निर्मला सीतारमण पर व्यक्तिगत टिप्पणी, कैसी है ये मानसिकता?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

लोकसभा में सोमवार को तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत रॉय की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर की गई विवादास्पद टिप्पणी के बाद काफ़ी हंगामा हुआ जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने एक्सपंज करने यानी हटाने को कहा.

दरअसल, लोकसभा में बैंकिग नियमन (संशोधन) विधेयक पेश किया गया जिसका कई विपक्षी सांसदों ने विरोध किया. इस विधेयक पर हो रही चर्चा के दौरान सौगत राय ने कहा कि इसके जरिए राज्यों के अधिकारों को निशाना बनाया जा रहा है. इसी बीच उन्होंने वित्त मंत्री के पहनावे पर विवादित टिप्पणी कर दी.

सत्ता पक्ष ने इसे वित्त मंत्री पर व्यक्तिगत हमला कहा और सौगत रॉय से माफ़ी मांगने की मांग की. संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी का कहना था, ''एक वरिष्ठ सदस्य होते हुए व्यक्तिगत पहनावे पर टिप्पणी करना ग़लत है. उन्हें बिना शर्त माफ़ी मांगनी चाहिए. यह महिलाओं का अपमान है''.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय

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इस दौरान स्पीकर ओम बिरला ने टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटाने को कहा. हालांकि, इस बीच सौगत रॉय बार-बार पूछते रहे कि आख़िर उन्होंने क्या ग़लत कह दिया? इसमें ग़लत क्या है?

पश्चिम बंगाल के दमदम से आने वाले सांसद सौगत रॉय सदन के वरिष्ठ सदस्य और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

सौगत रॉय संसद में जिस तरह ये सवाल कर रहे थे उससे लग रहा था कि उन्हें ये एहसास नहीं है कि वो निर्मला सीतारमण के ख़िलाफ़ क्या कह गए हैं.

लेकिन, इसके साथ ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या निर्मला सीतारण पर ऐसे हमले सिर्फ़ इसलिए हो रहे हैं क्योंकि वो एक महिला हैं? अर्थव्यवस्था पर बात करते-करते वित्त मंत्री पर व्यक्तिगत तंज क्यों किया गया?

आज़म ख़ान

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महिला नेताओं के ख़िलाफ़ टिप्पणी क्यों

वैसे किसी भी महिला नेता के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत टिप्पणी का ये पहला मामला हो ऐसा नहीं है. इससे पहले भी कई नेताओं ने ऐसे ही विवादास्पद बयान दिए हैं.

राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि जब संसद में अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर चर्चा हो रही थी, तो वहां किसी के पहनावे पर या व्यक्तिगत टिप्पणी करना ही गैरवाजिब है और इससे विषय की गंभीरता कम हो जाती है.

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन कहती हैं कि सौगत रॉय एक प्रगतिशील नेता माने जाते हैं और वो अगर ऐसी बात करें तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या हो सकता है. साथ ही उनका कहना है कि इस तरह की टिप्पणी महिलाओं के प्रति विरोधी सोच को ही दर्शाती है. ऐसे मामलों में सज़ा कुछ होती नहीं है और केवल रिकॉर्ड से हटाना भी कोई मायने नहीं रखता क्योंकि वो सारी बातें तो सबने सुन ही ली होती हैं.

राधिका रामाशेषन के अनुसार, ''इसका सबसे अच्छा उदाहरण महिला आरक्षण बिल है. इस बिल को रोकने के लिए एक मेल बॉन्डिंग नज़र आती है, चाहे वो बीजेपी है, कांग्रेस या अन्य पार्टी हो. हालांकि, लेफ्ट इस मुद्दे पर गंभीर नज़र आती है और वो विरोध करते हैं. पार्टियां दबाव में आकर महिला सांसदों को टिकट देतीं हैं या अगर कोई महिला सांसद प्रभावी और सफल है तो कोई चारा नहीं बचता. दूसरी तरफ ट्विटर पर जया बच्चन की बात पर ट्रोलिंग हुई लेकिन सौगत रॉय पर कुछ नहीं था. ये महिला विरोधी विचार को ही दर्शाता है और ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि ममता बैनर्जी ने भी इस पर अब तक कुछ नहीं कहा है.

