प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह सालों में सिर्फ़ 22 बार संसद में बोले- प्रेस रिव्यू

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नरेंद्र मोदी के दौर में क्या संसद राष्ट्र के मुद्दों पर बहस की जगह नहीं रह गई है? अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक कॉलम के अनुसार पिछले छह साल में मोदी ने संसद में केवल 22 बार बोला है.

क्रिस्टॉफ़ ज़ाफ़रलू और विहांग जुमले की संयुक्त बाइलाइन से छपे एक लेख में कहा गया है कि मोदी सरकार संसद को नज़रअंदाज़ कर रही है.

लेख के अनुसार एचडी देवगौड़ा जो सिर्फ़ क़रीब दो साल के लिए प्रधानमंत्री थे, उन्होंने भी संसद में मोदी से ज़्यादा बार बोला था.

बीजेपी के ही अटल बिहारी वाजपेयी ने भी छह सालों में 77 बार संसद को संबोधित किया था जबकि दस सालों तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने 48 बार संसद में अपनी बात रखी थी.

मोदी

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लेख के अनुसार मोदी संसद के बजाय सीधे लोगों से संवाद करने में विश्वास रखते हैं चाहे वो रेडियो के ज़रिए 'मन की बात' हो या फिर सोशल मीडिया के ज़रिए सीधे लोगों से जुड़ना.

लेकिन संदेश देने के इन दोनों ही तरीक़ों में एक चीज़ समान है, और वो यह कि मोदी एकतरफ़ा संदेश देने में यक़ीन रखते हैं जिसमें सुनने वाला उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता.

लेख में कहा गया है कि संसद को नज़रअंदाज़ कर मोदी सरकार अध्यादेश का रास्ता अपनाती है. मनमोहन सरकार में जहां औसतन साल में छह अध्यादेश आते थे, मोदी दौर में एक साल में औसतन 11 अध्यादेश लाए गए हैं. संसदीय समिति में भी बिल भेजने की रवायत कम हो गई है.

सास-ससुर के मकान में भी बहू को रहने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि घरेलू हिंसा की शिकार बहू को अपने सास-ससुर के घर में रहने का अधिकार है.

अख़बार दैनिक जागरण में छपी ख़बर के अनुसार, न्यायाधीश अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने तरुण बत्रा मामले में यह फ़ैसला दिया.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि परिवार की साझा संपत्ति और रिहायशी घर में भी घरेलू हिंसा की शिकार पत्नी को हक़ मिलेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत दिए अपने फ़ैसले में साफ़ कहा है कि घरेलू हिंसा की शिकार पत्नी को अपने ससुराल की पैतृक और साझा संपत्ति यानी घर में रहने का क़ानूनी अधिकार होगा. साथ ही पति की अर्जित की हुई संपत्ति यानी अलग से बनाए हुए घर पर तो अधिकार होगा ही.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में घरेलू हिंसा क़ानून 2005 का हवाला देते हुए कई बातें स्पष्ट की हैं.

घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण क़ानून 2005 पर विस्तार से चर्चा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा, "किसी भी समाज की प्रगति महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने और उसे बढ़ावा देने की क्षमता पर निर्भर करती है. संविधान द्वारा महिलाओं को समान अधिकार और विशेषाधिकार की गारंटी देना देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने की तरफ़ बढ़ाया गया क़दम था."

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने क़ानून के तहत साझा घर की परिभाषा की व्याख्या वाले पहले के फ़ैसले को ग़लत क़ानून क़रार दिया और इसे दरकिनार कर दिया.

पीठ ने अपने 151 पन्ने के फ़ैसले में कहा, अनुच्छेद 2 (एस) के तहत साझा घर की परिभाषा केवल यही नहीं है कि वह घर जो संयुक्त परिवार का घर हो जिसमें पति भी एक सदस्य है या जिसमें पीड़ित महिला के पति का हिस्सा है.

