कोरोना महामारी को और ख़तरनाक बनाएगा पराली का धुआं?

पराली जलाना

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पराली जलाए जाने के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिकाओं और अर्ज़ियों पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली, हरियाणा, यूपी और पंजाब सरकार को जवाब दाख़िल करने के लिए कहा है.

तीन जजों की खंडपीठ की अध्यक्षता कर रहे मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे का कहना था, "ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, नहीं तो हवा बहुत ख़राब हो जाएगी." इस मामले पर अगली सुनवाई 16 अक्तूबर को होगी.

इससे पहले राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को 'युद्ध प्रदूषण के विरुद्ध' कैंपेन की शुरुआत की और सरकार की तरफ़ से लिए जाने वाले तमाम क़दमों की घोषणा की.

उनका कहना था कि कोरोना महामारी को देखते हुए प्रदूषित हवा जानलेवा हो सकती है.

केजरीवाल ने बताया कि शहर के 13 प्रदूषित क्षेत्रों से हर एक के लिए अलग योजना बनाई गई है और सभी उपायों की निगरानी के लिए वॉर रूम भी बनाया गया है.

वीडियो कैप्शन, ठंड और पराली का धुआं, कोरोना वायरस को और ख़तरनाक बनाएगा?

दिल्ली सरकार की कोशिश

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, "हर साल हम पराली की समस्या से जुझते हैं और इससे निपटने के लिए सभी, आस-पास की सरकारें और केंद्र सरकार भी कोशिश कर रही हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने एक सस्ता और सरल उपाय ढूंढ़ा है. उन्होंने एक घोल तैयार किया है. अगर आप इस घोल का छिड़काव पराली पर करें तो इससे उसका डंठल गल जाता है और वो खाद में तबदील हो जाता है. इस बार दिल्ली में राज्य सरकार घोल बनवाएंगीं और जहां पराली होगी वहां छिड़काव करवाएंगी. अगर ये प्रयोग दिल्ली में सफल रहा तो दूसरे राज्यों को भी इस बारे में बताएंगे और इससे शायद निजात मिल पाए."

शोधकर्ताओं का कहना है कि पराली जलाने से कॉर्बनडाइऑक्साइड, पीएम10, पीएम2.5 और अन्य गैस हवा में घुल जाती हैं. ये गैस और कण इंसान की सेहत के लिए ख़तरनाक होते हैं.

किसान विरोध

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पिछले साल ही पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सरकारी एजेंसी 'सफर' ने पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से निकले धुएं की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत बताई थी. साथ ही एजेंसी ने यह कहा था कि निचले स्तर पर हवा की गति, धूल उड़ना और कम आर्द्रता जैसे कारण भी हैं जिससे हालात प्रतिकूल हो गए हैं.

वहीं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर काम कर रहे पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया था और निर्माण गतिविधियों पर नवंबर महीने के पहले हफ़्ते तक के लिए रोक लगाई थी.

प्राधिकरण ने कार्यान्वयन एजेंसियों को पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए तत्काल सख़्त क़दम उठाने के लिए भी कहा था.

वीडियो कैप्शन, क्या वायु प्रदूषण से कैंसर हो सकता है?

किसान क्यों जलाते है पराली?

पर्यावरण के क्षेत्र से जुड़ी संस्था सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में काम कर रही शांभवी शुक्ला बताती हैं कि दिल्ली में स्मॉग साल 2016 से दिखना शुरू हुआ था और इसी दौरान पराली जलाने की घटनाओं में तेज़ी आ गई थी.

पंजाब में कृषि और किसानों के वेलफ़ेयर विभाग के पूर्व निदेशक डॉक्टर मंगल सिंह संधू और शांभवी शुक्ला दोनों का ही मानना है कि किसानों के लिए पराली जलाना सबसे आसान और सस्ता तरीक़ा होता है जबकि इससे ज़मीन की उर्वरकता कम हो जाती है.

