उद्धव ठाकरे के नाम राज्यपाल कोश्यारी की चिट्ठी पर उठे संवैधानिक सवाल

भगत सिंह कोश्यारी

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    • Author, मयंक भागवत
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

राज्यपाल एक संवैधानिक पद है. सरकार भारतीय संविधान के मुताबिक़ काम कर रही है या नहीं, ये देखना राज्यपाल का काम है. लेकिन महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी राज्य में मंदिर खुलने पर हो रही देरी पर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं.

दरअसल उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक तंज़ भरी चिट्ठी भेजी थी.

इस चिट्ठी में उन्होंने लिखा था, "ये विडंबना ही है कि राज्य में बार और रेस्तरां खुल गए हैं लेकिन मंदिर अब भी बंद पड़े हैं. कभी हिंदुत्व का कट्टर समर्थन करने वाले आप क्या अचानक सेक्युलर हो गए हैं?"

कोश्यारी ने चिट्ठी में लिखा, "मुख्‍यमंत्री बनने के बाद अयोध्‍या जाकर आपने श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा को सार्वजनिक किया. आप अषाढ़ी एकादशी को पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर गए और पूजा की. लेकिन मुझे हैरानी है कि क्‍या धर्मस्‍थलों का खोलना टलता जाएगा... क्‍या आपको ऐसा कोई देव आदेश मिला है या फिर आप अचानक 'सेक्‍युलर' हो गए हैं, जिस शब्‍द से आपको कभी नफ़रत थी."

भगत सिंह कोश्यारी ने लिखा, "यह दुर्भाग्य है कि लॉकडाउन हटने के चार महीने बाद भी आपने एक बार फिर पूजा स्थलों पर पाबंदी बढ़ा दी है. यह विडंबना है कि एक तरफ़ सरकार ने बार, रेस्तरां और बीच खोल दिए हैं और दूसरी तरफ़ देवी-देवता लॉकडाउन में रहने को अभिशप्त हैं."

उद्धव ठाकरे और भगत सिंह कोश्यारी

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'संविधान का पालन करने के लिए तैयार नहीं राज्यपाल'

कोश्यारी की इस चिट्ठी और उनकी तंज़ भरी भाषा को लेकर महाराष्ट्र की सियासत में विवाद छिड़ गया है. एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने कहा है कि राज्यपाल की भाषा उनके पद के लिए उपयुक्त नहीं है.

उधर, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी कोश्यारी की चिट्ठी का जवाब भी तंज़ कसते हुए ही दिया. उन्होंने कहा, "जैसे अचानक से लॉकडाउन लगाना सही नहीं था वैसे ही इसे अचानक हटा देना भी सही नहीं होगा. हां, मैं हिंदुत्व का अनुसरण करता हूँ और मेरे हिंदुत्व को आपके प्रमाण की ज़रूरत नहीं है."

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कोश्यारी के जवाब में कहा कि महाराष्ट्र सरकार संविधान में बताए गए धर्मनिरपेक्षता शब्द के वास्तविक अर्थ को ध्यान में रखते हुए गंभीर है.

उन्होंने कहा, "सरकार कोविड-19 की स्थिति को ध्यान में रखते हुए फ़ैसले ले रही है. ऐसे में राज्यपाल की चिट्ठी साबित करती है कि वो संविधान का पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं."

भगत सिंह कोश्यारी

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सेक्युलर शब्द को लेकर विवाद कितना जायज़?

सेक्युलर या धर्मनिरपेक्ष शब्द भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही शामिल है. संविधान की प्रस्तावना में अब तक सिर्फ़ एक बार संशोधन हुआ है.

आपतकाल के बाद साल 1976 में संविधान में हुए 42 वें संशोधन के तहत इसमें 'धर्मनिरपेक्ष' और 'समाजवादी' शब्द जोड़े गए थे. भले ही सेक्युलर शब्द संविधान की प्रस्तावना में 1976 में जोड़ा गया हो लेकिन इसमें धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना शुरुआत से ही निहित थी.

भारत का संविधान देश के सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की आज़ादी का अधिकार देता है.

तो क्या किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल और ऐसे विचारों की अभिव्यक्ति जायज़ है? बीबीसी ने भारतीय संविधान के विशेषज्ञों और क़ानून के जानकारों से इस बारे में बात की.

