लालू प्रसाद यादव के लिए रघुवंश प्रसाद सिंह की अहमियत क्या हैः नज़रिया

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- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
जिनका नाम लेते ही सही मायने में एक विशिष्ट व्यक्तित्व वाली छवि उभर आए ऐसे रघुवंश प्रसाद सिंह से मिलने का अवसर मुझे कई बार मिला है.
हर बार यही अनुभव किया कि ऊपर से देहाती दिखने वाला यह व्यक्ति अंदर से बहुत ही ज्ञानसमृद्ध और सामाजिक-ऐतिहासिक विषयों का गहन जानकार है.
इनके साइन्स ग्रेजुएट और गणित में मास्टर डिग्री वाली शैक्षणिक योग्यता का तो मुझे बाद में पता चला.

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रघुवंश प्रसाद सिंह ने दिल्ली में एम्स के बिस्तर से चिट्ठी लिखकर अपना इस्तीफ़ा भेजा लेकिन लालू यादव ने उसे ख़ारिज करते हुए लिखा कि आप कहीं नहीं जा रहे.
मैंने सिर्फ़ पोशाक में ही नहीं बल्कि बोल-व्यवहार में भी रघुवंश बाबू की सादगी देखी है इसलिए कह सकता हूँ कि वे मुझे स्वभाव से ही सच्चे जन प्रतिनिधि लगते रहे हैं.

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हालाँकि कई दफ़ा मुझे ऐसा भी लगा कि लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के कुछ ग़लत फ़ैसलों का उन्होंने अपने स्वभाव के विपरीत बचाव किया.
लेकिन उनकी ऐसी कमियों को लोग उनकी कुछ खूबियों के कारण भूलते भी रहे हैं. जैसे कि लालू यादव की नाराज़गी से बेपरवाह रघुवंश बाबू ने अपने ही दल के उन निर्णयों का खुल कर विरोध किया, जिन्हें वह अनैतिक या जनविरोधी मानते थे.

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मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि कभी-कभी वह लालू-राबड़ी सरकार या आरजेडी नेतृत्व से असहमत हो कर 'ऑन रिकॉर्ड' अपनी अलग राय रख कर मुझे चौंका देते थे.
दूसरी बात, कि पत्रकारों के लिए सुलभ रघुवंश बाबू से भेंटवार्ता (इंटरव्यू) या टेलीफोन पर बातचीत करना बड़ा ही सहज और तनावरहित हो जाता था.
वजह ये थी कि बड़े नेताओं या मंत्रियों जैसे नख़रे उनमें कभी नहीं रहे. उनके दिल खोल अंदाज़ का एक अलग ही आकर्षण रहा है.
एकबार ऐसा हुआ कि जब वह केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री थे, तब मुझे उनसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के बारे में बात करने की ज़रूरत पड़ी.
वह पटना आए हुए थे और उन्होंने मुझे अपने स्थानीय निवास पर बुला लिया. कोई तामझाम नहीं. दाल,रोटी और एक सब्ज़ी की थाली सामने पड़ी थी.
मुझसे कहा- "चलिए पहले दोनों भाई बातचीत ही कर लेते हैं, फिर साथ खाना खाएँगे."
और जब वह 'मनरेगा' के बारे में बताने लगे, तो इस योजना संबंधी हरेक पहलू की बिल्कुल आसान शब्दों में व्याख्या और सवालों के सटीक जवाब देने जैसे उनके कौशल पर मैं दंग था.

