कुलभूषण जाधव मामले में क्वीन्स काउंसेल की चर्चा क्यों

हरीश साल्वे

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत ने पाकिस्तान से कहा है कि वहाँ की जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के लिए वो क्वीन्स काउंसेल हरीश साल्वे को नियुक्त करना चाहता है.

इस साल जनवरी में हरीश साल्वे को औपचारिक तौर पर ब्रितानी महारानी और राजपरिवार के वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नियुक्त किया गया था. उन्हें इंग्लैंड एंड वेल्स कोर्ट के लिए महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय का वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया है.

वकालत के पेशे में उत्कृष्ठ योगदान करने वाले वकीलों की नियुक्ति इस पद पर की जाती है.

इसी साल अगस्त में इस्लामाबाद हाई कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने कहा था कि भारत को कुलभूषण के लिए वकील नियुक्त करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.

हालाँकि इसके बाद पाकिस्तान के सॉलिसिटर जनरल खलील जावेद ख़ान ने कहा था कुलभूषण के लिए भारत को एक ऐसे वकील की नियुक्ति करनी होगी, जो पाकिस्तान में प्रैक्टिस करते हों.

इसके बाद अब भारत ने कुलभूषण मामले में पैरवी करने के लिए हरीश साल्वे का नाम सुझाया है.

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कौन बनता है क्वीन्स काउंसेल और कैसे?

क्वीन्स काउंसेल की नियुक्ति कराने के लिए एक ख़ास सेलेक्शन पैनल होता है, जिसका एक विभाग है, हालाँकि ये सरकारी विभाग नहीं है. इस पैनल में एक चेयरमैन होते हैं, जो क़ानूनी पृष्ठभूमि से नहीं होते, उनके साथ तीन-चार लॉ मेम्बर्स और पाँच क़ानून के जानकार होते हैं.

क्वीन्स काउंसेल की नियुक्ति के लिए ये पैनल अपनी सिफ़ारिश चांसलर और न्याय मंत्री को भेजता है.

साल 2004 में बार काउंसिल और लॉ सोसाइटी के बीच सहमति के बाद तत्कालीन लॉर्ड चांसलर एंड सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट (लॉर्ड फॉकनर) ने क्वीन्स काउंसेल चुनने की प्रक्रिया को मंज़ूरी दी थी. इसके लिए सालाना तौर पर प्रतियोगिता कराई जाती है.

केंट लॉ सोसायटी के अनुसार इस तरह की पहली प्रतियोगिता साल 2005-06 में कराई गई थी, जिसके बाद से सालाना तौर पर ये प्रतियोगिता कराई जाती है. इसके लिए हाई कोर्ट के वकील औपचारिक तौर पर आवेदन कर सकते हैं.

साल 2019-20 के लिए आदेवन करने की फ़ीस 2,160 पाउंड यानी क़रीब दो लाख पाँच हज़ार रुपए थी.

द लॉ पोर्टल के अनुसार साल 1995 तक केवल बैरिस्टर ही इसके लिए आवेदन कर सकते थे, लेकिन बाद में नियमों को बदला गया ताकि सॉलिसिटर भी इसके लिए आवेदन कर सकें.

जहाँ बैरिस्टर कोर्ट में अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी पैरवी करते हैं, वहीं सॉलिसिटर क़ानूनी मामलों के जानकार होते हें, जो मामले से जुड़े दस्तावेज़ तैयार करते हैं और मुवक्किल के सलाहकार के तौर पर काम करते हैं.

क्वीन्स काउंसेल को सिल्क यानी रेशम का चोगा पहनने की इजाज़त होती है, इसलिए उन्हें 'सिल्क' भी कहा जाता है.

क्वीन्स काउंसेल वेबसाइट के अनुसार, “बीते सालों तक यही माना जाता रहा है कि केवल ऐसे गोरे ही क्वीन्स काउंसेल बन सकते हैं, जिन्होंने ऑक्सब्रिज या पब्लिक स्कूलों से पढ़ाई की है. बीते सालों में ये कभी सच्चाई थी या नहीं, ये नहीं पता, लेकिन ये आज की सच्चाई कतई नहीं है.”

