गुजरात में मृतकों के नाम पर बैंक खाता खोलने का घोटाला क्या है?

मनरेगा घोटाला

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती

हाल में गुजरात के स्थानीय मीडिया में राज्य के बनासकांठा ज़िले के बालुंदरा गांव में मनरेगा से जुड़े कथित घोटाले की ख़बरें छाई रहीं. कहा गया कि कुछ लोगों ने कथित तौर पर गांव वालों के दस्तावेज़ों का ग़लत इस्तेमाल कर उनकी जानकारी के बिना जॉब कार्ड बनवाए और इस तरह बड़ी रकम हड़प ली.

बीबीसी की ग्राउंड रिपोर्ट समेत कई मीडिया रिपोर्ट्स से पता चला कि ये घोटाला कई सालों से चल रहा था. स्थानीय लोगों ने हमें कहा कि दूसरे गांवों से भी कुछ ऐसी ही कहानियां सामने आ सकती हैं.

हालांकि, बनासकांठा के अमीरगढ़ पुलिस स्टेशन में एक पुलिस शिकायत दर्ज़ की गई है, लेकिन पुलिस अभी ये पता नहीं लगा पाई कि असल में कितने पैसों का घोटाला हुआ है. स्थानीय लोगों का कहना है कि घोटाला लाखों रुपये का है.

वडगाम सीट से निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने बीबीसी से कहा कि ये तो घोटाले सामने आने की शुरुआत है और वो राज्य के अलग-अलग गावों में हो रहे ऐसे और भी घोटालों को सामने लाएंगे.

उन्होंने आरोप लगाया कि नीचे से लेकर ऊपर तक यानी ग्राम पंचायत के स्तर से लेकर गांधीनगर के बड़े बीजेपी नेताओं तक हर कोई इस घोटाले में शामिल है. उन्होंने राज्य सरकार को चुनौती दी कि वो इस घोटाले में अपना हाथ न होने की बात को साबित करे.

मनरेगा घोटाला

इमेज स्रोत, Getty Images

हालांकि, बीबीसी ने सरकार का पक्ष जानने के लिए जब गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है और रिपोर्टर को संबंधित मंत्री से बात करने के लिए कहा.

जब बीबीसी ने पंचायत मंत्री जयद्रथ सिंह परमार से संपर्क किया तो उनसे बात नहीं हो सकी. उन्हें भेजे गए एसएमएस का भी जवाब नहीं मिला है.

हालांकि, राज्य के बीजेपी प्रवक्ता प्रशांत वाला ने मेवाणी के आरोपों की निंदा की और उन्हें बेबुनियाद बताया और कहा कि मीडिया को भी इस तरह के आरोपों से दूर रहना चाहिए.

उन्होंने कहा, "हम हमेशा कहते हैं कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे उसके कोई राजनीतिक संबंध ही क्यों न हों."

मनरेगा घोटाला

मनरेगा क्या है?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार अधिनियम 2006 के तहत भारत सरकार गांवों में रहने वाले हर व्यक्ति को 100 दिन का रोज़गार देने की गारंटी देती है.

इस क़ानून के प्रावधानों को ग्राम पंचायत के माध्यम से लागू किया जाता है, जहां सरपंच, तहसीलदार और ग्राम सेवक ये योजना लागू करने में अहम भूमिका निभाते हैं.

इस योजना के तहत हर व्यक्ति को हर साल 100 दिन का रोज़गार दिया जाता है, जिसके लिए उन्हें हर दिन 200 रुपये मिलते हैं.

भले ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की आलोचना की हो, लेकिन मौजूदा वित्त वर्ष में इसके लिए 1.20 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है.

जो भी व्यक्ति इस योजना का लाभ लेना चाहता है, उसे एक जॉब कार्ड के लिए आवेदन करना पड़ता है. जॉब कार्ड में रोज़गार और मेहनताने का रिकॉर्ड रखा जाता है. प्रावधान के तहत, पूरा लेन-देन बैंक के माध्यम से किया जाता है.

मनरेगा घोटाला

कथित घोटाला क्या है?

गुजरात और राजस्थान की सीमा के नज़दीक बालुंदरा नाम का एक गांव है. यहां डुंगरी भील आदिवासी, राबरी और दलितों की मिलीजुली आबादी रहती है.