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दंग इसलिए था क्योंकि तब से पहले रघुवंश बाबू की ऐसी बारीक सामाजिक-आर्थिक समझ का मुझे अंदाज़ा ही नहीं था.
ज़ाहिर है कि मेरे पत्रकार-मन पर शायद पहली बार एक ऐसे नेता की छवि उभरी थी जो देखने-सुनने में सहज-सामान्य, लेकिन काम में समर्पित और समर्थ लग रहे थे.
बाद में तो मुझे यह भी पता चला कि सीतामढ़ी के एक कॉलेज में गणित पढ़ाने वाले डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह 1962 में ही डॉ राम मनोहर लोहिया की पत्रिका 'चौखंभा राज' में लिखने-छपने लगे थे.
कहते हैं, चौखंभा राज पढ़-पढ़ कर ही लोहिया के बारे में उनकी एक स्पष्ट राजनीतिक सोच या दृष्टि बनी या विकसित हुई.
उसी समय बिहार की समाजवादी धारा के एक ज़मीनी नेता कर्पूरी ठाकुर ने भी रघुवंश प्रसाद सिंह में जनप्रतिनिधि वाले नज़रिये की झलक देखी और कालांतर में उन्हें अपने साथ जोड़ लिया.
संयोग ही कहेंगे कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पैतृक गाँव पितौंझिया (समस्तीपुर) में ही रघुवंश बाबू का ननिहाल है.
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फिर वह लोहिया और कर्पूरी के समाजवादी आंदोलन से प्रेरित राजनीतिक धारा के साथ हो लिए और सन 74 के छात्र आंदोलन में सक्रियता ने उन्हें ख़ास पहचान दी.
उनके सगे भाई रघुपति ठीक ही कहते हैं कि रघुवंश बाबू ने अपने राजनीतिक जीवन में 'विचार' तो राम मनोहर लोहिया से लिए, पर 'कर्म' और संघर्ष की ताक़त उन्हें कर्पूरी ठाकुर से मिली.
गाँव-घर के लोगों से मिलने-जुलने या बतियाने के जो हाव-भाव या तौर-तरीक़े कर्पूरी जी में दिखते थे, वे सब रघुवंश बाबू में भी अक्सर नज़र आते रहे हैं.
इस कारण ऊँची जाति के होते हुए भी गाँवों में दलित, पिछड़े और बेहद ग़रीब लोगों के बीच इनकी गहरी पैठ संभव हो जाती है.
कभी-कभी इनकी भाषण-शैली लालू यादव की भाषण-शैली से मिलती-जुलती लगती ज़रूर है लेकिन बिना लागलपेट बेबाक़ी से सच बोल देने और मज़ाक़िया लहज़े में कुछ कह देने के बीच फ़र्क़ तो होता ही है.

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यहाँ अगर मैं एक ही दल के इन दोनों नेताओं की जनछवि (पब्लिक इमेज) का ज़िक्र करूँ तो लालू विरोधियों के बीच भी रघुवंश समर्थक मिल जाने की सच्चाई सब जानते हैं.
जहाँ तक मैंने इनके हस्तलिखित चंद वाक्यों वाले हालिया पत्र को पढ़कर समझा है, अपनी उम्र के इस पड़ाव पर अस्वस्थता से उबर कर फिर सक्रिय राजनीति से नहीं जुड़ने का संकेत वह दे चुके हैं.
वैसे, अगर बात बिहार में मौजूदा सियासत की करें, तो मै नि:संकोच यही कहूँगा कि लालू परिवार से जुड़ी सत्ता-राजनीति में रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता की अब क़दर हो ही नहीं सकती.
बीते बत्तीस वर्षों की उनकी दलीय आस्था और लालू यादव के साथ खड़े रहने की सार्थकता इतनी आहत हो चुकी है कि अब पहले जैसा जुड़ाव संभव नहीं दिखता.

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लालू यादव अगर चाहें भी तो आरजेडी की आंतरिक कमज़ोरियों से जुड़ी परिस्थितियाँ अब रघुवंश बाबू और आरजेडी को शायद ही एक-दूसरे के क़रीब आने देंगी.
ऐसा मैं इसलिए भी कह रहा हूँ क्योंकि रघुवंश बाबू आरजेडी के दूसरे वरिष्ठ और सोच-समझ से परिपक्व माने जा रहे जगदानंद सिंह से कुछ भिन्न मन:स्थिति वाले नेता हैं.
जगदा बाबू जहाँ पार्टी की अंदरुनी असहज स्थितियों को ख़ामोशी से मन में दबा कर अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं. वहीं रघुवंश बाबू बेहिचक खरी-खरी सुना कर विरोध आमंत्रित कर लेते हैं.
अभी हाल के ही उस विवाद पर ग़ौर करें, जो रघुवंश बाबू की सख़्त नाराज़गी का कारण बना है.
रामविलास पासवान की पार्टी से एक बार सांसद रह चुके रामा सिंह नाम के दबंग छवि वाले नेता को अब आरजेडी से जोड़ कर रघुवंश बाबू के ही एक क्षेत्र से चुनावी टिकट देने की तैयारी होने लगी है.
पार्टी के इस रवैये पर रघुवंश बाबू इतने दुखी या रुष्ट हो गए कि ऐसे दल से दूर हो जाना ही ठीक समझा. यही है इनकी वह ख़ास फ़ितरत, जो इन्हें एक हद से ज़्यादा समझौतावादी होने ही नहीं देती है.
बिहार में ऐसे ही एक दूसरे समाजवादी नेता रहे हैं रामजीवन सिंह. कर्पूरी ठाकुर से लेकर लालू यादव तक की राजनीति में रामजीवन बाबू उनके साथ रहे, पर अपने उसूलों को उन्होंने कभी नीचे नहीं गिरने दिया.

