बलरामपुर: पुलिस ने परिजनों को रात में दाह संस्कार के लिए मजबूर किया?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बलरामपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
शुक्रवार को देश भर में गांधी जयंती मनाई जा रही थी और हाथरस में रेप के बाद मारी गई दलित लड़की के लिए इंसाफ़ मांगा जा रहा था. दूसरी तरफ़, हाथरस से क़रीब 500 किलोमीटर दूर बलरामपुर में बर्बरता के बाद मौत की शिकार दलित लड़की के परिजन कुछ पुलिसकर्मियों और अफ़सरों से अपनी बेटी के लिए इंसाफ़ माँग रहे थे.
बलरामपुर ज़िला मुख्यालय से मझौली गांव की दूरी क़रीब 50 किलोमीटर है. 29 सितंबर की शाम को 22 वर्षीय दलित समुदाय की छात्रा की कथित तौर पर गैंगरेप के बाद उसे बुरी तरह से मारा-पीटा गया और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई.
मृतक लड़की के भाई की तहरीर पर पुलिस ने दो लोगों को उसी दिन गिरफ़्तार कर लिया और दो लोगों को शुक्रवार गिरफ़्तार किया.
वहीं, परिजनों का आरोप है कि पुलिस जानबूझकर मामले को दबाने या रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश कर रही है.
यही नहीं, परिजनों का यह भी आरोप है कि प्रशासन ने 30 सितंबर को रात नौ बजे ही मृत लड़की का अंतिम संस्कार करने को मजबूर किया.

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'अंतिम संस्कार करने के लिए किया गया मजबूर'
पीड़ित लड़की की मां बताती हैं, "हमें तीन दिन से कहा जा रहा है कि इंतज़ार करो. हम अब एक दिन भी इंतज़ार नहीं करेंगे. हमें तुरंत न्याय चाहिए."
परिजनों का आरोप है कि जिन लोगों को पुलिस ने पहले दिन गिरफ़्तार किया था, सिर्फ़ वही लोग नहीं बल्कि कुछ अन्य लोग भी इस मामले में दोषी हैं. हालाँकि शुक्रवार शाम परिजनों की आशंका के आधार पर ही पुलिस ने दो अन्य लोगों को भी गिरफ़्तार किया लेकिन वो इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं.
पीड़ित लड़की के एक भाई ने बीबीसी को बताया, "हमने घटना के बाद ही थाने जाकर पुलिस को सूचना दी. पुलिस मेरी बहन के शव को रात में ही घर से लेकर थाने चली गई. शव रात भर थाने में रखा रहा. सुबह पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया और फिर उसी रात जबरन दाह संस्कार करा दिया."
हालाँकि पुलिस और प्रशासन इस बात से इनकार कर रहे हैं कि अंतिम संस्कार के लिए परिजनों पर किसी तरह का कोई दबाव बनाया गया.
बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक देवरंजन वर्मा कहते हैं, "परिजनों ने स्वेच्छा से दाह संस्कार किया और ख़ुद ही किया. किसी का कोई दबाव नहीं था. पुलिस वहां मौजूद ज़रूर थी लेकिन क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से, न कि कोई दबाव बनाने के लिए."
लेकिन पीड़ित लड़की के घर पर मौजूद उसके नाना जब यह कहने लगते हैं कि पुलिस ने अंतिम संस्कार के लिए हम पर दबाव नहीं बनाया, तो घर के दूसरे सदस्य उनकी बात का कड़ा प्रतिवाद करते हैं.
वो कहते हैं, "दबाव कैसे नहीं बनाया? हम लोग तो सुबह करना चाह रहे थे. उन लोगों ने तुरंत करने पर मजबूर किया. कोतवाल साहब बोले कि अभी अंतिम संस्कार कर लो, आपकी सभी मांगें मान ली जाएंगी. लेकिन हमारी एक भी मांग नहीं मानी गई. असली अभियुक्त तक नहीं पकड़े जा सके."

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'पुलिस ने हमारे हिसाब से रिपोर्ट नहीं लिखी'
लड़की के एक भाई के मुताबिक़, उन लोगों ने तीन बार पुलिस को प्रार्थना पत्र दिया लेकिन पुलिस वालों ने रिपोर्ट भी अपने ही हिसाब से लिखी.
भाई बताते हैं, "हमने जो बताया उस हिसाब से रिपोर्ट नहीं लिखी गई बल्कि पुलिस ने अपने हिसाब से लिखी. हम दो लोगों के अलावा कुछ अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ भी रिपोर्ट लिखवाना चाहते थे लेकिन पुलिस वालों ने उसे नहीं दर्ज किया. हम जानते हैं कि सिर्फ़ दो लोग, उनमें भी एक नाबालिग ऐसा काम नहीं कर सकते हैं."
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 22 साल की छात्रा का पहले अपहरण किया गया और फिर उसके साथ गैंगरेप किया गया.
यही नहीं, आरोप ये भी हैं कि गैंगरेप के बाद उसे बुरी तरह से मारा-पीटा गया और उसकी हालत ख़राब होने पर पहले किसी अस्पताल में भर्ती कराया गया. लेकिन तबीयत ज़्यादा ख़राब होने पर एक रिक्शे में बिठाकर घर भेज दिया गया, जहां कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई.
छात्रा के साथ यह अपराध तब हुआ जब वो एक कॉलेज में एलएलबी की पढ़ाई के लिए एडमिशन लेने गई थी.
छात्रा की मां बताती हैं, "शाम क़रीब सात बजे एक रिक्शे पर लादकर मेरी लड़की को एक 10-12 साल का लड़का लेकर आया. बोला कि उतार लो इसे. हम लोग देखे तो हमारी बेटी थी. उसकी हालत ख़राब थी. हम डॉक्टर के पास ले गए तो डॉक्टर बोले लखनऊ ले जाओ. रास्ते में ही लड़की ने दम तोड़ दिया."
लड़की के परिजन सबसे पहले गाँव के ही एक डॉक्टर के पास ले गए जिन्होंने गंभीर हालत देखकर उसे दूसरी जगह रेफ़र कर दिया. उसके बाद परिजन उसे लेकर गैंसड़ी क़स्बे में ही डॉक्टर संतोष कुमार सिंह के पास ले गए. संतोष सिंह ने कहा कि इसे या तो बलरामपुर के ज़िला चिकित्सालय ले जाओ या फिर लखनऊ.
डॉक्टर संतोष ने बीबीसी को बताया, "लड़की की हालत बहुत ख़राब थी. न तो नब्ज़ चल रही थी, न ही बीपी सामान्य था और सांसें भी थमी जा रही थीं. हमने इसके अलावा कुछ देखा भी नहीं और तुरंत बड़े अस्पताल में ले जाने को कहा."

