बिहार के नए माउंटेनमैन लौंगी भुइंया: पहाड़ काटकर तीन किलोमीटर लंबी नहर बना दी

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की राजधानी पटना से लगभग 200 किलोमीटर दूर गया ज़िले के बांकेबाज़ार प्रखंड के लोगों का मुख्य पेशा कृषि है, लेकिन यहां के लोग धान और गेहूं की खेती नहीं कर पाते थे, क्योंकि सिंचाई का साधन नहीं था.
इसके चलते यहां का युवा वर्ग रोज़गार के लिए दूसरे शहरों में पलायन कर चुका है.
कोठिलवा गांव के रहने वाले लौंगी भुइंया के बेटे भी काम-धंधे की तलाश में घर छोड़कर चले गए हैं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
अपने गांव से सटे बंगेठा पहाड़ पर बकरी चराते हुए लौंगी भुइंया के मन में एक दिन ये ख्याल आया कि अगर गांव में पानी आ जाए तो पलायन रुक सकता है. फ़सल उगाई जा सकती है.
लौंगी ने देखा कि बरसात के दिनों में वर्षा तो होती है मगर सारा पानी बंगेठा पहाड़ के बीच में ठहर जाता है, उन्हें इससे उम्मीद की रोशनी दिखी.

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
फिर पूरे इलाके में घूमकर पहाड़ पर ठहरे पानी को खेत तक ले जाने का नक्शा तैयार किया. और जुट गए पहाड़ को काटकर नहर बनाने के काम में.
एक, दो, तीन नहीं, ना ही पांच और दस साल. लौंगी माझी का दावा है कि पूरे तीस साल के परिश्रम के बाद उन्होंने पहाड़ के पानी को गांव के तालाब तक पहुंचा दिया.
उनके दावे के मुताबिक उन्होंने अकेले फावड़ा चलाकर तीन किलोमीटर लंबी, 5 फ़ीट चौड़ी और तीन फ़ीट गहरी नहर बना दी.
बांकेबाज़ार के बीडीओ (ब्लॉक विकास अधिकारी) सोनू कुमार ने बीबीसी को बताया, "हमने उनसे संपर्क भी किया है और डीएम साहब के आदेश से वहां एक टेक्निकल टीम भी भेजी गई और सर्वे किया गया. डीएम साहब को रिपोर्ट भेजी गई है.
"जितना उनसे हो पाया, उन्होंने किया है. मेहनत उन्होंने की है. नहर बनाने का काम तो उन्होंने किया है. लेकिन उसकी टेक्निकल जानकारी क्या है, ये आप वहां जाकर देख लीजिए."

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
लौंगी भुइंया के मुताबिक इसी साल अगस्त में यह काम पूरा हुआ है. हालांकि अबकी बरसात में उनकी मेहनत का असर दिख रहा है.
आसपास के तीन गांव के किसानों को इसका फ़ायदा मिल रहा है, लोगों ने इस बार धान की फ़सल भी उगाई है.
बीबीसी से फ़ोन पर बात करते हुए 70 साल के लौंगी भुइंया कहते हैं, "हम एक बार मन बना लेते हैं तो पीछे नहीं हटते. अपने काम से जब-जब फुर्सत मिलता, उसमें नहर काटने का काम करते थे. पत्नी कहती थी कि हमसे नहीं हो पाएगा, लेकिन मुझे लगता था कि हो जाएगा."

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
नए माउंटेन मैन के नाम से चर्चा
वैसे तो माउंटेन मैन के नाम से गया के ही दशरथ मांझी दुनिया भर में चर्चित हैं, जिन्होंने पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया था. लेकिन अब लोग लौंगी भुइंया को नया माउंटेन मैन कहने लगे हैं.
लौंगी भुइंया बताते हैं, "दशरथ मांझी के बारे में बाद में जानने को मिला. जब ठानी थी तब नहीं जानता था. मेरे दिमाग़ में केवल इतना ही था कि पानी आ जाएगा तो खेती होने लगेगी. बाल बच्चे बाहर नहीं जाएंगे. अनाज होगा तो कम से कम पेट भरने के लिए तो हो जाएगा."
लौंगी भुइंया के चार बेटे हैं. जिनमें से तीन बाहर रहते हैं. घर पर पत्नी, एक बेटा, बहु और बच्चे हैं. लेकिन अब उन्हें उम्मीद है कि बाक़ी बेटे भी वापस घर आएंगे. बेटों ने ऐसा वादा किया है.

