हाथरस मामला: पीड़ित परिवार के नार्को टेस्ट के आदेश पर उठे सवाल

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

उत्तर प्रदेश के हाथरस में युवती के साथ कथित तौर पर गैंगरेप और फिर हत्या के बाद देश भर में जहाँ ग़ुस्सा है, वहीं इस मामले में पीड़ित पक्ष के नार्को टेस्ट के आदेश देने पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पीड़ित लड़की के परिजनों ने नार्को टेस्ट से इनकार किया है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक़ बिना उनकी सहमति से नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकता.

इस मामले में दो अक्तूबर को देर रात राज्य सरकार ने हाथरस के पुलिस अधीक्षक समेत कुछ अन्य पुलिस अधिकारियों को निलंबित करते हुए अभियुक्त और पीड़ित दोनों ही पक्षों के लोगों के नार्को टेस्ट कराने के निर्देश दिए थे. बाद में राज्य सरकार ने मामले की जाँच सीबीआई से भी कराने की सिफ़ारिश की थी.

लेकिन पीड़ित परिवार सरकार के इस निर्देश से हैरान है और वो सवाल पूछ रहा है कि "हमारा नार्को टेस्ट क्यों? क्या सरकार को लग रहा है कि हम झूठ बोल रहे हैं?"

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इस मामले की जाँच के लिए यूपी सरकार ने इससे पहले एसआईटी का गठन किया था. बताया जा रहा है कि एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर ही राज्य सरकार ने नार्को टेस्ट संबंधी निर्देश जारी किए हैं.

सवाल यह भी उठ रहे हैं कि पीड़ित पक्ष का नार्को टेस्ट कराना क्या क़ानूनन जायज़ है और कोर्ट की निगाह में इस टेस्ट की प्रामाणिकता कितनी स्वीकार्य है?

क़ानूनी पहलू

जहाँ तक नार्को टेस्ट के क़ानूनी पहलू का सवाल है, तो यह विवेचना का हिस्सा हो सकता है.

लेकिन इस बारे में 22 मई, 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था कि "अभियुक्त या फिर संबंधित व्यक्ति की सहमति से ही उसका नार्को एनालिसिस टेस्ट हो सकता है. किसी की इच्छा के ख़िलाफ़ न तो नार्को टेस्ट, न ही ब्रेन मैपिंग और न ही पॉलीग्राफ़ टेस्ट किया जा सकता है."

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि किसी व्यक्ति को इस तरह की प्रक्रिया से गुज़ारना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दख़लअंदाज़ी होगी. सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना था कि पॉलिग्राफ़ या नार्को जाँच के दौरान जाँच एजेंसियों को मानवाधिकार आयोग के दिशा निर्देशों का सख़्ती से पालन करना होगा.

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हाथरस में पीड़ित लड़की के परिजनों के नार्को टेस्ट संबंधी सरकार के निर्देश के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाख़िल की गई है. याचिकाकर्ता साकेत गोखले का कहना है कि राज्य सरकार का यह निर्णय न सिर्फ़ ग़ैर-क़ानूनी है, बल्कि हाईकोर्ट की ओर से इस मामले में लिए गए स्वत:संज्ञान के संदर्भ में 12 अक्तूबर को न्यायालय के समक्ष गवाही देने से पीड़ित परिवार को रोकने का प्रयास है.

याचिका में कहा गया है, "पीड़िता के परिवार का नार्को-एनालिसिस टेस्ट कराना प्राकृतिक न्याय के सभी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है, क्योंकि वे न तो मामले में अभियुक्त हैं और न ही किसी अपराध का आरोप उन पर लगाया गया है. एक पूछताछ तकनीक का पीड़ित के परिवार पर उपयोग करना ज़बरदस्ती का कठोर तरीक़ा है."

दो अक्तूबर को राज्य सरकार की ओर से जारी किए गए प्रेस नोट में लिखा गया था, "उपरोक्त के साथ-साथ सभी वादी/प्रतिवादी अंतर्ग्रस्त व्यक्तियों व पुलिस का पॉलीग्राफ़ व नार्को टेस्ट भी विवेचकों द्वारा कराए जाए."