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परिजनों के कहने पर किसी को सज़ा नहीं दे सकते: पुलिस
लड़की के परिजनों को अभी उसकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी नहीं मिली है लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोट लगने के अलावा रेप की आशंका भी जताई गई है.
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, छात्रा की मौत लिवर और आँत में गंभीर चोट लगने के कारण हुए अत्यधिक रक्तस्राव से हुई.
लड़की के परिजनों के मुताबिक, 29 सितंबर की शाम वो जब अपने घर पहुंची तो उसके हाथ में ग्लूकोज़ चढ़ाने वाली नली यानी वीगो भी लगा था.
बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक देवरंजन वर्मा कहते हैं कि पुलिस अपने हिसाब से जांच कर रही है और जल्दी ही सभी दोषियों को पकड़ लेगी लेकिन परिजनों की माँग के आधार पर किसी को सज़ा तो नहीं दी जा सकती.
एसपी देवरंजन वर्मा कहते हैं, "परिजनों की शिकायत के आधार पर ही एफ़आईआर लिखी गई है. शुरू में उन्होंने दो लोगों के ही ख़िलाफ़ शिकायत की थी, जिनके घर पर लड़की मिली थी. उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है. दो और लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. कुछ अन्य लोगों से भी पूछताछ की जा रही है."
लड़की के परिजनों के मुताबिक, लड़की पढ़ाई के साथ-साथ एक एनजीओ में भी काम करती थी और अपनी टीम के साथ गाँव-गाँव जाकर यह बताने की कोशिश करती थी कि कैसे उनकी आमदनी दोगुनी हो सकती है. इसके लिए उसे हर महीने 3,000 रुपये मिलते थे.

मामले में जिन दो अभियुक्तों को घटना के अगले दिन गिरफ़्तार किया गया वो गैंसड़ी क़स्बे के ही रहने वाले चाचा और भतीजा हैं. भतीजा नाबालिग़ है.
चाचा की गैंसड़ी क़स्बे में ही किराने की दुकान है और भतीजा भी कभी-कभी दुकान में हाथ बँटाता है.
आरोप हैं कि रेप के के बाद इन दोनों ने पहले लड़की को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया और फिर बाद में एक रिक्शे पर बैठाकर उसे घर भेज दिया.
लेकिन अभियुक्तों के परिजनों का कहना है कि उन दोनों पर लगे ये आरोप बेबुनियाद हैं.
एक अभियुक्त की पत्नी ने बीबीसी को बताया, "रात को 11 बजे पचासों की संख्या में पुलिस वाले दबिश डालने आए और दोनों को पकड़ ले गए. हम लोगों से गाली-गलौज़ की और मारा-पीटा भी. मेरे पति ऐसा काम कभी नहीं कर सकते हैं. कुछ लोगों ने फँसाने की नीयत से उनका नाम बता दिया और पुलिस वही मान बैठी."

दूसरे एंगल से भी हो रही है जांच
एक अभियुक्त के पिता अध्यापक थे जिनका अब निधन हो चुका है. उसके दो भाई मुंबई में रहते हैं जबकि दो भाई बलरामपुर में ही रहते हैं.
नाबालिग़ अभियुक्त की माँ कहती हैं, "मेरा बेटा 14 साल का है. स्कूल बंद चल रहा है तो कंप्यूटर सीख रहा था. भला अपने चाचा के साथ वो ये सब काम करेगा? लेकिन अब हम क्या कहें? हमारी कोई सुनवाई ही नहीं है. मोहल्ले में हम लोगों की इज़्ज़त है. लेकिन हमारी सारी इज़्ज़त पुलिस वालों ने मिट्टी में मिला दी."
हालाँकि बलरामपुर में ही पुलिस के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पुलिस अन्य दूसरे एंगल से भी मामले की जाँच कर रही है.
वहीं मझौली गाँव में लोग इस बारे में कोई भी बात करने से कतरा रहे हैं. क़रीब 3 हज़ार की आबादी वाले इस गांव के सामाजिक समीकरण में सबसे ज़्यादा संख्या पिछड़े वर्ग के लोगों की है और सबसे कम दलित समुदाय के लोगों की.
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