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
गांव के लोगों की ख़ुशी
पहाड़ काटकर नहर बनाने वाले लौंगी भुइंया के काम से अगर कोई सबसे ख़ुश है तो उनके गांव के किसान. भुइंया के बनाए नहर का पानी अब उनके खेतों तक आ रहा है, अब उन्हें लगता है कि वे हर तरह की खेती कर सकते हैं.
स्थानीय निवासी उमेश राम कहते हैं, "लौंगी भुइंया ने जो किया है वह किसी अजूबे से कम नहीं. बहुत कठिन है पहाड़ काटकर नहर बनाना. हमारी आने वाली पीढ़ियां इन्हें याद रखेंगी."
कोठिलवा गांव ही जीवन मांझी ने कहा, "लौंगी जब काम में लगे थे तब हमलोगों ने उनकी मेहनत देखकर स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को भी कई बार समस्या से अवगत कराया, लेकिन किसी के पास हमारे लिए समय ही नहीं था. किसी ने कोई मदद नहीं की. हमलोगों ने भी कई बार लौंगी को टोका कि यह असंभव काम है. लेकिन उन्होंने हमें ग़लत साबित कर दिया."
लौंगी भुइंया के काम की चर्चा अब बाहर भी होने लगी है. गांव के लोग बताते हैं रोज़ कोई न कोई लौंगी से मिलने आता है. लौंगी भुइंया अति पिछड़े मुसहर समाज से आते हैं. उनके गांव की अधिसंख्यक आबादी यही है.

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
प्रशासन से सवाल, कोई मदद क्यों नहीं?
लौंगी भुइंया और उनके गांव वालों को इस बात की तो बेहद ख़ुशी है कि पहाड़ का पानी उनके खेतों तक आ गया है, लेकिन उनमें इस बात के लिए रोष भी है कि कई बार मदद मांगने के बावजूद भी प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली.
लौंगी खुद कहते हैं, "तब तो कोई नहीं ही आया, अब भी आ रहा है कोई तो सिर्फ़ वादे करके जा रहा है. मेरा काम तो पूरा हो गया, मुझे अब कुछ नहीं चाहिए, लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरे परिवार को एक घर और एक शौचालय मिल जाए. मेरा घर मिट्टी का है, अब ढह रहा है, मैंने अगर पहाड़ काटने का काम नहीं किया होता तो अबतक घर बना लेता. मुझे मेडल नहीं चाहिए एक ट्रैक्टर चाहिए ताकि खेती आसान हो जाए."

इमेज स्रोत, Neeraj Priyadarshi/BBC
स्थानीय निवासी उमेश राम ने बताया कि इलाके के एसडीओ जानकारी मिलने पर लौंगी भुइंया से मिलने और उनका काम देखने आए थे. उन्होंने वादा किया है कि वे लौंगी की मांगों को पूरा करेंगे.
लौंगी भुइंया की ख़बर चर्चा में आने के बाद ज़िला प्रशासन हरक़त में आया है. उन्हें सम्मानित करने की योजना बनाई जा रही है.
गया के इमामगंज प्रखंड के बीडीओ जिनके सीमा क्षेत्र में ही लौंगी भुइंया के बनाए नहर का कुछ हिस्सा स्थित है, कहते हैं,"लौंगी भुइंया ने वीर पुरुष जैसा काम किया है. वे बधाई के पात्र हैं. लोगों को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए. ऐसे पुरुषों को सम्मानित किया ही जाना चाहिए. लौंगी भुइंया का यह काम जल जीवन हरियाली योजना के लिहाज़ से भी काफी महत्वपूर्ण और प्रेरक है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकतेहैं.)















