पश्चिम बंगाल: कोरोना की वजह से दुर्गा पूजा फीकी, लेकिन चटख़ हुए सियासत के रंग

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े त्योहार दुर्गा पूजा पर इस साल कोरोना और लॉकडाउन की मार साफ़ नज़र आ रही है.
इसकी वजह से जहां पूजा पंडालों की भव्यता और बजट में कटौती हुई है, वहीं अबकी इस आयोजन पर कई नियम-शर्तें भी लागू की गई हैं.
कई जगह प्रवासी मज़दूरों को दुर्गा के रूप में सजाया गया है.
कुछ पंडालों ने कोरोना की वजह से बाहरी लोगों के पंडाल में प्रवेश की अनुमति देने से मना कर दिया है.
इस बीच, कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर अपने फ़ैसले में कोरोना के बढ़ते संक्रमण को ध्यान में रखते हुए तमाम पूजा पंडालों को आम लोगों के लिए नो इंट्री ज़ोन घोषित कर दिया.
पंडालों में सिर्फ़ आयोजक ही जा सकेंगे. छोटे पंडालों में उनकी संख्या 15 और बड़े पंडालों में 25 तक ही सीमित रहेगी. अदालत ने सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन के लिए राज्य सरकार की खिंचाई भी की है.

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लेकिन इससे पूजा के मुद्दे पर होने वाली सिसायत पर कोई असर नहीं पड़ा है. यह कम होने की बजाय उल्टे और तेज़ होने लगी है. आख़िर अगले साल होने वाले अहम विधानसभा चुनावों से पहले सत्ता के प्रमुख दावेदारों को जनसंपर्क का इससे बेहतर मौक़ा भला कहां मिलेगा.
यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तो हर साल की तरह इस साल भी डिजिटल मोड में ही सही, थोक में पूजा पंडालों के उद्घाटन में जुटी हैं. दूसरी ओर, राजनीति के मैदान में उसे कड़ी चुनौती देने वाली भाजपा भी इस बार पूजा के बहाने अपनी सियासत चमकाने के लिए कमर कस कर मैदान में कूद पड़ी है. पार्टी पहली बार यहां दुर्गापूजा का आयोजन कर रही है.
मोदी करेंगे पूजा पंडाल का वर्चुअल उद्घाटन

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बंगाल के इतिहास में यह संभवतः पहला मौक़ा है जब कोई पार्टी सीधे किसी पूजा का आयोजन कर रही है. इस पूजा का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल तरीक़े से करेंगे. यही नहीं, वे उस दिन यानी 22 अक्टूबर को राज्य के लोगों से पूजा की बात भी करेंगे. इसके अलावा प्रधानमंत्री के हाथों राज्य में कम से कम दस और पूजा पंडालों के उद्घाटन की भी योजना है. इनमें से पाँच कोलकाता और आस-पास ही हैं.
यानी संकेत साफ़ है. तृणमूल कांग्रेस से मुक़ाबले के लिए भाजपा भी अबकी पूजा के बहाने अपनी राजनीति चमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी पूजा के मौक़े पर कोलकाता के दौरे पर आना था. बीते साल उन्होंने एक पूजा पंडाल का उद्घाटन भी किया था. लेकिन उनकी बजाय अब पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा सोमवार को उत्तर बंगाल इलाक़ो का दौरा कर पार्टी की चुनावी तैयारियों का जायज़ा ले चुके हैं.
बंगाल की पूजा तो पहले भी सियासत का औज़ार रही है. लेकिन अबकी इसमें सियासत के रंग कुछ ज्यादा ही घुलते नज़र आ रहे हैं. कोविड के ख़तरे के बावजूद भाजपा अबकी इस हथियार का अपने हित में इस्तेमाल करने की रणीनीति के साथ मैदान में उतरी है. पार्टी इस साल भी पंडालों में सदस्यता अभियान चलाएगी और केंद्र सरकार की नीतियों और उपलब्धियो के प्रचार-प्रसार के लिए जगह-जगह स्टॉल लगाएगी.
पूजा समितियों पर दीदी यानी ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व में सेंध लगाने के लिए भाजपा पहली बार कोलकाता के साल्टलेक इलाक़े में अपनी पूजा आयोजित कर रही है. इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री करेंगे और साथ ही वे पूजा की बात भी करेंगे. इसका आयोजन केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर परिसर में किया जाएगा ताकि इसमें राज्य सरकार कोई रोड़ा नहीं अटका सके. अब तक तमाम पूजा समितियों में राजनेतों की भरमार तो रही है लेकिन किसी राजनीति पार्टी की ओर से पूजा का यह पहला मौक़ा होगा.

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भाजपा की प्रदेश महासचिव लॉकेट चटर्जी इस पूजा समिति की प्रमुख हैं. लॉकेट बताती हैं, "कई लोग अपने घरों में पूजा आयोजित करते रहे हैं. उसी तरह यह भाजपा परिवार की पूजा होगी."
दरअसल, भाजपा का यह आयोजन राज्य के लोगों को यह संदेश देने की कोशिश है कि वह बंगाली-विरोधी पार्टी नहीं है. ममता अक्सर उस पर ग़ैर-बंगालियों की पार्टी होने के आरोप लगाती रही हैं. भाजपा के एक नेता बताते हैं, कई आयोजक पार्टी के नेताओं को आयोजन समिति में शामिल करना चाहते थे. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के विरोध की वजह से वे ऐसा नहीं कर सके.
दूसरी ओर, भाजपा की इस रणनीति की काट के लिए ममता पहली बार डिजिटल तरीक़े से उत्तर बंगाल में होने वाली पूजा पंडालों का भी उद्घाटन कर रही हैं. अब तक वे 70 से ज्यादा पंडालों का उद्घाटन कर चुकी हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता आरोप लगाते हैं, "भाजपा पूजा का इस्तेमाल धर्म के आधार पर वोटरों के धुव्रीकरण के लिए कर रही है."
ममता बनर्जी ने की आर्थिक मदद