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इसलिए मुझे लगता है कि अब अगर आरजेडी से रघुवंश बाबू का साथ छूटा है या छूटेगा, तो भारतीय जनता पार्टी से जुड़े नीतीश कुमार के जनता दल युनाइटेड को क़ुबूल कर लेना भी उन्हें शायद ही मंज़ूर हो पाएगा.
सोच कर देखा जाए, तो न सिर्फ़ लालू यादव की आरजेडी में, बल्कि बिहार की राजनीति में भी एक ख़ालीपन ही दिखेगा, अगर रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कुछ विशिष्ट प्रकृति वाले जनप्रतिनिधि को अलग कर दिया जाए.
मुझे वे दिन याद हैं, जब केंद्रीय मंत्री के रूप में रघुवंश बाबू बिहार की विभिन्न केंद्रीय योजनाओं पर अमल के लिए राज्य सरकार की नाक में दम कर देते थे.
बिहार के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से लेकर विभागीय अधिकारियों तक को रिमाइंडर के तौर पर ताबड़तोड़ चिट्ठियाँ भेज-भेज कर वह कार्य प्रगति का जायज़ा लेते रहते थे.

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राज्य की वैसी सड़कों, जिनके निर्माण या विस्तार के लिए केंद्र से धनराशि आवंटित होती थी. उनका काम रुक जाने या शिथिल पड़ जाने पर रघुवंश बाबू की छटपटाहट मैंने देखी है. चिट्ठी से काम नहीं चलता था तो वह सीधे ज़िलाधिकारी को भी फ़ोन लगा कर बात कर लेते थे.
तभी तो लालू जी भी कहा करते थे कि 'ब्रह्म बाबा' पर काम का भूत सवार रहता है. राजनीतिक हलके में रघुवंश बाबू को आदर से लोग 'ब्रह्म बाबा' भी कहते हैं.
यहाँ सरकारी महकमों में आज भी चर्चा होती है कि अपने केंद्रीय मंत्रित्व काल में राज्य सरकार को उनके द्वारा भेजे गए तमाम सरकारी पत्र अगर संकलित किए जाएँ तो कई किताबें बन जाएँगी.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी-कभी बोल पड़ते थे कि रघुवंश बाबू समय पर योजना-राशि उपयोग संबंधी इतना पत्र भेजते हैं कि यहाँ अधिकारी चैन से नहीं बैठ सकते.
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एक बार तो रघुवंश बाबू ने अपनी मित्रमंडली में यह रहस्य भी खोल दिया कि बिहार के विकास से संबंधित केंद्रीय धनराशि भेजने में उनकी उदारता से एक क़रीबी केंद्रीय मंत्री चिढ़े रहते हैं और कहते हैं कि इसका सियासी लाभ नीतीश को मिल जाएगा.
स्पष्ट है कि इशारा तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद की तरफ़ रहा होगा. सार्वजनिक जीवन में बिना थके, बिना रुके काम करते रहने वालों में शायद इसलिए भी रघुवंश प्रसाद का नाम लिया जाता है.
अपनी माटी, अपनी बोली और अपने लोग जिनके व्यक्तित्व में रचे-बसे हों, ऐसे राजनेताओें की सूची बिहार में वैसे भी छोटी ही होती जा रही है. रघुवंश प्रसाद सरीखे नेता नज़र आ जाते हैं तो उभरती हुई सियासी विकृतियाँ कम खलती हैं.
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