“ये बेहद महत्वपूर्ण है कि जनहित के लिए क्वीन्स काउंसेल के तौर पर नियुक्ति के लिए सभी हाई कोर्ट के वकीलों को मौक़ा मिलना चाहिए, इसमें रंग, जाति, लिंग या एजुकेशनल बैकग्राउंड के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए.”

“इस पद के लिए वकालत के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता एकमात्र योग्यता होनी चाहिए, न कि किसी की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि.“

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कुलभूषण के लिए हरीश साल्वे ही क्यों?

कुलभूषण जाधव

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पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने इंटरनेशन कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में कुलभूषण जाधव केस लड़ा था.

हालाँकि वो देश के सबसे महंगे वकीलों में शुमार होते हैं, लेकिन इस मामले के लिए उन्होंने केवल एक रुपए की फ़ीस ली थी. इसके लिए पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उनका धन्यवाद भी किया था.

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जुलाई 2019 में इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाकिस्तान की अधिकतर आपत्तियों को ख़ारिज करते हुए कुलभूषण की फाँसी पर रोक लगा दी थी और पाकिस्तान से इस पर फिर से विचार करने को कहा था.

कोर्ट ने कहा था कि कुलभूषण जाधव को इतने दिनों तक क़ानूनी सहायता नहीं देकर पाकिस्तान ने वियना संधि का उल्लंघन किया है. कोर्ट ने पाकिस्तान से कुलभूषण को काउंसलर एक्सेस देने के लिए भी कहा था.

पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव को वहाँ की सैन्य अदालत ने फांसी की सज़ा सुनाई है. भारत इस मामले को लेकर हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस का रुख़ किया था.

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कौन हैं हरीश साल्वे?

हरीश साल्वे लंबे समय तक केंद्र में कांग्रेस की सरकारों में मंत्री रहे एनकेपी साल्वे के बेटे हैं.

45 साल के अपने करियर में वह कई कॉरपोरेट घरानों का पक्ष कोर्ट में रख चुके हैं. उनकी गिनती भारत के सबसे महंगे वकीलों में होती है.

नागपुर में पले बढ़े साल्वे के पिता एनकेपी साल्वे चार्टर्ड अकाउंटेंट थे, माँ अम्ब्रिती साल्वे डॉक्टर थीं और दादा एक कामयाब क्रिमिनल लॉयर थे. हरीश साल्वे ये मानते हैं कि उनके परिवार के कारण कम उम्र में ही उनमें प्रोफ़ेशनल गुण आ गए थे.

पिता के संपर्कों का हरीश साल्वे को फ़ायदा मिला और उन्हीं की बदौलत उनकी नानी पालखीवाला से मुलाक़ात हुई.

उनका करियर 1975 में फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार के एक केस के साथ शुरू हुआ था, जिसमें वो अपने पिता की मदद कर रहे थे.

दिलीप कुमार पर काला धन रखने के आरोप लगे थे. आयकर विभाग ने उन्हें नोटिस भेजा था और बकाया टैक्स के साथ भारी हर्जाना भी मांगा था.

1992 में दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से साल्वे सीनियर एडवोकेट बना दिए गए. इसके बाद उन्होंने अंबानी, महिंद्रा और टाटा जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों की कोर्ट में नुमाइंदगी की.

मशहूर केजी बेसिन गैस केस में जब अंबानी बंधुओं के बीच विवाद हुआ, तो मुकेश अंबानी का पक्ष हरीश साल्वे ने ही रखा.

भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड केस की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में उन्होंने केशब महिंद्रा का पक्ष रखा था. कोर्ट ने महिंद्रा समेत यूनियन कार्बाइड के सात अधिकारियों के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया था.

नीरा राडिया के टेप सामने आने के बाद रतन टाटा निजता के उल्लंघन का सवाल लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे. तब उनके वकील भी साल्वे ही थे.

उन्होंने वोडाफ़ोन को 14,200 करोड़ की कथित टैक्स चोरी के केस में जीत दिलाई.

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगा मामले में साल्वे को 'एमीकस क्यूरी' चुना था. लेकिन कुछ दंगा पीड़ितों ने साल्वे पर जनहित के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप लगाया.

1999 में एनडीए सरकार के समय उन्हें भारत का सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया. उस वक़्त उनकी उम्र 43 साल थी. वह 2002 तक इस पद पर रहे.

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