पता चला है कि यहां के रहवासियों की जानकारी के बिना 827 जॉब कार्ड जारी किए गए. एक स्थानीय शख़्स ने ही इस बारे में आरोप लगाए थे, जिसे कथित घोटाले का व्हिसलब्लोअर भी कहा जा रहा है.

ये जॉब कार्ड- उन आधार कार्ड, राशन कार्ड और दूसरे दस्तावेज़ों के आधार पर जारी किए गए थे, जो रहवासियों ने विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ग्राम पंचायत के कार्यालय में जमा करवाए थे.

मेवाणी का कहना है, "फर्ज़ी हस्ताक्षर के आधार पर उनके बैंक खाते खोले गए, जिनमें मनरेगा मज़दूरी का भुगतान किया गया और फिर कुछ लोगों ने उन पैसों को निकाल लिया."

आम तौर पर ग्राम पंचायत को फंड जारी करवाने के लिए तालाब की साइट पर हो रहे काम की तस्वीरें दिखाना पड़ती हैं. मनरेगा योजना के तहत गांव के सार्वजनिक तालाब को गहरा करके गांव में रोज़गार पैदा किया जाता है.

एक ग्रामीण जयंती धोराणा ने बीबीसी को बताया, "कागज़ों में बताया गया कि बालुंदरा के ग्रामीण, तालाब को गहरा कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई इससे अलग है."

घोटाले के व्हिसलब्लोअर किरन परमार ने बीबीसी न्यूज़ गुजराती से कहा, "उन्होंने जेसीबी से रात में काम पूरा किया और फंड जारी करवाया."

यही परमार के साथ भी हुआ. उनका जॉब कार्ड बनाया गया और किसी और को दे दिया गया.

परमार ने आरोप लगाया कि मामले के अभियुक्त ने दिखाया कि साइट पर उनके जैसे लोगों ने काम किया, लेकिन असल में लोगों को तो इस बारे में पता ही नहीं था.

पैसा "उनके" बैंक खातों में जमा कर दिया गया और उन्हें इन बैंक खातों की जानकारी ही नहीं है. उन्होंने कहा कि घोटाला करने वालों ने एटीएम कार्ड के ज़रिए पैसे निकाल लिए.

किरन परमार
इमेज कैप्शन, किरन परमार

घोटाले का पता कैसे चला?

किरन परमार बालुंदरा गांव के ही रहने वाले हैं और लॉकडाउन में नौकरी जाने से पहले तक वो अहमदाबाद के एक कैफे में काम करते थे.

वो लॉकडाउन 1 के दौरान सिर्फ अपने जॉब कार्ड का पता करने के लिए गांव वापस आ गए थे. उन्होंने मनरेगा की वेबसाइट पर अपना जॉब कार्ड देखा था.

उनके लिए इस कथित घोटाले का पता लगाना आसान काम नहीं था. उन्होंने बाद में पता लगाया कि गांववालों की जानकारी के बिना उनके नाम पर 827 जॉब कार्ड जारी किए गए हैं.

परमार ने बीबीसी को बताया, "मैंने स्पष्टता के लिए ग्राम पंचायत के सरपंच और अन्य पदाधिकारियों से संपर्क किया लेकिन मुझे अपमानित किया गया, धमकी दी गई और कार्यालय से बाहर निकाल दिया गया."

परमार इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय समेत कई स्तरों तक गए लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया.

मनरेगा घोटाला

इमेज स्रोत, ALOK PUTUL

उन्होंने कहा, "मैंने जिग्नेश मेवाणी से संपर्क किया और उन्होंने इस पूरे मसले को अपने हाथ में लिया और मेरी फाइंडिंग के आधार पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. हमें खुशी है कि ये घोटाला सबके सामने आ गया."

परमार ये देखकर हैरान रह गए कि उनकी मां गीता परमार के नाम पर दो अलग-अलग जॉब कार्ड जारी किए गए थे.

हालांकि, परमार का कहना है कि उन्हें लगातार हमले की धमकी दी जा रही है.

मनरेगा घोटाला

पुलिस की जांच

गुजरात के बनासकांठा स्थित अमीरगढ़ थाने में धोखाधड़ी और फर्ज़ी दस्तावेज़ बनाने समेत कई धाराओं के तहत एक पुलिस शिकायत दर्ज की गई है और पुलिस उपाधीक्षक डीसा कुशाल ओझा मामले की जांच कर रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, "हमें अब तक इस बात की जानकारी नहीं है कि कुल कितने रुपयों का घोटाला हुआ है, लेकिन जांच जारी है और अगर हमें इसमें किसी सरकारी कर्मचारी या बैंक कर्मचारी का हाथ होने की बात पता चलती है तो हम किसी को नहीं बख्शेंगे."

