हाथरस मामला: क्या योगी सरकार पर केंद्रीय नेतृत्व का दबाव पड़ रहा है?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश के हाथरस में कथित गैंगरेप के बाद की गई हत्या के मामले में देश भर में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं और पीड़ित लड़की के गांव में राजनीतिक दलों का तांता लगा हुआ है, वहीं राज्य सरकार ने अपने कई फ़ैसलों के चलते इस मामले में कई नए विवाद भी खड़े कर दिए हैं.
राज्य सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश भले ही दे दिए हैं लेकिन पीड़ित पक्ष का भी नार्को टेस्ट कराने का आदेश दे दिया. पीड़ित लड़की के परिजन ख़ुद के नार्को टेस्ट कराने के फ़ैसले से हैरान हैं तो सीबीआई की बजाय न्यायिक जांच पर अड़े हुए हैं.
सीबीआई जांच के आदेश के साथ योगी आदित्यनाथ ने कहा, "हाथरस की दुर्भाग्यपूर्ण घटना और जुड़े सभी बिंदुओं की गहन पड़ताल के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार इस प्रकरण की विवेचना केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के माध्यम से कराने की संस्तुति कर रही है. इस घटना के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को कठोरतम सजा दिलाने के लिए हम संकल्पबद्ध हैं."
इससे पहले उन्होंने कहा था, "उत्तर प्रदेश में माताओं-बहनों के सम्मान-स्वाभिमान को क्षति पहुंचाने का विचार मात्र रखने वालों का समूल नाश सुनिश्चित है. इन्हें ऐसा दंड मिलेगा जो भविष्य में उदाहरण प्रस्तुत करेगा. आपकी उत्तर प्रदेश सरकार प्रत्येक माता-बहन की सुरक्षा व विकास हेतु संकल्पबद्ध है. यह हमारा संकल्प है-वचन है."
इस बीच, कहा यह जा रहा है कि राज्य सरकार पर न सिर्फ़ विपक्षी दलों और जगह-जगह हो रहे विरोध प्रदर्शनों का दबाव है बल्कि बीजेपी के भीतर से भी दबाव पड़ रहा है और जानकारों का कहना है कि कई फ़ैसलों के पीछे सीधे केंद्र सरकार का हस्तक्षेप दिख रहा है.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया
हाथरस में पीड़ित लड़की के गांव में पहुंचने की कोशिश में रविवार को भी राष्ट्रीय लोकदल, भीम आर्मी और समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधिमंडल को रोकने की कोशिश हुई. राष्ट्रीय लोकदल के नेताओं पर तो पीएसी और पुलिस के जवानों ने लाठियां भी भाजीं जिसमें पार्टी नेता जयंत चौधरी को उनके कार्यकर्ताओं ने बहुत मुश्किल से बचाया.
इससे पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के अलावा तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को भी पीड़ित लड़की के गांव पहुंचने से दो बार रोका गया. इस दौरान राहुल गांधी और तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन के साथ पुलिस-प्रशासन की धक्का-मुक्की की ख़बरें देश भर में ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी हिस्सा बनीं.
यहीं नहीं, मीडिया को भी पीड़ित लड़की के परिजनों से मिलने और बात करने से रोका गया, धक्का-मुक्की की गई और बल प्रयोग भी किया गया. दिलचस्प बात यह है कि पिछले कई दिनों से पीड़ित लड़की के परिजनों से मिलने पर लगी रोक शनिवार को अचानक हटा ली गई.
शनिवार को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी परिजनों से मिलने गए तो परिजनों का दर्द छलक उठा. हालांकि प्रशासन ने उसके बाद भी वहां मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर जमकर लाठी चार्ज किया जिन्हें बचाने आईं प्रियंका गांधी से भी बदसलूकी की तस्वीरें वायरल होने लगीं.
अचानक से क्यों पलटा फ़ैसला

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सवाल उठता है कि योगी सरकार ने पीड़ित पक्ष से बात करने पर रोक क्यों लगाई या फिर उन्हें नज़रबंद जैसी स्थिति में रखने की कोशिश क्यों की और फिर अचानक अपने फ़ैसलों को पलटा क्यों?
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान पहले सवाल के जवाब में कहते हैं कि यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ''हठधर्मिता' है और दूसरी स्थिति के लिए वह सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप बताते हैं.
शरद प्रधान कहते हैं, "सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का हस्तक्षेप दिख रहा है. उन्होंने जब देखा कि अब तो यह मामला यूपी की सीमाओं से निकलकर बाहर तक जा चुका है, इंडिया गेट पर प्रदर्शन हो रहा है, कांग्रेस पार्टी और भीम आर्मी ने इसे मुद्दा बना लिया है, दलित वोट बैंक ख़तरे में है तो सीधे तौर पर उन्होंने यह मनमानी न करने और सीबीआई जांच की सिफ़ारिश करने का निर्देश दिया."
"दूसरी बात यह कि हाई कोर्ट ने जिस तरह से स्वत: संज्ञान लिया, उससे भी सरकार पर दबाव पड़ा. हाई कोर्ट ने जिस तरह का आदेश जारी किया है, पीड़ित पक्ष से सहानुभूति दिखाई है और मीडिया को जगह-जगह उद्धृत किया है, उससे इन्हें यह भी लगा होगा कि कहीं कोर्ट ख़ुद ही सीबीआई जांच का आदेश न दे दे. जहां तक पीड़ित परिवार तक लोगों और मीडिया को पहुंचने से रोकने का सवाल है, वह तो बिल्कुल ही ग़ैर-ज़रूरी और मनमाना फ़ैसला था. इस तरह के मुद्दों पर यह सरकार अक़्सर ऐसा करती है और बाद में उसे बैकफ़ुट पर आना पड़ता है."
प्रशासनिक कमज़ोरी और निष्क्रियता