कोर्ट ने कहा कि साझा घर वह स्थान है जहां महिला रहती है या घरेलू संबंध में अकेले अथवा पति के साथ कभी रही हो और इसमें वह घर भी शामिल है जिस पर मालिकाना हक़ है या जो किराए पर दिया गया है.

क्या है मामला?

पीठ ने यह फ़ैसला साल 2016 के एसआर बत्रा और अन्य बनाम तरुण बत्रा के मामले की सुनवाई करते हुए सुनाया. पति-पत्नी में विवाद हुआ और फिर तलाक़ के नोटिस तक बात पहुँच गई. इस बीच बहू ने घरेलू हिंसा का केस कर दिया और उस घर से निकलने से इनकार कर दिया.

ससुर सतीश चंदर आहूजा ने अदालत में कहा कि यह संपत्ति उनकी है और इस पर न तो उनके बेटे का हक़ है और न ही उनकी पुत्रवधू का. इसके बाद निचली अदालत ने महिला को परिसर खाली करने के आदेश दिए थे.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2019 में निचली अदालत के फ़ैसले को दरकिनार कर दिया जिसमें आहूजा की पुत्रवधू को उनका परिसर ख़ाली करने का आदेश दिया गया था.

दिल्ली उच्च न्यायालय के फ़ैसले को आहूजा ने चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखा है.

दिल्ली में हवा की गुणवत्ता बीते आठ महीने के सबसे निचले स्तर पर

दिल्ली में वायु प्रदूषण

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द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, राजधानी दिल्ली की वायु गुणवत्ता आठ महीने के निचले स्तर पर पहुँच गई है. गुरुवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 312 दर्ज किया गया.

पिछली बार इस तरह के ख़राब स्तर पर वायु गुणवत्ता 12 फ़रवरी को पहुँची थी जब एक्यूआई 320 दर्ज किया गया था.

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की दिल्ली के लिए वायु गुणवत्ता प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और पाकिस्तान के नज़दीकी क्षेत्रों में खेतों में पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि भी देखी गई है लेकिन इसका राजधानी में वायु गुणवत्ता पर प्रभाव कम था.

बता दें कि 0 और 50 के बीच एक्यूआई को 'अच्छा', 51 और 100 के बीच 'संतोषजनक', 101 और 200 के बीच 'मध्यम', 201 और 300 के बीच 'ख़राब', 301 और 400 के बीच 'बहुत ख़राब' और 401 और 500 के बीच 'गंभीर' माना जाता है.

भारतीय मौसम विभाग में वरिष्ठ वैज्ञानिक वीके सोनी ने कहा कि वायु गुणवत्ता में गिरावट के लिए हवा की कम गति को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है जिसके कारण प्रदूषक जमा हो जाते हैं.

हाईकोर्ट को हाथरस जाँच की निगरानी के लिए कह सकता है सुप्रीम कोर्ट

हाथरस

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अख़बार द हिंदू के अनुसार सुप्रीम कोर्ट हाथरस मामले की जाँच की निगरानी के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को कह सकता है. अख़बार के अनुसार, गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने ऐसे संकेत दिए.

रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने जब अदालत से कहा कि वो चाहते हैं कि सर्वोच्च अदालत इस मामले की निगरानी करे तब मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा कि "हमलोग आप सभी को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज रहे हैं."

अदालत ने गुरुवार को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है. जस्टिस बोबडे ने सिर्फ़ ज़ुबानी यह बात कही कि ''अंतिम सुपरवाइज़र की हैसियत से तो हमलोग यहां हैं ही, फ़िलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह काम करने दिया जाए.''

यूपी के हाथरस में 14 सितंबर को 19 साल की एक दलित युवती के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया गया. ज़ख़्मी हालत में पहले उसे अलीगढ़ अस्पताल लाया गया. हालत बिगड़ने के बाद युवती को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल लाया गया लेकिन वहां 29 सितंबर को उसकी मौत हो गई.

हालांकि यूपी पुलिस रेप की बात से इनकार करती रही है. फ़िलहाल सीबीआई इसकी जाँच कर रही है लेकिन याचिकाकर्ता चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में मामले की जाँच हो.

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