हालांकि, जिग्नेण मेवाणी का कहना है कि पुलिस को घोटाले के मुखिया तक पहुंचना चाहिए क्योंकि ये घोटाला ऐसे वक़्त में सामने आया है जब ग्रामीण भारत को मनरेगा से मिलने वाले लाभ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.

वो कहते हैं, "जो पैसा घोटालेबाज़ों के पास गया है उसे ग्रामीणों के पास जाना चाहिए था."

मनरेगा घोटाला

पीड़ित कौन हैं?

"मेरे बेटे की मौत 2016 में हो गई थी, लेकिन उसका जॉब कार्ड अब भी इस्तेमाल हो रहा है."

हरिभाई वेसिया के बेटे भीरा वेसिया का 20 सितंबर 2016 को निधन हो गया था. हालांकि, उनके जॉब कार्ड (जिसकी बीबीसी के पास कॉपी है) के मुताबिक़ उन्हें इसके बाद भी मेहनताना दिया गया. मिसाल के तौर पर उन्हें 21 सितंबर 2016 और उसके बाद भी मेहनताना दिया गया.

उनके पिता हरिभाई वेसिया ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो अपने पोते-पोतियों की परवरिश कर रहे हैं, जिसके लिए पैसे की सख़्त ज़रूरत है, जबकि दूसरी तरफ कुछ लोग उनके बेटे के नाम पर सरकार के खजाने से पैसा ऐंठ रहे हैं.

हरिभाई ने आगे कहा कि घोटाले के व्हिसलब्लोअर किरन परमार ने उन्हें बताया कि सरपंच और दूसरे लोग उनके बेटे की जानकारी का इस्तेमाल करके मनरेगा से मिलने वाला पैसा निकाल रहे हैं.

उन्होंने कहा, "मुझे बहुत बुरा लगा, क्योंकि एक तरफ मैं उसके बच्चों की परवरिश करने में संघर्ष कर रहा हूं, वहीं दूसरी तरफ लोग मेरे बेटे के नाम पर सरकार से धोखाधड़ी कर रहे हैं."

मनरेगा घोटाला

इमेज स्रोत, CG DPR

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

मैं कभी बैंक नहीं गया - हन्नाभाई धोराणा

"मैं दिहाड़ी मज़दूर हूं और कंस्ट्रक्शन के काम पर निर्भर हूं. मैं रोज़ सुबह घर से निकल जाता हूं और चंद पैसे कमाने के लिए पूरे दिन काम करता हूं ताकि अपने परिवार का पेट भर सकूं. मुझे पता चला कि कुछ लोग यहां मेरे अपने गांव में मेरे नाम पर पैसे कमा रहे हैं और मुझे काम की तलाश में पास के कस्बों में जाना पड़ता है, ये बहुत ही परेशान करने वाली बात है. मैंने कभी अंदर से बैंक नहीं देखा, लेकिन मुझे पता चला कि लोगों ने मेरा बैंक खाता खोला और उसमें से पैसे निकाल लिए."

मेरे नाम पर दो जॉब कार्ड- जयंती धोराणा

"मैं खेत में काम करने वाला मज़दूर हूं और 200 रुपये कमाने के लिए हर रोज़ 10 से 12 घंटे काम करता हूं. मुझे पता चला कि मनरेगा की साइट पर इससे कम घंटों के लिए काम करना होता है और उतने ही पैसे मिलते हैं. हमें यहां कभी ऐसा काम नहीं दिया गया. मुझे पता चला कि मेरे नाम पर दो अलग-अलग जॉब कार्ड बनाए गए हैं."

मैंने कभी मनरेगा साइट नहीं देखी- पिंटा धोराणा

"मैं ये जानकार हैरान था कि मेरा एक बैंक खाता है और सरकार उसमें पैसे डालती है. मैं चंद पैसे कमाने के लिए नज़दीक के खेत में घंटों काम करता हूं, लेकिन मुझे कभी मनरेगा का लाभ नहीं मिला."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)