इस बात पर न सिर्फ़ पीड़ित पक्ष ने ऐतराज़ जताया है बल्कि और लोग भी इसके औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं. क़ानूनी जानकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि जब बिना सहमति के नार्को टेस्ट हो नहीं सकता, तो सरकार ने इसके निर्देश कैसे दे दिए? क्या सरकार पीड़ित लड़की के परिजनों पर दबाव बनाकर उनका नार्को टेस्ट कराना चाहती है?

लंबे समय से क़ानूनी मामलों की रिपोर्टिंग कर रहे दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर मिश्र कहते हैं कि क़ानूनी रूप से इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है और यह सरकार को भी पता है कि बिना उनकी सहमति से नार्को टेस्ट नहीं कर सकते हैं.

कोर्ट में स्वीकार्य नहीं

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उनके मुताबिक़, "बावजूद इसके, अगर सरकार ने यह कहा है तो सीधे तौर पर इसे प्रतीकात्मक रूप में लेना चाहिए. दरअसल, सरकार यह संदेश आम लोगों में देना चाहती है कि हम तो नार्को टेस्ट भी करा रहे हैं लेकिन पीड़ित के परिजन ऐसा करने से मना कर रहे हैं. इससे लोगों की निगाह में पीड़ित लड़की के परिजन संदेह के घेरे में आ जाएँगे."

प्रभाकर मिश्र कहते हैं, "प्रेस नोट में कोई दिक़्क़त नहीं है. विवेचना में इसे शामिल करने का निर्देश दिया गया है लेकिन यह तो नहीं कहा गया है कि ऐसा बिना उनकी सहमति के करिए. अब ये अलग बात है कि वो इसकी सहमति देते हैं या नहीं. अगर नहीं देते हैं, फिर भी नार्को टेस्ट का दबाव बनाया जाता है, तो उस स्थिति में यह क़ानूनी मुद्दा बनेगा."

सुप्रीम कोर्ट की वकील वृंदा ग्रोवर भी सरकार के इस फ़ैसले के पीछे 'राजनीतिक संदेश' की आशंका जताती हैं और नार्को टेस्ट के औचित्य पर ही सवाल उठाती हैं.

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वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ़ टेस्ट का कोई मतलब नहीं है. कोर्ट में यह स्वीकार्य ही नहीं है. यह विवेचना का हिस्सा नहीं हो सकता है क्योंकि इसे कोर्ट मानता ही नहीं है. कोर्ट में इसकी कोई वैल्यू नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि आप बयान लीजिए, विभिन्न पहुलओं से जाँच करिए और जो भी लोग उससे संबंधित हों, उनके बयान दर्ज करिए. यही बातें कोर्ट में दलील के रूप में काम आएँगी."

"सुप्रीम कोर्ट की ओर से तो इसके लिए सख़्त मनाही है और यह वहाँ क़त्तई स्वीकार्य नहीं है. यह सब मामले को उलझाने का तरीक़ा है और लोगों का ध्यान बाँटने की कोशिश है. सरकार आम लोगों में ये संदेश देना चाहती है कि ये लोग नार्को टेस्ट नहीं करा रहे हैं, इसका मतलब झूठ बोल रहे हैं. पीड़ितों को ही कठघरे में खड़ा कर रही है."

नार्को टेस्ट एक तरह की झूठ पकड़ने वाली तकनीक है, जिसमें संबंधित व्यक्ति को कुछ दवाएँ या इंजेक्शन दिए जाते हैं. आमतौर पर इसके लिए सोडियम पेंटोथोल का इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे वह व्यक्ति अर्धबेहोशी की हालत में चला जाता है.

ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति में वह सवालों का सही-सही जवाब देता है क्योंकि अर्धबेहोशी की वजह से वह व्यक्ति दिमाग़ का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं कर पाता और जानबूझकर झूठ गढ़ पाने की स्थिति में नहीं होता. यह तकनीक वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित भले ही है लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि यह शत-प्रतिशत नहीं होते.

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