है."

दीपक आनंद कहते हैं, "अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी मामले में भी ये जानना ज़रूरी है कि सुसाइड नोट में क्या लिखा गया है? इसके साथ ही ये जानना भी ज़रूरी होगा कि अगर अन्वय नाइक को उनके काम के बक़ाया पैसे नहीं मिले, तो पैसों की रिकवरी के लिए उन्होंने कौन सा रास्ता अपनाया?"

वो आगे कहते हैं, "ऐसे केस में क़ानून आपको रिकवरी केस फ़ाइल करने की इजाज़त देता है. अन्वय नाइक ने इस मामले में ऐसा किया या नहीं, इसकी जानकारी मुझे नहीं है. रिकवरी केस अगर फ़ाइल हुआ था, तो उन्हें क्या परेशानी आई, ये मुझे नहीं पता. इन सवालों के जवाब भी पुलिस को अपनी जाँच में तलाशने होंगे."

"पुलिस को जाँच में ये भी साबित करना होगा कि अर्नब ने किस तरह उन्हें प्रताड़ित किया? डराया, धमकाया, गुंडे भेजे, क्या-क्या किया? क्या अन्वय को अर्नब ने इस क़दर प्रताड़ित किया कि ख़ुदकुशी ही अंतिम रास्ता बचा था. इसके बारे में ज्यादा बातें अभी हमें नहीं मालूम है. पुलिस को जाँच में कोर्ट के सामने ये सभी बातें विस्तार से रखनी होगी. अर्नब गोस्वामी को इस मामले में सज़ा तभी हो सकती है, जब इन सवालों के जवाब और सबूत जाँच में पुख़्ता तौर पर मिल जाएँ "

अर्नब गोस्वामी

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बंद मामले की दोबारा तफ़्तीश कैसे?

अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी मामले में एक और बात अहमियत रखती है.

अन्वय नाइक ख़ुदकुशी मामले की जाँच पहले एक बार हो चुकी है, जिसके बाद 2019 में रायगढ़ पुलिस ने इस मामले को बंद कर दिया था. इस पूरे मामले में मजिस्ट्रेट ने पुलिस की 2019 की रिपोर्ट को स्वीकार भी कर लिया था.

ऐसे बंद पड़े मामले में पुलिस को अगर कोई नए सबूत मिलते हैं, तो क़ानून कहता है कि पुलिस को कोर्ट में जाकर उस मामले की दोबारा से जाँच करने की इजाज़त लेनी पड़ेगी. अनुमति मिलने पर ही दोबारा जाँच शुरू की जा सकती है.

बुधवार को अलीबाग़ के ज़िला न्यायालय में बहस के दौरान ये सवाल पुलिस से पूछा गया.

बीबीसी मराठी संवाददाता मयंक भागवत के मुताब़िक, "कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पहली वाली जाँच को बंद करने की रिपोर्ट कोर्ट ने स्वीकार कर ली थी. ऐसे में पुलिस ने कोर्ट से दोबारा जाँच करने की माँग नहीं की, पिछली रिपोर्ट को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी गई है. सिर्फ़ एक पत्र लिखकर कोर्ट को जाँच करने के आदेश से बारे में अवगत कराया गया था."

रायगढ़ पुलिस ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 15 अक्तूबर को इस बारे में कोर्ट को चिट्ठी लिख कर अवगत कराया था.

दीपक आनंद के मुताबिक़ अन्वय नाइक ख़ुदकुशी मामले में दोबारा जाँच शुरू करने की कोर्ट की इजाज़त नहीं होने पर पूरे केस की बुनियाद ही ग़लत साबित हो सकती है. जाँच का ये पहलू इसलिए सबसे अहम हो जाता है.

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