रेणुका चौधरी

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कब-कब दिए गए विवादित बयान

महिला विरोधी बयानों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है और चुनावी सभाओं और रैलियों में सारी मर्यादाएं कई बार लांघ दी जाती हैं.

आपको याद ही होगा रामपुर में सपा नेता आज़म ख़ान की रैली जहां वे कथित तौर पर जयाप्रदा के ख़िलाफ़ विवादित टिप्पणी करते हुए बोल गए थे, "रामपुरवासियों को जिन्हें समझने में 17 साल लगे, उन्हें मैंने 17 दिन में ही पहचान लिया था कि उनकी अंडरवियर का रंग ख़ाकी है."

संसद में एक बार जब स्मृति ईरानी ने जद(यू) नेता शरद यादव पर सवाल उठाए तो उन्होंने ईरानी पर टिप्पणी करते हुए कहा था, ''मैं जानता हूं कि आप कौन हैं."

यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो बयान भी जिसमें उन्होंने कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी की हंसी पर मुस्कराते हुए कहा था, "सभापति जी रेणुका जी को आप कुछ मत कहिए. रामायण सीरियल के बाद ऐसी हंसी सुनने का आज सौभाग्य मिला है."

साल 2016 में यूपी में पार्टी के तत्कालीन उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने भी मायावती को 'वेश्या से बदतर चरित्र' वाला नेता बताया था, जिस पर हुए विवाद के बाद पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया था.

ऐसी कई टिप्पणियां है जिनका विरोध हुआ, हल्ला मचा और वो रफ़ा-दफ़ा हो गई. लेकिन, ऐसे बहुत कम मामले होंगे, जहां ऐसी टिप्पणी करने पर किसी नेता का पद से निलंबन हुआ हो.

बीजेपी नेता स्मृति ईरानी

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कैसी है ये मानसिकता?

वरिष्ठ पत्रकार अदिती फडनिस भी मानती हैं कि कई बातें जो सार्वजनिक हो जाती हैं और कुछ एक में कार्रवाई हो जाती है. जैसे प्रणब मुखर्जी जब ज़िंदा थे तो उनके बेटे ने एक बयान दिया था जिसके बाद काफ़ी हल्ला हुआ और उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ी. लेकिन कई बार बातें ऐसे ही आई-गई हो जाती हैं. कई बार तो पार्टी में महिलाओं को टोकन के तौर पर लिया जाता है. हमारा समाज अब भी महिलाओं को गै़र बराबरी से ही देखता है. ये हमारे समाज की त्रासदी है कि कहने को हम प्रगतिशील होने का दावा करते हैं, महिलाओं को ऊंचा स्थान देने की बात करते हैं लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है.

जामिया मिलिया इस्लामिया में राजनीति विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर, डॉ. बुलबुल धर-जेम्स राजनेताओं के इस तरह के लैंगिक बयानों को सामाजिक परिपेक्ष्य में देखती हैं.

उनका कहना है कि समाज की ढाँचागत व्यवस्था को ही ऐसा बना दिया गया है कि पहले से ही महिला और पुरुष के लिए कौन से क्षेत्र होने चाहिए और उनकी क्या सीमाएं रहनी चाहिए, यह सब तय हो जाता है. पूर्व निर्धारित मापदंड और मानक ही तय करते हैं कि महिलाओं का आचरण और व्यवहार कैसा होना चाहिए. जो काम और बातें इस पितृसत्तामक मानसिकता से अलग होती हैं उसे कभी मज़ाक तो कभी व्यक्तिगत हमलों के जरिए बदलने की कोशिश की जाती है.

वहीं राजनीतिक विश्लेषक ये भी कहती हैं कि जब ऐसे मामले आते हैं तो कोई भी महिला सांसद एक-दूसरे के लिए आवाज़ नहीं उठातीं और वो पार्टी लाइन पर ही चलती हैं. ये महिला सॉलिडैरिटी या एकजुटता कभी-कभी ही दिखाई देती है जैसे वो तस्वीर जब महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हुआ तो सुषमा स्वराज, सोनिया गांधी और वृंदा करात सब एक दूसरे को बधाई देते हुए एकसाथ नज़र आईं. पुरुष सांसद और नेता कुछ भी कह कर निकल लेते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि इसका विरोध न पार्टी के अंदर होगा और न बाहर और अगर महिलाओं की बात करें तो वहां तो बिल्कुल भी नहीं होगा.

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