डॉक्टर मंगल सिंह संधू जो कि ख़ुद एक किसान भी हैं, वे पराली जलाने को बिल्कुल ग़लत बताते हैं, पर वे ये भी कहतें हैं कि इस मामले को व्यवाहारिक होकर भी सोचना चाहिए.

मंगल सिंह संधू
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उनके अनुसार, "पंजाब में छोटे और मझौले किसान 65-70 फ़ीसद हैं. वे आर्थिक तौर पर इतने सक्षम नहीं होते कि पराली को हटाने के लिए ज़्यादा शक्तिशाली ट्रैक्टर या मशीन ख़रीद सकें. पंजाब में क़रीब 31 लाख हैक्टर ज़मीन पर धान की खेती होती है और इससे 201 से पाँच लाख मिट्रीक टन पराली पैदा होती है. ऐसे में मशीनों से केवल 20 से 25 फ़ीसद ही पराली का प्रबंधन हो सकता है."

"हालांकि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ़ से सब्सिडी दी गई है. हमने ऐसी मशीनों के लिए 80 फ़ीसद सब्सिडी भी दी थी जिसके तहत 2018-19 में 28000 से उपर मशीने भी दी गईं, जिसमें हेपी सीडर, श्रब कटर कम स्प्ररेसर, चौपर, श्रेडर आदि थे. यही सुविधा हरियाणा और यूपी में भी दी गई लेकिन उनके पास मशीनों की संख्या पंजाब से कम है. ये उपाय कारगार तो साबित हुए हैं लेकिन काफ़ी नहीं है."

वीडियो कैप्शन, एक कैप्सूल जिससे पराली को खाद में बदलने का दावा किया जा रहा है

प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगेगा

पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार पराली जलाने वाले लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कराने के आदेश भी दे चुकी हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार ने कई क़दम उठाए हैं, सब्सिडी भी दे रही है लेकिन उसे और बढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

साथ ही किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुक़सान के बारे में और जागरूक किए जाने की ज़रूरत है. क्योंकि किसान अक्तूबर के महीने पराली जलाना शुरू करते हैं हालांकि इसका असर अभी कम है लेकिन नवंबर के पहले हफ़्ते में जब इसमें तेज़ी आएगी तो प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगेगा. नासा से आई इमेज भी देखें तो 'फ़ायर टॉउन' है वो बढ़ते ही जा रहे हैं.

शांभवी शुक्ला बताती हैं, "शायद बड़े किसानों को पता हो कि पराली जलाने से हवा दूषित होती है लेकिन छोटे किसान शायद अब भी इस बारे में कम जानते हैं. पराली को ख़त्म करने के लिए दो तरह के सुझाव दिए जाते हैं. एक होता है कि जहां भी पराली हुई है उसे वहीं उखाड़ के ट्रीट किया जाए, लेकिन ये भी मशीन के ज़रिए होता है. ऐसे में ये छोटे किसान सब्सिडी मिलने के बावजूद इसे ख़रीद नहीं पाते. और दूसरा होता है पराली को काट के ले जाना और उसको कहीं और ट्रीट करना. और इसके ज़रिए बिजली भी बनाई जा रही है लेकिन ये भी इतने बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रहा है. इसके लिए उन्हें जागरूक करने के साथ प्रशिक्षण, सब्सिडी बढ़ाने, मशीनरी देकर सहायता की जानी चाहिए."

वीडियो कैप्शन, कोरोनावायरस: किसानों पर लॉकडाउन की मार

सरकार के क़दम

डॉक्टर मंगल सिंह संधू भी मानते हैं कि पराली जला कर ऊर्जा पैदा की जा सकती है लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद अभी वैसा प्रबंधन नहीं हो पा रहा है.

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की अध्यक्षता में चार राज्यों के पर्यावरण मंत्रियों की बैठक हुई थी. इस बैठक में अभी तक की कोशिशों के साथ आगे के रोडमैप पर भी चर्चा की गई थी. इसमें ये कहा गया था कि साल 2016 के मुक़ाबले हवा ज़्यादा साफ़ हुई है साथ ही दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर-प्रदेश में हॉटस्पॉट चिन्हित किए गए जहां प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है.