दुर्गापूजा की तैयारी

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'राज्यपाल सेक्युलर शब्द का मतलब नहीं समझते'

संविधान विशेषज्ञ उल्हास बापट के अनुसार, मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्र से एक बात स्पष्ट है-उन्होंने सीमा रेखा पार कर दी है

उल्हास बापट कहते हैं, "गवर्नर शायद धर्मनिरपेक्ष शब्द का अर्थ नहीं समझते हैं, इसलिए उन्हें भ्रम हुआ. कोई व्यक्ति हिंदू, मुसलमान या किसी अन्य धर्म का अनुयायी हो सकता है लेकिन देश या राज्य का कोई धर्म नहीं रहो सकता."

"यह महाराष्ट्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्यपाल एक ख़ास पार्टी के एजेंडे का पालन करते हैं और उसी के मुताबिक व्यवहार करते हैं. राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री करता है. इसलिए उसे ख़ुश करने के लिए राज्यपाल कई बार राजनीतिक भूमिका अपना लेते हैं. कोरोना वायरस का कोई धर्म नहीं है इसलिए सरकार को जनता के हित में फ़ैसला लेना चाहिए. लेकिन हमारे यहाँ तो उल्टी गंगा ही बह रही है."

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क्या धर्मनिरपेक्षता बुरी चीज़ है?

संवैधानिक विशेषज्ञों ने मुख्यमंत्री को लिखी एक चिट्ठी में राज्यपाल की भाषा पर नाराज़गी जताई है. विशेषज्ञों के अनुसार धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का मूलभूत हिस्सा है. ऐसे में राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं?

हैदराबाद में नालसार लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान का एक अभिन्न अंग है. पूजा स्थलों पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं इसलिए वहां फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग का पालन करना बहुत मुश्किल होता है. हमने देखा है कि जिन देशों में पूजा स्थल खुले हैं वहाँ ये कोरोना संक्रमण में तेज़ी का कारण बना. इसलिए पूजा स्थल खोलने से पहले पूरे इंतज़ाम और एहतियात ज़रूरी हैं."

कोश्यारी ने अपनी चिट्ठी में 'दैवीय पूर्वाभास' शब्द का व्यंग्यपूर्ण इस्तेमाल किया था. इस बारे में मुस्तफ़ा कहते हैं, "संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल ठीक नहीं है. संविधान 'दैवीय टिप्पणियों' में यक़ीन नहीं करता."

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'राज्यपाल ने सीमा पार की'

पूर्व केंद्रीय गृह सचिव माधव गोडबोले ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "राज्यपाल के लिए इस तरह का पत्र लिखना ग़लत है. उन्होंने यह पत्र लिखकर अपनी सीमाएँ पार कर दी हैं. सरकार चलाना राज्यपाल का काम नहीं है. राज्य संविधान के मुताबिक़ काम कर रहे हैं या नहीं, ये देखना राज्यपाल का काम है."

लेकिन राज्यपाल जैसे व्यक्ति के लिए मुख्यमंत्री से 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द का इस्तेमाल करके स्पष्टीकरण मांगना कितना उचित है? क्या यह संविधान के दायरे में है?

इस सवाल के जवाब में गोडबोले ने कहा, "इसमें धर्मनिरपेक्षता या ग़ैर धर्मनिरपेक्षता का कोई मसला नहीं है. लेकिन राज्यपाल को अपनी चिट्ठी में सभी धर्मों के पूजास्थलों का ज़िक्र करना चाहिए था. उन्होंने सिर्फ़ मंदिरों की बात की."

इस्लाम

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'भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है'

महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता श्रीहरि एने ने इसे बारे में बीबीसी से कहा, "देश में कोई व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष हो सकता है या नहीं भी हो सकता. संविधान सबको यह अधिकार देता है कि वो किसी धर्म में यक़ीन करे या न करे. लेकिन, जैसा कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना बताती है, भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है.''

''अगर जैसा बताया जा रहा है, वैसा राज्यपाल ने सचमुच अपनी चिट्ठी में लिखा है तो मुझे हैरत है कि संवैधानिक रूप से राज्य का प्रमुख राज्यपाल, संवैधानिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री की धर्मनिरपेक्षता का पालन करने के लिए आलोचना करता है."

क्या संवैधानिक पद पर बैठा कोई व्यक्ति किसी ख़ास धर्म के बारे में बात कर सकता है?

इस बारे में श्रीहरि एने ने कहा, "राज्यपाल हिंदू धर्मस्थलों की बदहाली पर नाराज़गी जता सकते हैं. वो ये कह सकते हैं कि हिंदू और ग़ैर हिंदू पूजा स्थलों के बारे में समान फ़ैसले होने चाहिए. लेकिन राज्यपाल की चिट्ठी की टोन जैसी थी और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों का उन्होंने जिस तरह माखौल उड़ाया, उससे लगता नहीं कि वो हिंदू धर्मस्थलों की बदहाली को लेकर चिंतित थे."

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