न सिर्फ़ हाथरस के मामले में बल्कि इससे पहले भी कई ऐसे मौक़े आए जिनमें राज्य सरकार ने वो फ़ैसले लेने में काफ़ी देरी की जिन्हें तत्काल ले लेना चाहिए था. चाहिए स्वामी चिन्मयानंद का मामला हो, कुलदीप सेंगर का मामला हो, सोनभद्र में बारह आदिवासियों की हत्या और फिर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी को हिरासत में लेने का मामला हो या फिर लॉकडाउन के दौरान मज़दूरों को बसों से भेजने का मामला हो, सरकार ने फ़ैसले लिए लेकिन देर से. जानकारों के मुताबिक, इन फ़ैसलों के पीछे भी केंद्रीय हस्तक्षेप ही है.
हाथरस में मीडिया को रोकने के सवाल पर स्थानीय अधिकारियों ने सिर्फ़ यही कहा था कि एसआईटी को जांच में दिक़्क़तें आ रही हैं. हालांकि शनिवार को मीडिया के लोग और राजनीतिक दलों के लोग वहां गए भी और एसआईटी ने भी पूछताछ जारी रखी.
वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र सीबीआई जांच की सिफ़ारिश या फिर अन्य फ़ैसलों के पीछे प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप की बात को नहीं स्वीकारते हैं. उनका कहना है कि इसके पीछे प्रशासनिक कमज़ोरी और निष्क्रियता है.
योगेश मिश्र कहते हैं, "सरकार के तमाम ऐसे फ़ैसले जो विवादित रहे या फिर जिन्हें उसे पलटना पड़ा उसके पीछे असली वजह यह है कि सरकार के पास सूचनाएं या तो पहुंच नहीं रही हैं या फिर सही नहीं पहुंच रही हैं. सरकार के पास दक्ष अधिकारी नहीं हैं. पता नहीं क्या सोचकर इन अधिकारियों ने लड़की के शव को रात में जलाने का फ़ैसला लिया. मीडिया को जाने से क्यों रोका. सरकार ने भी डीएम को नहीं हटाया जबकि तमाम फ़ैसलों के पीछे उन्हीं का आदेश है. डीएम भले ही अच्छा काम अब तक किए हों लेकिन जब पुलिस अधिकारियों को हटाया गया तो उन्हें बख़्श देने पर तो सवाल उठेंगे ही."
पार्टी में कितनी गुटबाजी?

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योगेश मिश्र यह भी कहते हैं कि सरकार को अपने लोगों का भी साथ नहीं मिल रहा है. हालांकि इसके पीछे वो पार्टी की गुटबाज़ी को नहीं बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली को मानते हैं.
उनके मुताबिक, "बीजेपी में कोई योगी विरोधी गुट सक्रिय हो गया है, यह कहना ठीक नहीं है. बल्कि यह कहना ज़्यादा सही है कि अपनी ही पार्टी के एमपी-एमएलए सरकार के साथ नहीं हैं. और इसके पीछे वजह यही है कि अब पूरे कार्यकाल के दौरान सरकार भी उनके साथ नहीं दिखी जिसकी शिकायत ये लोग मौक़ा मिलने पर करते रहे हैं. हाथरस में ही देख लीजिए, आस-पास के ज़्यादातर विधायक-सांसद बीजेपी के ही हैं लेकिन सरकार के पक्ष में कोई बयान आ रहा हो या फिर वहां पहुंच कर सरकार को बचाने की कोशिश में हों, ऐसा दिख नहीं रहा है."
लेकिन शरद प्रधान कहते हैं कि बीजेपी में तमाम लोग ऐसे हैं जो कि योगी आदित्यनाथ को पसंद नहीं करते हैं और जब मौक़ा मिलता है तो वो उसमें आग में घी डालने से भी नहीं चूकते. उनके मुताबिक ये अलग बात है कि ऐसा वो सामने आकर नहीं बल्कि पीछे रहकर ही करते हैं.
शरद प्रधान कहते हैं, "सही बात तो यह है कि बीजेपी का कोई बड़ा नेता योगी आदित्यनाथ के साथ नहीं है. किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन वो बन गए. दूसरी बात यह कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ ख़ुद को ठाकुरों का नेता साबित करने की कोशिश में लगे हैं. अब तक बीजेपी में राजनाथ सिंह ही ठाकुरों के नेता के रूप में समझे जाते थे लेकिन फ़िलहाल वो एक तरह से नेपथ्य में हैं. दूसरी ओर, केंद्रीय नेतृत्व को भी यह स्थिति अच्छी लगती है कि आपस में विरोध रहेगा तो उनका महत्व बरक़रार रहेगा."
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