केंद्र सरकार के अनुसार पराली से निपटने से जुड़ी मशीनरी पर पिछले तीन सालों में वे 1700 करोड़ रुपये ख़र्च कर चुकी है. और वह पराली प्रबंधन के लिए दिए जाने वाले कृषि उपकरणों पर किसान को व्यक्तिगत रूप से 50 फ़ीसद और किसानों के समूह को 80 फ़ीसद तक की सब्सिडी देती है.

साथ ही इस बैठक में ये भी कहा गया था कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का कैप्सूल पराली को खाद बनाने में सक्षम है उसे प्रयोग के तौर पर राज्य को भी दिया जा रहा है. साथ ही वाहनों से निकलने वाले धूएं, और भठ्ठों और अन्य कारख़ानों से उत्सर्जन पर नियंत्रण पाने के लिए इस बैठक में उपाए सुझाए गए हैं.

वायु प्रदूषण

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कोविड के दौरान प्रदूषण का असर

डॉ मंगल सिंह संधू कहते हैं कि जिस घोल या कैप्सूल की सरकार बात कर रही है ये किसानों के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकता है. लेकिन पहले ये देखना होगा कि ये कितना कारगर होगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 की जब शुरुआत हुई थी तो एहतियाती क़दम उठाते हुए सभी गतिविधियां रोक लगा दी गई थी. हवा साफ़ हो रही थी लेकिन अब जब देश में आर्थिक कामकाज बढ़ रहे हैं तो उसका असर हवा पर पड़ेगा. ऐसे में कोविड के दौरान अब जब मौसम में ठंडक आने लगी, फ़ैक्ट्रियां चालू हो गई हैं, सड़कों पर वाहन चलने लगे हैं और साथ में पराली जलने की गतिविधियां भी होने लगी हैं तो ऐसे में प्रदूषण जानलेवा हो सकता है. वो भी तब जब कोविड से लड़ाई जारी है और दिवाली का त्यौहार भी आने वाला है.

शांभवी शुक्ला बताती हैं कि अब एयर क्वॉलिटी इंडेक्स मॉडरेट के आख़िरी लाइन पर आ गया है और वो बहुत जल्द ख़राब और बहुत ख़राब स्थिति में जा सकता है.

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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स के पल्मनेरी विभाग के प्रमुख डॉक्टर अनंत मोहन कहते हैं कि जिन भी चीज़ों से प्रदूषण बढ़ रहा है उसे आपात स्थिति समझकर ख़त्म करना होगा क्योंकि ये बढ़ ही रहा है.

वे बताते है, "कोविड-19 से फेफड़ों पर असर पड़ता है, उससे निमोनिया हो जाता है. ऐसे में जो दमा या छाती की बीमारी के मरीज़ हैं उनके लिए मुश्किल बढ़ सकती है. बच्चे, बुज़ूर्ग और गर्भवती महिलाओं को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. ऐसे में प्रदूषण बढ़ेगा तो काफ़ा हानिकारक हो सकता है."

डॉ अनंत मोहन सलाह देते हैं कि हालांकि ये अस्थायी हल है लेकिन बाहर मास्क लगा कर ही निकलें. हवा की गुणवत्ता जब ख़राब हो तो बाहर न निकलें ख़ासकर सुबह की हवा ज़्यादा प्रदूषित होती है तो सैर करने न जाएं और बच्चों को भी बाहर न निकाले. बच्चों को ऐसे समय में खेलने बाहर न जाने दें क्योंकि भागते-दौड़ते वक़्त सांस की रफ़तार तेज़ होती है और उस समय प्रदूषित हवा अंदर जाती है और बच्चों के अंग विकसित हो रहे होते हैं तो आगे जाकर उन्हें स्वास्थ्य संबंधी दिक़्क़तें आ सकती हैं.

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