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अगले विधानसभा चुनावों से पहले होने वाली इस दुर्गा पूजा में अपनी सियासी ज़मीन मज़बूत करने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आयोजन समितियों को कई तरह की छूट दी है. इनमें क़रीब 3700 आयोजन समितियों को 50-50 हज़ार रुपए के आर्थिक अनुदान के अलावा उनको बिजली में 50 फ़ीसद छूट के और फ़ायरब्रिगेड की सुविधा मुफ़्त देने का एलान किया गया है.
इसके साथ ही इस साल नगरपालिका या ग्राम पंचायतें आयोजन समितियों से कोई टैक्स भी नहीं लेंगी. बंगाल में पूजा के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की भी परंपरा रही है. पहले तो सरकार ने इस पर रोक लगा दी थी. लेकिन अब ममता ने इसकी अनुमति दे दी है. बस शर्त यह है कि इनका आयोजन पूजा पंडालों से दूर करना होगा. लेकिन ऐसे कार्यक्रमों में दो सो लौग शामिल हो सकेंगे.

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बंगाल में वाममोर्चा सरकार के 34 वर्षों के शासनकाल में दुर्गापूजा राजनीति से काफ़ी हद तक परे थी. पूजा में वामपंथी नेता सक्रिय हिस्सेदारी से दूर रहते थे. हां, आयोजन समितियों में सुभाष चक्रवर्ती जैसे कुछ नेता ज़रूर शामिल थे. लेकिन उनका मक़सद चंदा और विज्ञापन दिलाना ही था.
दुर्गा पूजा में सीपीएम भले प्रत्यक्ष रूप से कभी शामिल नहीं रही, लेकिन इस त्योहार के दौरान वह भी हज़ारों की तादाद में स्टॉल लगाकर पार्टी की नीतियों और उसकी अगुवाई वाली सरकार की उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करती थी. वैसे, पार्टी के पैरों तले की ज़मीन लगातार खिसकते देख कर शीर्ष नेतृत्व ने वर्ष 2017 में नेताओं को उद्घाटन समारोह में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी थी.
वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस के भारी बहुमत के साथ जीत कर सत्ता में आने के बाद इस त्योहार पर सियासत का रंग चढ़ने लगा. धीरे-धीरे महानगर समेत राज्य की तमाम प्रमुख आयोजन समितियों पर तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता क़ाबिज़ हो गए. अब हालत यह है कि करोड़ों के बजट वाली ऐसी कोई पूजा समिति नहीं है जिसमें अध्यक्ष या संरक्षक के तौर पर पार्टी का कोई बड़ा नेता या मंत्री न हो.
इतिहास और संस्कृति का हिस्सा

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तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "हमारे लिए दुर्गा पूजा बांग्ला संस्कृति, विरासत और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है. पार्टी इसे उत्सव के तौर पर मनाती है. लेकिन भाजपा धर्म के नाम पर आम लोगों को बांटने का प्रयास कर रही है."
दूसरी ओर, भाजपा भी अब अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दुर्गा पूजा का ठीक उसी तरह इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है जैसा तृणमूल ने सत्ता में आने के बाद किया था.
प्रदेश भाजपा के नेता प्रताप बनर्जी कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस के लोग पूजा समितियों में दूसरे राजनीतिक दलों के लोगों को शामिल नहीं होने देते. इसकी वजह सियासी भी है और वित्तीय भी. बावजूद इसके कई पूजा समितियों ने बीते साल भाजपा के शीर्ष नेताओं को पंडालों के उद्घाटन का न्योता दिया था."
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता जिष्णु बसु कहते हैं, "दुर्गापूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है. ऐसे में पार्टी ख़ुद को इससे दूर कैसे रख सकती है?''
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ख़ुद कोलकाता की प्रमुख आयोजन समिति एकडालिया एवरग्रीन के अध्यक्ष हैं. उनका आरोप है, "तृणमूल कांग्रेस दुर्गा पूजा के नाम पर राजनीति नहीं करती. लेकिन भाजपा ने अब धर्म और दुर्गा पूजा के नाम पर सियासत शुरू कर दी है."
माहौल के दूषित होने का ख़तरा- सीपीएम

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लेकिन दूसरी ओर, भाजपा ने उल्टे तृणमूल पर पूजा को सियासी रंग में रंगने का आरोप लगाया है.
प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस ने ही इस उत्सव को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बदल दिया है."
उनका कहना है कि ममता बनर्जी के सत्ता में आने से पहले तक दुर्गा पूजा महज़ एक धार्मिक और सामाजिक उत्सव था. लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे एक राजनीतिक मंच में बदल दिया है.
वाममोर्चा ने पूजा के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि दोनों दल इस धार्मिक त्योहार को अपने सियासी हित में भुनाने का प्रयास कर रहे हैं.
सीपीएम के वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "बीते कोई एक दशक से पूजा सियासत के हथियार में बदल गई है. लेकिन अब राज्य में भाजपा की पैठ बढ़ने के बाद इस मुद्दे पर सियासत अचानक तेज़ होने लगी है. सांप्रदायिक सद्भाव वाले इस त्योहार का इस्तेमाल समाज में धुव्रीकरण तेज़ करने के लिए करना किसी भी हालत में उचित नहीं है. इससे सामाजिक दूरियां बढ़ेंगी और सद्भाव का माहौल दूषित होने का ख़तरा है."
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